उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
पाण्डवानां विरोधेन न चैनामववुध्यसे ||
८० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
दुर्योधन उवाच
पाण्डवानां समस्ताश्च न तिष्ठन्ति पराक्रमे ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानां ससैन्यानां कुरूणां च समागमः ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानां ससैन्यानां वधो राज्यस्य चागमः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६८
भीष्म उवाच
पाण्डवानां सहाय़ार्थे परं शक्त्या यतिष्यतः |
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवानां हितं चैव सर्वस्य जगतस्तथा ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय
५१
दुर्योधन उवाच
पाण्डवानां हिते युक्तो न तथा मम कौरव ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
पाण्डवानां हृतं राज्यं धार्तराष्ट्रैर्महावलैः |
४० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवानागतान्द्रष्टुं कौतूहलसमन्विताः ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानामदीनात्मा व्यगाहत वरूथिनीम् |
४५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानामनीकानि प्रविगाह्य व्यशातय़त् ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानामनीकानि प्राज्ञौ तौ व्यूहतुस्तदा ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
पाण्डवानामनीकानि योधय़न्ति प्रहारिणः ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानामनीकानि वभञ्जुः स्म पुनः पुनः ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानामनीकानि विजगाहे महारथः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२७
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानामनीकानि समदृश्यन्त संय़ुगे ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानामनीकेषु धृष्टद्युम्नमय़ोधय़न् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानामनीकेषु निहन्ति क्षत्रिय़र्षभान् ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानामहं पुत्रः समरेष्वनिवर्तिनाम् |
६१ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
पाण्डवानामुपहृतां स दृष्ट्वा पर्यतप्यत ||
८९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानामय़ं कोपस्त्वय़ा शकुनिना सह |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवानामय़ं चान्ते पालय़िष्यति मेदिनीम् ||
१० ग
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानीकिनीमध्यमाससाद स वेगितः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानुग्रधनुषः क्रोधय़न्तस्तवात्मजाः ||
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३५
कुन्त्यु उवाच
पाण्डवान्कुशलं पृच्छेः सपुत्रान्कृष्णय़ा सह |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवान्गच्छतश्चापि शिविरं नो विशां पते |
२ क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवान्दुःखसन्तप्तान्समाजग्मुर्महावने ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवान्धार्तराष्ट्रांश्च सर्वां च पृथिवीमिमाम् ||
८१ ख
सभा पर्व
अध्याय
६६
जनमेजय़ उवाच
पाण्डवान्धार्तराष्ट्राणां कथमासीन्मनस्तदा ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
९
व्यास उवाच
पाण्डवान्नित्यसङ्क्रुद्धो राज्यहेतोर्जिघांसति ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवान्पीडय़ामास ससात्यकिवृकोदरान् ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवान्पृष्ठतः कृत्वा त्राणमाशंससेऽन्यतः ||
४३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवान्प्रत्युदीय़ाम जय़गृद्धाः प्रमन्यवः ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवान्भक्षय़िष्यन्तो दीप्तास्या इव पन्नगाः ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४४
कर्ण उवाच
पाण्डवान्यदि गच्छामि किं मां क्षत्रं वदिष्यति ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवान्रथिनः पञ्च समन्तात्पर्यवारय़न् ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवान्वा रणे जेष्ये मां वा जेष्यन्ति पाण्डवाः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवान्सततं प्रीणास्यस्माकं विप्रिय़े रतान् ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवान्समरे क्रुद्धान्पाञ्चालांश्च सकेकय़ान् ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवान्समरे जग्मुस्तावका भरतर्षभ ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६२
दुर्योधन उवाच
पाण्डवान्समरे पञ्च हनिष्यामः शितैः शरैः ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवान्सरथान्दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नं च पार्षतम् |
८० क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवान्सृञ्जय़ांश्चैव पाञ्चालांश्चैव भारत |
१०६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवान्हन्तुमिच्छामि त्वय़ाज्ञप्तः सहानुगान् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवानय़ने तावन्मन्त्रय़ध्वं हितं मम ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवापि ततो राजञ्श्रुत्वा तं निनदं महत् |
४४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवापि महाराज स्मरन्तो विविधान्वहून् |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवार्थे पराक्रान्तो गमितो यमसादनम् ||
८१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवार्थे हि लुभ्यन्तः स्वार्थाद्धास्यन्ति ते सुताः |
२६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
पाण्डवाश्च कथं शूराः प्रत्युदीय़ुर्महारथम् |
१०४ क