शान्ति पर्व
अध्याय
१७६
भृगुरु उवाच
पृथिवी पर्वता मेघा मूर्तिमन्तश्च ये परे |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
पृथिवी प्रतिजग्राह कान्तीपुरसमीपतः ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
पृथिवी भवतस्त्वेषा संन्यस्ता राजसत्तम |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२३
धृतराष्ट्र उवाच
पृथिवी भूय़सी तात मम पार्थस्य नो तथा |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
पृथिवी भ्रातृभावेन भुज्यतां विज्वरो भव ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
पृथिवी वाय़ुराकाशमापो ज्योतिर्मनस्तथा ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
पृथिवी वाय़ुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
पृथिवी वाय़ुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् |
७२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
पृथिवी वाय़ुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
पृथिवी वाय़ुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
पृथिवी वाय़ुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
पृथिवी वाय़ुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९८
याज्ञवल्क्य उवाच
पृथिवी वाय़ुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९९
याज्ञवल्क्य उवाच
पृथिवी वाय़ुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
पृथिवी वाय़ुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
पृथिवी वाय़ुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
पृथिवी व्यचलद्राजन्नतीव भरतर्षभ ||
४१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८
भीष्म उवाच
पृथिवी व्राह्मणालाभे क्षत्रिय़ं कुरुते पतिम् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८३
भृगुरु उवाच
पृथिवी सर्वभूतानां जनित्री तद्विधाः स्त्रिय़ः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
पृथिवीं कम्पय़त्येको गुणो वाय़ोरिति स्मृतः |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६८
युधिष्ठिर उवाच
पृथिवीं क्षत्रिय़ो दद्याद्व्राह्मणस्तां स्वकर्मणा |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
पृथिवीं च सुवर्णं च रत्नानि विविधानि च |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०९
सुपर्ण उवाच
पृथिवीं चाखिलां व्रह्मंस्तस्मादारोह मां द्विज ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
पृथिवीं चान्तरिक्षं च कम्पय़न्सागरानपि ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
पृथिवीं चान्तरिक्षं च तथा स्थावरजङ्गमम् |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
पृथिवीं चान्तरिक्षं च दिवं च पुरुषोत्तमः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
पृथिवीं चान्तरिक्षं च दिशश्चैव समावृणोत् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
पृथिवीं चान्तरिक्षं च द्यां चैव तमसावृणोत् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
पृथिवीं चान्तरिक्षं च द्यां चैव पुरुषोत्तमः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
पृथिवीं चान्तरिक्षं च रथघोषेण नादय़न् ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५
शल्य उवाच
पृथिवीं चान्तरिक्षं च विचीय़ातिमनोगतिः |
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
पृथिवीं चान्तरिक्षं च विनादय़ति शङ्खराट् ||
५९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
पृथिवीं चान्तरिक्षं च सागरांश्चान्वनादय़त् ||
६६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०२
भीष्म उवाच
पृथिवीं चार्तरूपां ते समपश्यन्दिवौकसः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०५
याज्ञवल्क्य उवाच
पृथिवीं जघनेनाथ ऊरुभ्यां तु प्रजापतिम् ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
पृथिवीं दातुकामोऽपि जीवितेनाद्य मोक्ष्यसे ||
६२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
पृथिवीं नान्यदिच्छन्ति पावनं जननी यथा ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
पृथिवीं नेमिघोषेण नादय़न्तोऽभ्ययुः परान् ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७१
युधिष्ठिर उवाच
पृथिवीं पर्यटन्तं हि तुरगं कामचारिणम् |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
पृथिवीं पालय़ित्वाहमेतां निष्ठामुपागतः ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
पृथिवीं भुङ्क्ष्व सहितो भ्रातृभिर्वलिभिर्वशी |
१६ क
विराट पर्व
अध्याय
६४
उत्तर उवाच
पृथिवीं भोक्ष्यसे जित्वा हतो वा स्वर्गमाप्स्यसि ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
कुण्डधार उवाच
पृथिवीं रत्नपूर्णां वा महद्वा धनसञ्चय़म् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
पृथिवीं लाङ्गलेनैव भित्त्वा वीजं वपत्युत |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
पृथिवीं वा द्विजातिभ्यो यो दद्यात्सममेव तत् ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
पृथिवीं सोऽसृजद्विश्वां सहितां भूरितेजसा ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११७
कर्ण उवाच
पृथिवीक्षय़शंसीनि निमित्तानि पितामह |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
पृथिवीगोप्रदानाभ्यां स तुल्यं फलमश्नुते ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१०८
लोमश उवाच
पृथिवीतलमासाद्य भगीरथमथाव्रवीत् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
पृथिवीदानतुल्यं स्यादधिकं वा फलं विभो ||
५० ख