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वन पर्व
अध्याय १०८
लोमश उवाच
प्रय़तः प्रणतो भूत्वा गङ्गां समनुचिन्तय़त् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़तः प्रतिगृह्याथ धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ||
३४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़तः प्राञ्जलिर्भूत्वा धीरस्तान्व्रह्मसत्रिणः ||
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
वासुदेव उवाच
प्रय़तः प्रातरुत्थाय़ यदधीय़े विशां पते |
४ क
आदि पर्व
अध्याय ११
डुण्डुभ उवाच
प्रय़तः सम्भ्रमाच्चैव प्राञ्जलिः प्रणतः स्थितः |
६ क
वन पर्व
अध्याय २०४
वृद्धावू ऊचतुः
प्रय़तत्वाद्द्विजातीनां दमेनासि समन्वितः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय ६७
वृहदश्व उवाच
प्रय़तन्तु तव प्रेष्याः पुण्यश्लोकस्य दर्शने ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
प्रय़तन्ते महात्मानस्तस्माद्यज्ञाः पराय़णम् ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
प्रय़तश्च भवेत्तस्यां न च किञ्चित्समाचरेत् ||
१३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३
शल्य उवाच
प्रय़ता च निशां देवीमुपातिष्ठत तत्र सा |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
प्रय़तामो महाराज निहन्तुं वृष्णिपार्षतौ ||
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४२
व्यास उवाच
प्रय़ताय़ प्रवक्तव्यं हिताय़ानुगताय़ च ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५२
भीष्म उवाच
प्रय़तिष्यावहे प्रीतिमाहर्तुं ते तपोधन ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़तिष्ये तथा कर्तुं यथा नान्यो धनुर्धरः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय ४९
सूत उवाच
प्रय़तिष्ये तथा सौम्य यथा श्रेय़ो भविष्यति |
१९ ख
वन पर्व
अध्याय ११०
लोमश उवाच
प्रय़तिष्ये महाराज तमानेतुं तपोधनम् ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रय़तेन मय़ा मूर्ध्ना गृहीत्वा ह्यभिवन्दितौ |
१२० क
उद्योग पर्व
अध्याय १०५
नारद उवाच
प्रय़तो द्रष्टुमिच्छामि महाय़ोगिनमव्ययम् ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
प्रय़तो व्राह्मणाग्रेभ्यः श्रद्धय़ा परय़ा युतः |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
प्रय़त्नं तत्र कुर्वाणास्तस्मात्कूपाज्जलार्थिनः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५१
युधिष्ठिर उवाच
प्रय़त्नमकरोत्तीव्रमाचार्यो ग्रहणे मम ||
१ ख
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़त्नमकरोत्पार्थो जनस्य परिरक्षणे ||
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८६
पराशर उवाच
प्रय़त्नसाध्यो हि स राजपुत्र; प्रज्ञाशरेणोन्मथितः परैति ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११७
नारद उवाच
प्रय़त्नस्ते न कर्तव्यो नैष सम्पत्स्यते तव ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
प्रय़त्नाच्च गुरू वृद्धौ शुश्रूषेऽहं द्विजोत्तम ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
प्रय़त्नात्कुरुमुख्येन वृहस्पत्युशनोमतात् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
प्रय़त्नात्कृतवान्वीरः प्रजानां परिपालनम् ||
६१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
जम्वुक उवाच
प्रय़त्नात्प्राप्यते ह्यर्थः कस्माद्गच्छथ निर्दय़ाः ||
४७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २८
श्रीभगवानु उवाच
प्रय़त्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्विषः |
४५ क
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
प्रय़त्ने कर्मणि वले य एकस्त्रिषु वर्तते |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७८
भृगुरु उवाच
प्रय़त्ने कर्मणि वले य एकस्त्रिषु वर्तते |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८१
पराशर उवाच
प्रय़त्नेन च संसिद्धा धनैरपि विवर्जिताः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८०
पराशर उवाच
प्रय़त्नेन मनुष्येन्द्र पापमेवं निवोध मे ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
प्रय़त्नेनाधिगन्तव्यं धार्यं च प्रय़तात्मना |
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
प्रय़त्नेनापि चारक्षच्चित्तं पुत्रस्य वै पिता |
७६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
प्रय़त्नेनाप्यतिक्रान्तो दृष्टपूर्वो न केनचित् ||
९५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८४
पराशर उवाच
प्रय़त्नेनोपगम्यश्च स्वधर्म इति मे मतिः ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़त्नोपहितानि स्म दृष्ट्वा विस्मय़मागमत् ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय २७२
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रय़याविन्द्रजिद्राजंस्तूर्णमाय़ोधनं प्रति ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़यावुत्तरां तस्माद्दिशं धनदपालिताम् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय १४२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़युः पुरुषव्याघ्रा हिडिम्वा चैव राक्षसी ||
३४ ख
सभा पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़युः प्रीतमनसो यज्ञं व्रह्मपुरःसराः |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय १००
सञ्जय़ उवाच
प्रय़युः फल्गुनार्थाय़ यत्र भीष्मो व्यवस्थितः ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़युः सर्व एवैते भारद्वाजपुरोगमाः ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
प्रय़युः सिंहनादेन दुर्योधनजिघांसय़ा ||
२७ ग
शल्य पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
प्रय़युः सिंहनादेन दुर्योधनवधेप्सय़ा ||
२९ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़युः स्वैर्विमानैस्ते सिद्धाः कामविहारिणः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़युर्जाह्नवीकूलात्कुरुक्षेत्रं सहानुगाः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय १७५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़युर्द्रौपदीं द्रष्टुं तं च देवमहोत्सवम् ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
प्रय़युर्नगरं तूर्णं हतस्वजनवान्धवाः ||
७२ ख