chevron_left  प्रत्याख्यातोऽपिarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय २६५
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रत्याख्यातोऽपि दुर्मेधाः पुनरेवाव्रवीद्वचः ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
प्रत्याख्यानं च कृष्णस्य राज्ञा दुर्योधनेन वै |
१४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११०
धृतराष्ट्र उवाच
प्रत्याख्यानाच्च कृष्णस्य भृशं तप्यति सञ्जय़ ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय ९५
लोमश उवाच
प्रत्याख्यानाय़ चाशक्तः प्रदातुमपि नैच्छत ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११४
वृहस्पतिरु उवाच
प्रत्याख्याने च दाने च सुखदुःखे प्रिय़ाप्रिय़े |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८१
श्रीरु उवाच
प्रत्याख्यानेन युष्माभिः प्रसादः क्रिय़तामिति ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४
भीष्म उवाच
प्रत्याख्याय़ पुनर्यान्तमव्रवीद्राजसत्तमः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्याख्याय़ पुरा राज्यं नाद्य जातु ग्रहीष्यति ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय २८५
सूर्य उवाच
प्रत्याख्येय़स्त्वय़ा तात कुण्डलार्थे पुरन्दरः ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६
व्यास उवाच
प्रत्यागच्छच्च संविग्नो ददर्श पथि नारदम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय १४७
हनूमानु उवाच
प्रत्यागतश्चापि पुनर्नाम तत्र प्रकाश्य वै ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यागत्य पुनर्जिष्णुरहन्संशप्तकान्वहून् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
प्रत्याचक्षे न चाप्येनमनुरुध्ये सुदुर्लभम् ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७५
होत्रवाहन उवाच
प्रत्याचख्यौ च शाल्वोऽपि चारित्रस्याभिशङ्कितः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
प्रत्याचष्ट स दाशार्हमृषभं सर्वधन्विनाम् |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९७
भीष्म उवाच
प्रत्याजगाम च शरांस्तानादाय़ यशस्विनी ||
१२ ग
वन पर्व
अध्याय १८३
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रत्याजगाम तेजस्वी गृहानेव महातपाः ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
प्रत्याजगाम नगरं हर्षेण महतान्वितः ||
५३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९४
राम उवाच
प्रत्याजगाम स्वपुरं धर्मं चैवाचिनोद्भृशम् ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय १३४
लोमश उवाच
प्रत्याजगामाश्रममेव चाग्र्यं; जित्वा वन्दिं सहितो मातुलेन ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय २९४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्याजग्मुः सरथाः सानुय़ात्राः; सर्वैः सार्धं सूदपौरोगवैश्च |
४३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८१
भीष्म उवाच
प्रत्याजघ्ने च तद्रामो गुह्यकास्त्रेण भारत ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २५८
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रत्याजहार तां रामः सुग्रीववलमाश्रितः |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
प्रत्यादानं च राज्यस्य कार्यमूचुर्नराधिपाः |
६ क
विराट पर्व
अध्याय ४१
द्रोण उवाच
प्रत्यादित्यं च नः सर्वे मृगा घोरप्रवादिनः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
प्रत्यादित्यं न मेहेत न पश्येदात्मनः शकृत् |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
प्रत्यादित्यं प्रत्यनिलं प्रति गां च प्रति द्विजान् |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३५०
नाग उवाच
प्रत्यादित्यप्रतीकाशः सर्वतः प्रत्यदृश्यत ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
प्रत्यादिष्टा नरेन्द्रेण सुलभा न व्यकम्पत ||
७६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यादेशं मन्यमानो महात्मा; प्रतत्वरे भीष्मवधाय़ राजन् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
प्रत्यानय़त राजेन्द्र तेषामन्तःपुरात्प्रभुः ||
४१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २८०
पराशर उवाच
प्रत्यापत्तिश्च यस्येह वालिशस्य न जाय़ते |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३९
युधिष्ठिर उवाच
प्रत्यापन्नं व्यसनिनं न मां धिक्कर्तुमर्हथ ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८०
पराशर उवाच
प्रत्यापन्नस्य हि सतो नात्मा तावद्विरोचते ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
प्रत्याश्वस्तस्ततो द्रोणो धनुर्गृह्य महावलः |
५० क
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
प्रत्याश्वस्तस्तु वीभत्सुः शनकैरिव भारत |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय १८७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्याश्वस्तांस्ततो राजा सह पुत्रैरुवाच तान् ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
प्रत्याश्वस्य च दुर्धर्षः सहदेवो विशां पते |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
प्रत्याश्वासय़ गान्धारीं हतपुत्रां यशस्विनीम् ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९६
मनुरु उवाच
प्रत्यासन्नं निनीषन्ति ज्ञेय़ं ज्ञानाभिसंहितम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२३
भीष्म उवाच
प्रत्यासन्नस्य तस्यर्षे किं स्यात्पापप्रणाशनम् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
प्रत्याह ननु शीलोऽस्मि त्यक्तो गच्छाम्यहं त्वय़ा ||
४६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
प्रत्याहरंश्च मे युक्ताः स्थिताः प्रिय़हिते मम ||
१३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३२०
भीष्म उवाच
प्रत्याहरज्जगत्सर्वमुच्चैः स्थावरजङ्गमम् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
प्रत्याहर्तुमशक्यं स्याद्धनं चोरैर्हृतं यदि |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
प्रत्याहारं तु वक्ष्यामि शर्वर्यादौ गतेऽहनि |
७४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०९
गुरुरु उवाच
प्रत्याहारेण वा शक्यमव्यक्तं व्रह्म वेदितुम् ||
२० ख
सभा पर्व
अध्याय ६५
धृतराष्ट्र उवाच
प्रत्याहुर्मध्यमास्त्वेतानुक्ताः परुषमुत्तरम् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय २५७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्याहृता तथास्माभिर्हत्वा तत्सैन्धवं वलम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय १३७
लोमश उवाच
प्रत्युक्तं च यवक्रीतं प्रेक्षापूर्वं तदात्मना ||
७ ख