शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
पृथिवीनभसी चोभे विश्रुते विश्वलौकिके |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
पृथिवीमचरद्राजन्यत्रसाय़ङ्गृहो मुनिः ||
४४ ख
विराट पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
पृथिवीमजय़त्कृत्स्नां कुन्तीपुत्रो धनञ्जय़ः |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
पृथिवीमनुशासेय़ुरखिलां सागराम्वराम् ||
४० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
पृथिवीमन्तरिक्षं च द्यामपश्चाप्यपूरय़त् ||
५७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
पृथिवीराज्यमर्होऽय़ं नाङ्गराज्यं नरेश्वरः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
पृथिवीरूपतो रूपमपामिह महत्तरम् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२४
सञ्जय़ उवाच
पृथिवीविजय़ो वापि त्रैलोक्यविजय़ोऽपि वा |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७५
भृगुरु उवाच
पृथिव्यन्ते समुद्रास्तु समुद्रान्ते तमः स्मृतम् |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
पृथिव्या निष्क्रय़ं दत्त्वा तद्धिरण्यं युधिष्ठिरः |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९१
भगवानु उवाच
पृथिव्यां क्षत्रिय़ाणां च यतिष्येऽहममाय़या ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
पृथिव्यां क्षत्रिय़ेन्द्राश्च पार्थिवाः स्वर्गकाङ्क्षिणः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८३
भीष्म उवाच
पृथिव्यां च शराघातान्निपपात मुमोह च ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४७
वासुदेव उवाच
पृथिव्यां चतुरन्ताय़ां यदुरेवाभवद्वली |
९ क
विराट पर्व
अध्याय
३९
अर्जुन उवाच
पृथिव्यां चतुरन्ताय़ां वर्णो मे दुर्लभः समः |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
पृथिव्यां नास्ति युवतिर्विषमस्थतरा मय़ा |
१ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
पृथिव्यां नैमिषं पुण्यमन्तरिक्षे च पुष्करम् |
१७३ क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
जनमेजय़ उवाच
पृथिव्यां पाण्डवेय़स्य निःसपत्ने कृते युधि ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
९२
स्त्र्यु उवाच
पृथिव्यां पार्थिवा ये च तेषां यूय़ं पराय़णम् |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
पृथिव्यां पार्थिवानां वै दुर्योधनकृते महान् ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
पृथिव्यां पार्थिवान्सर्वान्प्रशासिष्यति धर्मराट् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
पृथिव्यां यत्र वै छिद्रं पूर्वमासीद्युधिष्ठिर ||
७४ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
पृथिव्यां यानि चान्यानि सत्त्वानि जगतीपते |
१०६ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
पृथिव्यां यानि तीर्थानि अन्तरिक्षचराणि च |
१६८ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
पृथिव्यां यानि तीर्थानि नैमिषे तानि भारत ||
५५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
युधिष्ठिर उवाच
पृथिव्यां यानि तीर्थानि पुण्यानि भरतर्षभ |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
पृथिव्यां यानि तीर्थानि पुण्यानि शृणु तान्यपि ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२५
व्यास उवाच
पृथिव्यां यानि भूतानि जङ्गमानि ध्रुवाणि च |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
ऋषय़ ऊचुः
पृथिव्यां यानि भूतानि स्थावराणि चराणि च |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
१९१
वैशम्पाय़न उवाच
पृथिव्यां यानि रत्नानि गुणवन्ति गुनान्विते |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
२०२
नारद उवाच
पृथिव्यां ये तपःसिद्धा दान्ताः शमपराय़णाः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
पृथिव्यां राजवंशानामुत्थिते महति क्षय़े ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
पृथिव्यां वानरैश्वर्ये स्वय़ं रामोऽभ्यषेचय़त् ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
श्रीकृष्ण उवाच
पृथिव्यां शेरते शूराः पार्थिवास्त्वच्छरैर्हताः ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
पृथिव्यां सर्वराजानो भवन्त्वद्य निरामय़ाः ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
पृथिव्यां हि रणे पार्थ न योद्धा त्वत्समः पुमान् ||
५४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२३
भीष्म उवाच
पृथिव्याः काश्यपस्याग्नेर्मार्कण्डेय़स्य चैव हि ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
पृथिव्याः प्रक्षय़ो घोरो यमराष्ट्रविवर्धनः ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
पृथिव्याः सर्जने नित्यं सृष्टास्तानपि मे शृणु ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
पृथिव्यापश्च तेजश्च खं वाय़ुश्च पराय़णम् |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
पृथिव्यापस्तथाकाशं वाय़ुस्तेजश्च पार्थिव |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
पृथिव्यामनुकीर्णैश्च व्यश्वसारथिय़ोधिभिः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
पृथिव्यामन्तरिक्षे च यत्र संवान्ति वाय़वः |
३१ क
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
पृथिव्यामेकवीरस्य शक्रस्येव त्रिविष्टपे ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
पृथिव्यामेव तं विद्यादापो वाय़ुं च संश्रितम् ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
पृथिव्याश्चतुरन्ताय़ा गोप्ता भरतसत्तम ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
पृथिव्याश्चतुरन्ताय़ा गोप्ता राजीवलोचनः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
पृथिव्यास्तीर्थमासाद्य गोसहस्रफलं लभेत् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
पृथुं वैन्यं प्रजा दृष्ट्वा रक्ताः स्मेति यदव्रुवन् |
१३१ क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
पृथुदंष्ट्रा महादंष्ट्राः स्थूलौष्ठा हरिमूर्धजाः |
९७ क