सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
प्रसुप्ता वै सुविश्वस्ताः स्वसैन्यपरिवारिताः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
प्रसुप्तांस्तृषिताञ्श्रान्तान्प्रकीर्णान्नाभिघातय़ेत् |
२४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
प्रसुप्तानां प्रमत्तानामासीत्सुभृशदारुणा ||
१४२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसुप्तानां वधं श्रुत्वा द्रौणिना पापकर्मणा |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
प्रसुप्तान्निशि विश्वस्तान्यत्र ते पुरुषर्षभाः |
१८१ क
वन पर्व
अध्याय
२९६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसुप्ताविव तौ दृष्ट्वा नरसिंहः सुदुःखितः |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसुप्ते हि यथा सिंहे श्वानस्तत्र समागताः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
८
सूत उवाच
प्रसुप्तेवाभवच्चापि भुवि सर्पविषार्दिता |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
प्रसुस्रुवुः शकृन्मूत्रं वाहनानि च सर्वशः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
प्रसुस्रुवुर्गजा मूत्रं विव्यथुश्च नरा भृशम् ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
प्रसुस्रुवुर्गजा मूत्रं विव्यथुश्च नरा भृशम् ||
३४ ख
मौसल पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसूतं शापजं घोरं तच्च राज्ञे न्यवेदय़न् |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९७
नारद उवाच
प्रसूताः सुप्रतीकस्य वंशे वारणसत्तमाः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
प्रसूतिर्यत्र विप्राणां श्रूय़ते भरतर्षभ ||
११० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११४
नारद उवाच
प्रसूत्यन्ते प्रसूत्यन्ते कन्यैव त्वं भविष्यसि |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसृता प्रददौ कामान्व्राह्मणानां महात्मनाम् ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७८
भृगुरु उवाच
प्रसृता हृदय़ात्सर्वे तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
प्रसृतांस्तस्य गाण्डीवाच्छरव्रातान्महात्मनः |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसृतासि महाभागे सरसो व्रह्मणः पुरा |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९७
मनुरु उवाच
प्रसृतैरिन्द्रिय़ैर्दुःखी तैरेव निय़तैः सुखी |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
प्रस्कन्दनो विभागश्च अतुल्यो यज्ञभागवित् ||
६१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
प्रस्कन्दमानमादाय़ जगाम वलिनं वलात् ||
४५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
प्रस्कन्द्य सेनां महतीं त्यक्तात्मानो महारथाः |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
प्रस्कन्दय़ेच्च मनसा भुक्त्वा चाग्निमुपस्पृशेत् ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
वसिष्ठ उवाच
प्रस्कन्नं तु ततस्तस्मात्किञ्चित्तत्रापतद्भुवि ||
५२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७१
भगवानु उवाच
प्रस्कम्भनप्रतिस्तव्धश्छिन्नमूल इव द्रुमः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
राजो उवाच
प्रस्तुतं सुमहत्कार्यमावय़ोर्गह्वरं यथा |
१०५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
प्रस्थं वाहसहस्रेषु यात्रार्थं चैव कोटिषु |
३० क
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रस्थं हिमवतः पुण्यं यय़ौ सप्तदशेऽहनि ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२६१
युधिष्ठिर उवाच
प्रस्थानकारणं व्रह्मञ्श्रोतुमिच्छामि कथ्यताम् ||
१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
प्रस्थाने च प्रवेशे च प्रहर्तव्यं रिपोर्वलम् ||
५१ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रस्थाने मतिमाधाय़ वाक्यमर्जुनमव्रवीत् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रस्थाने व्यास एषां च मन्त्री प्रिय़हितोऽभवत् |
९९ क
वन पर्व
अध्याय
२६१
युधिष्ठिर उवाच
प्रस्थापितौ वनं व्रह्म मैथिली च यशस्विनी ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
७७
वृहदश्व उवाच
प्रस्थाप्य पुष्करं राजा वित्तवन्तमनामय़म् |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रस्थाप्य पूर्वं कौन्तेय़ो भीष्मसंसाधनाय़ वै |
८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रस्थाप्य माद्रीसुतमाजमीढः; शोकार्दितस्तैः सहितः सुहृद्भिः |
२८ क
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रस्थाप्य सेनां कन्याश्च गणिकाश्च स्वलङ्कृताः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रस्थाप्यतां पाण्डव धार्तराष्ट्रः; सुय़ोधनः पापकृतां वरिष्ठः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४७
नागभार्यो उवाच
प्रस्थाप्यो मत्सकाशं स सम्प्राप्तो भुजगोत्तमः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
७८
वृहदश्व उवाच
प्रस्थापय़दमेय़ात्मा भीमो भीमपराक्रमः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रस्थापय़द्यत्स वनं ह्यशङ्को; युधिष्ठिरं सानुजमात्तशस्त्रम् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
६६
वृहदश्व उवाच
प्रस्थापय़द्राजमाता श्रीमता नरवाहिना |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४
द्रुपद उवाच
प्रस्थापय़ाम मित्रेभ्यो वलान्युद्योजय़न्तु नः ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रस्थापय़ामास वशी कुरुराजो युधिष्ठिरः ||
३५ ख
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रस्थापय़ामास सुतस्य हेतो; र्विचित्रशस्त्राभरणोपपन्नान् ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
७२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रस्थितं त्रिदशावासं देवय़ान्यव्रवीदिदम् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रस्थितं मानुय़ान्तीमे व्राह्मणा वेदपारगाः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
प्रस्थितं वा नरश्रेष्ठ मम शोकविवर्धन ||
२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
प्रस्थितं सूतपुत्रं च जय़ेत्यूचुर्नरा भुवि |
३९ ख