chevron_left  प्रय़ागादभिनिष्क्रान्ताarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
प्रय़ागादभिनिष्क्रान्ता सर्वतीर्थपुरस्कृता ||
६९ ख
वन पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़ागे देवय़जने देवानां पृथिवीपते |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
प्रय़ागे देवय़जने देवारण्येषु चैव ह |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
प्रय़ाचनं च शत्रूणां गमनं शरणस्य च ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय १०८
लोमश उवाच
प्रय़ाचस्व महावाहो शैलराजसुतां नदीम् |
४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़ाणं घुष्यतां चैव श्वोभूत इति मा चिरम् |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़ाणं घुष्यतामद्य श्वोभूत इति माचिरम् ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३०
अर्जुन उवाच
प्रय़ाणकाले च कथं ज्ञेय़ोऽसि निय़तात्मभिः ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३०
श्रीभगवानु उवाच
प्रय़ाणकाले मनसाचलेन; भक्त्या युक्तो योगवलेन चैव |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय २९
श्रीभगवानु उवाच
प्रय़ाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७७
भीष्म उवाच
प्रय़ाणाय़ मतिं कृत्वा समुत्तस्थौ महामनाः ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
प्रय़ाणे परुषश्चात्र संवादः कर्णशल्ययोः |
१७० क
शल्य पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
प्रय़ाणे मद्रराजोऽभून्मुखं व्यूहस्य दंशितः |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़ाणे वासुदेवस्य वभूवुरनुय़ाय़िनः ||
२४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़ाणे वासुदेवस्य शमार्थमसितेक्षणे |
२७ क
वन पर्व
अध्याय २१
वासुदेव उवाच
प्रय़ातं सौभमास्थाय़ तमहं पृष्ठतोऽन्वय़ाम् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
प्रय़ातः सहसा राजन्सारथिं चेदमव्रवीत् ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
प्रय़ातश्च महावाहुः पाण्डवानुज्ञय़ा हरिः |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
प्रय़ातस्याथ पार्थस्य महान्स्वेदो व्यजाय़त |
४७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३०
श्रीभगवानु उवाच
प्रय़ाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
प्रय़ाताः शिविराय़ैव निशाकाले परन्तपाः ||
७७ ग
वन पर्व
अध्याय २३३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़ातान्सहितान्दृष्ट्वा पाण्डुपुत्रान्महारथान् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८६
पराशर उवाच
प्रय़ाति लोकानमरैः सुदुर्लभा; न्निषेवते स्वर्गफलं यथासुखम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
प्रय़ाति संहिताध्याय़ी व्रह्माणं परमेष्ठिनम् |
११८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
प्रय़ातु नो भवानग्रे देवानामिव पावकिः |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़ातु नो भवानग्रे देवानामिव पावकिः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
प्रय़ाते तव सैन्यं तु युय़ुधाने युय़ुत्सय़ा |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
प्रय़ाते तु ततः कर्णे योधेषु मुदितेषु च |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
प्रय़ाते भीमसेने तु तव सैन्यं युय़ुत्सय़ा |
५७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
प्रय़ाते सत्यसन्धे तु समकम्पत मेदिनी |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
प्रय़ाते सौवले राजन्पाण्डवानामनीकिनीम् |
६६ क
वन पर्व
अध्याय २२८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़ातो वाहनैः सर्वैस्ततो द्वैतवनं सरः ||
२९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
प्रय़ातोऽभिमुखः शत्रून्धर्मेण पुरुषर्षभ ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय २१
वासुदेव उवाच
प्रय़ातोऽस्मि नरव्याघ्र वलेन महता वृतः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४८
वासुदेव उवाच
प्रय़ाध्वं वै कुरुक्षेत्रं पुष्योऽद्येति पुनः पुनः ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
प्रय़ानेव तदा कर्णो हर्षय़न्वाहिनीं तव |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४९
सञ्जय़ उवाच
प्रय़ान्तं त्वरर्या युक्तं जिघांसुं कर्णमाहवे ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़ान्तं देवकीपुत्रं परवीररुजो दश |
१ क
वन पर्व
अध्याय २४०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़ान्तं नृपसिंहं तमनुजग्मुः कुरूद्वहाः |
४७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
प्रय़ान्तं शीघ्रमुद्वीक्ष्य परित्रातुं सुतांस्तव |
४२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़ान्तमन्वय़ुर्वीरं दाशार्हमपराजितम् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
प्रय़ान्तमर्जुनं सूता मागधाश्चैव तुष्टुवुः ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़ान्तमेकं कौरव्यमनुसस्रुरुदाय़ुधाः ||
१८ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
धृतराष्ट्र उवाच
प्रय़ान्ति पुण्यगन्धाढ्या धृतराष्ट्रो न तत्र वै ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८५
पराशर उवाच
प्रय़ान्ति स्थानमजरं सर्वकर्मविवर्जिताः ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
युधिष्ठिर उवाच
प्रय़ान्त्यमुं लोकमितः को वै ताननुगच्छति ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
प्रय़ामस्त्वरिता योद्धुं सूतपुत्ररथं प्रति ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
प्रय़ास्यतां किमास्यते समुत्थितं महद्भय़म् |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़ास्यतां पाण्डवानां ससैन्यानां समन्ततः |
४९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १२
धृतराष्ट्र उवाच
प्रय़ास्यमानो नृपतिस्त्रिविधं परिचिन्तय़ेत् |
५ क