अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
प्राणी धर्मसमाय़ुक्तो गच्छते स्वर्गतिं पराम् |
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३५
व्यास उवाच
प्राणी वा यदि वाप्राणी संस्कारं यजुषार्हति ||
५ ख
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
प्राणेन यदुशार्दूल वद्धवङ्क्षणवाससा ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२१
व्राह्मण उवाच
प्राणेन या सम्भवते शरीरे; प्राणादपानं प्रतिपद्यते च |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२४
नारद उवाच
प्राणेन विकृते शुक्रे ततोऽपानः प्रवर्तते ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२३
व्राह्मण उवाच
प्राणेन सम्भृतो वाय़ुरपानो जाय़ते ततः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३६
व्यास उवाच
प्राणेभ्यो यजुषा पञ्च षट्प्राश्नीय़ादकुत्सय़न् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२५३
वैशम्पाय़न उवाच
प्राणैः समामिष्टतमां जिहीर्षे; दनुत्तमं रत्नमिव प्रमूढः |
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२५४
द्रौपद्यु उवाच
प्राणैर्गरीय़ांसमनुव्रतं वै; स एष वीरो नकुलः पतिर्मे |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२८
यतिरु उवाच
प्राणैर्विय़ोगे छागस्य यदि श्रेय़ः प्रपश्यसि |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
काक उवाच
प्राणैर्हंस प्रपद्ये त्वां द्वीपान्तं प्रापय़स्व माम् ||
४९ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२८
यतिरु उवाच
प्राणो जिह्वा मनः सत्त्वं स्वभावो रजसा सह |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
प्राणो मूर्धनि चाग्नौ च वर्तमानो विचेष्टते |
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७८
भृगुरु उवाच
प्राणो मूर्धनि चाग्नौ च वर्तमानो विचेष्टते ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
प्राणो वाय़ुः सततगः क्रोधो मृत्युः सनातनः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
युधिष्ठिर उवाच
प्राणो वै यज्ञिय़ं साम मनो वै यज्ञिय़ं यजुः |
३५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
पुत्र उवाच
प्राणो हि परमो धर्मः स्थितो देहेषु देहिनाम् ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५०
भीष्म उवाच
प्राणोत्सर्गं विक्रय़ं वा मत्स्यैर्यास्याम्यहं सह |
२५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
प्राणोऽपानः समानश्च व्यानश्चोदान एव च ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२४
देवमत उवाच
प्राणोऽपानः समानो वा व्यानो वोदान एव च ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
प्राणय़ात्रा हि लोकस्य विनार्थं न प्रसिध्यति ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
५८
वृहदश्व उवाच
प्राणय़ात्रां न विन्दे च दुःखितः क्षुधय़ार्दितः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
६८
वृहदश्व उवाच
प्राणय़ात्रां परिप्रेप्सोः शकुनैर्हृतवाससः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
७२
वृहदश्व उवाच
प्राणय़ात्रां परिप्रेप्सोः शकुनैर्हृतवाससः |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४७
भीष्म उवाच
प्राणय़ात्रामनेकां च कल्पय़ानेन भारत ||
६ ग
सभा पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
प्राणय़ुद्धेन जेतव्यः स इत्युपलभामहे ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
प्राणय़ोर्दीव्यतो राजन्कर्णराक्षसय़ोर्मृधे ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
सुधन्वो उवाच
प्राणय़ोस्तु पणं कृत्वा प्रश्नं पृच्छाव ये विदुः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
प्रातः प्रातश्च सुप्रश्नं कल्पनं प्रेषणक्रिय़ाः |
७४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
प्रातः श्रोतारः कुरवः सभाय़ा; मजातशत्रोर्वचनं समेताः ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
२८९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रातराय़ास्य इत्युक्त्वा कदाचिद्द्विजसत्तमः |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रातरुत्थाय़ कृष्णस्तु कृतवान्सर्वमाह्निकम् |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
प्रातरुत्थाय़ चाचम्य भोजनेनोपमन्त्र्य च |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२४
भीष्म उवाच
प्रातरुत्थाय़ तत्सर्वं कारय़ामि करोमि च ||
१५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रातरुत्थाय़ तान्राजन्पूजय़ित्वा यथाविधि |
११ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
प्रातरेव हि पश्येथा ये कुर्युर्व्ययकर्म ते |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
प्रातर्निशाय़ां च तथा ये चोच्छिष्टाः स्वपन्ति वै ||
१३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
प्रातस्त्रिमार्गा घृतवहा विपाप्मा; गङ्गावतीर्णा विय़तो विश्वतोय़ा ||
८७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
प्रातिकामी तथा पापो द्रौपद्याः क्लेशकृद्धतः |
३३ क
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
प्रातिकामी तथा पापो द्रौपद्याः क्लेशकृद्धतः ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
२९६
भीम उवाच
प्रातिकाम्यनय़त्कृष्णां सभाय़ां प्रेष्यवत्तदा |
२ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२२
गान्धार्यु उवाच
प्रातिपीय़ं महेष्वासं हतं भल्लेन वाह्लिकम् |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३२
सञ्जय़ उवाच
प्रातिपीय़स्तु सङ्क्रुद्धः शक्तिं भीमस्य वक्षसि |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय
५६
विदुर उवाच
प्रातिपीय़ाः शान्तनवा भैमसेनाः सवाह्लिकाः |
२ क
सभा पर्व
अध्याय
५६
विदुर उवाच
प्रातिपीय़ाः शान्तनवाश्च राज; न्काव्यां वाचं शृणुत मात्यगाद्वः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
प्रातिप्रस्थानिकं कर्म सात्यकिः स करिष्यति |
४२ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
प्रातिष्ठं येन नगरं साय़ाह्ने रुधिरोक्षितः ||
३९ ख
सभा पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
प्रातिष्ठत ततो भीष्मो द्रोणेन सह सञ्जय़ |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
६६
शकुन्तलो उवाच
प्रातिष्ठत तदा काले मेनका वाय़ुना सह ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रातिष्ठत महावाहुः प्रगृहीतशरासनः |
१७ क