आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२३
व्राह्मण उवाच
प्रचचार पुनर्व्यानः समानः पुनरव्रवीत् |
१६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रचण्डघोणः पृथुदीर्घनेत्र; स्ताम्राय़तास्यः कुरुराज एषः ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२
सञ्जय़ उवाच
प्रचरन्तं महेष्वासं दिव्यैरस्त्रैर्महावलम् ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
प्रचरन्तौ महावीर्यौ द्रोणेन निहतौ रणे ||
७८ ख
वन पर्व
अध्याय
१४८
हनूमानु उवाच
प्रचलन्ति न वै धर्मात्तपोदानपराय़णाः |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रचलन्तीव भारेण दृश्यन्ते स्म महीतले ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रचलन्तीव भारेण योषिद्भिर्भवनान्युत ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
प्रचलन्धनुरुत्सृज्य न्यपतत्स्यन्दनोत्तमे ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२५
सूत उवाच
प्रचलाङ्गान्स तान्दृष्ट्वा मनोरथफलाङ्कुरान् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
प्रचारं भृत्यभरणं व्ययं गोग्रामतो भय़म् |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
प्रचारसमय़ेऽस्माकमर्धरात्रे समास्थिते ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
प्रचारे पुरुषादानां रक्षसां भीमकर्मणाम् ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
प्रचारे वा निपाने वा वुधो नोद्वेजय़ेत गाः |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रचिक्षेप महावाहुर्विनद्य रणमूर्धनि ||
६७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
प्रचिच्छेदाशु भल्लैश्च द्विषतामातताय़िनाम् |
१०१ क
वन पर्व
अध्याय
७०
वृहदश्व उवाच
प्रचिनुह्यस्य शाखे द्वे याश्चाप्यन्याः प्रशाखिकाः |
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
प्रचिन्त्यावसथं कृत्स्नं यस्मिन्काय़ेऽवतिष्ठते |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
ऋषय़ ऊचुः
प्रचीय़ोदुम्वराणि स्म दानं दातुं प्रचक्रमुः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
२५३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रचुक्रुशुश्चाप्यथ सिन्धुराजं; वृकोदरश्चैव धनञ्जय़श्च |
२६ क
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रचुक्षुभे वलं सर्वमुद्धूत इव सागरः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
प्रचोदनं देवकृतं गवां कर्मसु वर्तताम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रचोदितः सन्कथय़ां वभूव; धर्मानिलेन्द्रप्रभवान्यमौ च ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
प्रचोदितो धृतराष्ट्रेण राज्ञा; पुरस्कृतः शान्तनवेन चैव ||
३५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रचोद्यमानः स गजस्तेन राज्ञा महावलः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२९९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रच्छन्नं चापि धर्मज्ञ हरिणा वृत्रनिग्रहे |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
१३५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रच्छन्नं विदुरेणोक्तः श्रेय़स्त्वमिह पाण्डवान् |
३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रच्छन्नजातं पुत्रं तं सस्मारादित्यसम्भवम् ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
प्रच्छन्नरूपा रुधिरेण राज; न्रौद्रे मुहूर्तेऽतिविराजमानाः |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
प्रच्छन्ना वा प्रकाशा वा वेदितव्याः स्वकर्मभिः ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
६९
वृहदश्व उवाच
प्रच्छन्ना हि महात्मानश्चरन्ति पृथिवीमिमाम् |
२९ क
सभा पर्व
अध्याय
५०
दुर्योधन उवाच
प्रच्छन्नो वा प्रकाशो वा यो योगो रिपुवान्धनः |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
प्रच्छादितं वडिशमिवामिषेण; प्रच्छादितो गवय़ इवापवाचा |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
प्रच्छाद्य नृत्यन्निव सौतिपुत्रः; शैनेय़वाणाभिहतः पपात ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२५५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रच्छाद्य पृथिवीं तस्थुः सर्वमाय़ोधनं प्रति |
३० क
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रच्छाद्यमानं रक्षोभिः पाण्डवं प्रिय़दर्शनम् |
४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
प्रच्छाद्यमानः समरे शरजालैः स वीर्यवान् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
प्रच्छाद्यमाना पतितैर्वभूव; समन्ततो द्यौरिव कालमेघैः ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
प्रच्छाद्यमानो द्विरदैर्मेघैरिव दिवाकरः ||
६ ग
विराट पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रच्छादय़दमेय़ात्मा पार्थः शरशतैः कृपम् ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
प्रच्छादय़न्तो राजानमनुय़ान्ति महारथाः |
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
प्रच्छादय़न्तौ समरे शरजालैः परस्परम् |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
प्रच्छादय़ामास च तं महामेघो रविं यथा ||
५१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
कृष्ण उवाच
प्रच्छादय़ामास दिशश्च वाणैः; सर्वप्रय़त्नात्तपनीय़पुङ्खैः ||
३७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
प्रच्छादय़ामास महाभ्रजालै; र्वाय़ुः समुद्युक्तमिवांशुमन्तम् ||
६१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
प्रच्छादय़ित्व दिवि चन्द्रसूर्यौ; ननाद सोऽम्भोद इवातपान्ते ||
६२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
प्रच्छादय़िष्यञ्शरजालेन योधां; स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ||
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
प्रच्छेत्तार उत्तमाङ्गानि यूनां; तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ||
५२ ख
वन पर्व
अध्याय
२१६
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रच्युताः सहसा भान्ति चित्रास्तारागणा इव ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
प्रजगादोत्तरं काकः कत्थनो जातिलाघवात् ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
वसिष्ठ उवाच
प्रजग्मुः शरणं देवं व्रह्माणमजरं प्रभुम् ||
५७ ख