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शान्ति पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
पुरुषाणां समानानां दृश्यते महदन्तरम् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय १२५
वैशम्पाय़न उवाच
पुरुषाणां सुविपुलाः प्रणादाः सहसोत्थिताः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११६
युधिष्ठिर उवाच
पुरुषाणामय़ं तात दुर्वृत्तानां दुरात्मनाम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
पुरुषादं प्रतिभय़ं हिडिम्वेनैव संमितम् ||
१०० ख
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
पुरुषादानि चान्यानि जघ्नुः सत्त्वान्यनेकशः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
पुरुषादानि सत्त्वानि पक्षिणोऽथ मृगास्तथा |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
इन्द्र उवाच
पुरुषादानुचरिता भीरूणां कश्मलावहा |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०३
गुरुरु उवाच
पुरुषाधिष्ठितं भावं प्रकृतिः सूय़ते सदा |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
पुरुषाधिष्ठिता वुद्धिस्त्रिषु भावेषु वर्तते |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय १०९
मृग उवाच
पुरुषार्थफलं कान्तं यत्त्वय़ा वितथं कृतम् ||
१९ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १३३
मातो उवाच
पुरुषार्थमभिप्रेतं समाहर्तुमिहार्हसि ||
२९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २१५
भीष्म उवाच
पुरुषार्थस्य चाभावे नास्ति कश्चित्स्वकारकः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २११
भीष्म उवाच
पुरुषावस्थमव्यक्तं परमार्थं निवोधय़त् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
पुरुषाय़ पुराणाय़ शाश्वताय़ाव्ययाय़ च ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
पुरुषे चेन्द्रिय़ाणीह वेदितव्यानि कृत्स्नशः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४३
देवशर्मो उवाच
पुरुषे पापकं कर्म शुभं वा शुभकर्मणः ||
९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
पुरुषे पुरुषे वुद्धिः सा सा भवति शोभना |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
युधिष्ठिर उवाच
पुरुषेणासहाय़ेन किमु राज्यं पितामह ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०७
गुरुरु उवाच
पुरुषेभ्यो द्विजानाहुर्द्विजेभ्यो मन्त्रवादिनः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५०
नारद उवाच
पुरुषेषु च रूपेण पुरुषस्त्वं भविष्यसि |
३० क
वन पर्व
अध्याय २१९
मार्कण्डेय़ उवाच
पुरुषेषु यथा रुद्रस्तथार्या प्रमदास्वपि |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
महेश्वर उवाच
पुरुषेषु सुदुष्प्रज्ञाः क्लीवत्वमुपय़ान्ति ते ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
पुरुषैः कारय़ेत्कर्म वहुभिः सह कर्मिभिः ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
पुरुषैः कुरुशार्दूल समर्थैः प्रतिवाधने |
१० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
पुरुषैरलमर्थज्ञैर्विदितैः कुलशीलतः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
पुरुषो निष्क्रिय़श्चैव ज्ञानदृश्यश्च कथ्यते ||
२३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३१
युधिष्ठिर उवाच
पुरुषो भव गान्धारे युध्यस्व सुसमाहितः |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
पुरुषो मरुतां लोकमिन्द्रलोकं च गच्छति |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
पुरुषो यत्त आरोहेत्सोपानं युक्तमानसः ||
३२ ख
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
पुरुषोत्तमविज्ञातो योऽसौ चेदिषु दुर्मतिः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२
भीष्म उवाच
पुरुषोत्पादिता ये ते कथं द्वेष्याः सुतास्तव ||
४० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८९
दुर्योधन उवाच
पुरुषोऽभवद्युधि श्रेष्ठ तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
पुरुषोऽय़ं मम सुतः श्रद्धत्तां मे भवानिति ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
पुरुहीं प्रवरां मेनां मोघां घृतवतीं तथा ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय ११७
वैशम्पाय़न उवाच
पुरुहूतादय़ं जज्ञे कुन्त्यां सत्यपराक्रमः |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
पुरूरवस आय़ुः |
७ 6
द्रोण पर्व
अध्याय ११९
सञ्जय़ उवाच
पुरूरवस आय़ुस्तु आय़ुषो नहुषः स्मृतः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७३
भीष्म उवाच
पुरूरवस ऐलस्य संवादं मातरिश्वनः ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय ६९
विदुर उवाच
पुरूरवसमैलं त्वं वुद्ध्या जय़सि पाण्डव |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७५
भीष्म उवाच
पुरूरवा भरतश्चक्रवर्ती; यस्यान्वय़े भारताः सर्व एव |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६
भीष्म उवाच
पुरूरवाश्च राजर्षिर्द्विजैरभिहितः पुरा |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
पुरूरवास्ततो विद्वानिलाय़ां समपद्यत |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
वसिष्ठ उवाच
पुरे च भिक्षुर्भवतु यस्ते हरति पुष्करम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
पुरे जनपदे चैव ज्ञातव्यं चारचक्षुषा ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
पुरे जनपदे चैव तथा सामन्तराजसु |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
पुरे जनपदे चैव सर्वदोषान्निवर्तय़ेत् ||
११ ख
विराट पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
पुरे जनपदे वापि यत्र राजा युधिष्ठिरः ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
पुरेव त्रिपुरं दग्ध्वा दिवि देवो महेश्वरः ||
९८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
पुरेव त्रिपुरं दग्ध्वा दिवि देवो महेश्वरः ||
८३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
पुरेषु चाभवन्राजन्राजानो वै पृथक्पृथक् |
१८ क