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शान्ति पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
पश्य दुःखेषु दुःखानि भय़ेषु च भय़ान्यपि ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
पश्य दुःशासनं वीरमभिमन्युवशं गतम् ||
२० ख
स्त्री पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
पश्य दुर्योधनं कृष्ण शय़ानं रुधिरोक्षितम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
पश्य दुष्कृतकर्मत्वं व्यक्तमाय़ुःक्षय़ो मम ||
९८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
पश्य देवस्य माहात्म्यं महिमानं च नारद |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
पश्य देवस्य संय़ोगं वान्धवानां च निश्चय़म् |
११३ क
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
पश्य दैवोपघाताद्धि भुजवीर्यव्यपाश्रय़म् |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३७
विदुर उवाच
पश्य दोषान्पाण्डवैर्विग्रहे त्वं; यत्र व्यथेरन्नपि देवाः सशक्राः |
३८ क
वन पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
पश्य द्वैतवने पार्थ व्राह्मणानां तपस्विनाम् |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५४
भीम उवाच
पश्य ध्वजांश्च द्रवतो विशोक; नागान्हय़ान्पत्तिसङ्घांश्च सङ्ख्ये |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
पश्य नागोत्तमसुते भर्तारं निहतं मय़ा |
१३ क
वन पर्व
अध्याय १२९
लोमश उवाच
पश्य नानाविधाकारैरग्निभिर्निचितां महीम् |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
पश्य नीलाम्वुदनिभान्महामात्रैरधिष्ठितान् |
७२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
कुण्डधार उवाच
पश्य पश्य च भूय़स्त्वं कामानिच्छेत्कथं नरः |
४५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
पश्य पश्य यथा पार्थ गच्छन्त्येते महारथाः ||
२६ ख
विराट पर्व
अध्याय १९
द्रौपद्यु उवाच
पश्य पाण्डव मेऽवस्थां यथा नार्हामि वै तथा |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
पश्य पाण्डवमुख्येन यातां भूमिं किरीटिना |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
पश्य पार्थ धनुः श्रेष्ठं विकर्षन्साधु शोभते |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
पश्य पार्थ महासेनां धार्तराष्ट्रस्य संय़ुगे |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
पश्य पार्थ यथा द्रौणिः पार्षतस्य वधं प्रति |
४० ख
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
पश्य पुण्यकृतां लोकान्सशरीरो दिवं व्रज ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय १२६
लोमश उवाच
पश्य पुण्यतमे देशे कुरुक्षेत्रस्य मध्यतः ||
४२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
पश्य पुत्रांस्तथा भ्रातॄञ्ज्ञातीन्सम्वन्धिनस्तथा |
५७ क
विराट पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
पश्य पुत्रेण मे युद्धे तादृशाः कुरवो जिताः ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५४
भीष्म उवाच
पश्य भद्रे यथा भावाश्चित्रा दृष्टाः सुदुर्लभाः ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
पश्य भारत चापानि रुक्मपृष्ठानि धन्विनाम् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
पश्य भीम शुभान्देशान्देवाक्रीडान्समन्ततः |
७० क
द्रोण पर्व
अध्याय १५३
सञ्जय़ उवाच
पश्य भीमं महावाहो रक्षसा ग्रस्तमन्तिकात् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५२
सञ्जय़ उवाच
पश्य भीमं महावाहो राक्षसेन्द्रवशं गतम् |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
पश्य भीमेन नाराचैश्छिन्ना नागाः पतन्त्यमी |
६७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
व्राह्मण उवाच
पश्य भूतानि दुःखेन व्यतिषक्तानि सर्वशः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
पश्य मां पृथुताम्राक्ष वरुणोऽस्मि जलेश्वरः ||
२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
पश्य माधव दौरात्म्यं द्रोणपुत्रस्य मां प्रति ||
३३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १८
गान्धार्यु उवाच
पश्य माधव पुत्रान्मे शतसङ्ख्याञ्जितक्लमान् |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
पश्य माधव सैन्यानि धार्तराष्ट्रस्य संय़ुगे |
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५
शल्य उवाच
पश्य माहात्म्यमस्माकमृद्धिं च वरवर्णिनि ||
१९ ग
वन पर्व
अध्याय ३१
द्रौपद्यु उवाच
पश्य माय़ाप्रभावोऽय़मीश्वरेण यथा कृतः |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२५
दुर्योधन उवाच
पश्य मूर्धावसिक्तानामाचार्य कदनं कृतम् |
१० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
पश्य मे तपसो वीर्यं सत्यस्य च नराधम ||
१५ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १८०
भीष्म उवाच
पश्य मे धनुषो वीर्यं पश्य वाह्वोर्वलं च मे |
२६ क
वन पर्व
अध्याय २६८
मार्कण्डेय़ उवाच
पश्य मे धनुषो वीर्यं मानुषस्य निशाचर ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३३
श्रीभगवानु उवाच
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
पश्य मे भुजय़ोर्वीर्यमस्त्राणां च जनेश्वर |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७८
भीष्म उवाच
पश्य मे वाहुवीर्यं च विक्रमं चातिमानुषम् ||
३० ग
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
पश्य मे विक्रमं राजन्महेन्द्रस्येव संय़ुगे |
३१ क
विराट पर्व
अध्याय ३२
भीमसेन उवाच
पश्य मे सुमहत्कर्म युध्यतः सह शत्रुभिः ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
पश्य मे सूत विक्रान्तमिन्द्रस्येव महामृधे |
१७ क
वन पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
पश्य मे हय़संय़ाने शिक्षां केशवनन्दन ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
पश्य मेऽस्त्रवलं घोरं वाह्वोरिष्वसनस्य च |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९७
नारद उवाच
पश्य यद्यत्र ते कश्चिद्रोचते गुणतो वरः |
१६ क