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अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
पुनाति य इदं वेद वेद चाहं तथैव च |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
पुनात्यपुण्यान्पुरुषाञ्शतशोऽथ सहस्रशः ||
६३ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
पुनात्यासप्तमं चैव कुलं नास्त्यत्र संशय़ः ||
१२१ ग
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
पुनात्यासप्तमं चैव कुलं भरतसत्तम ||
५६ ग
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
पुनात्यासप्तमं राजन्कुलं नास्त्यत्र संशय़ः ||
८४ ख
आदि पर्व
अध्याय २२०
देवा ऊचुः
पुन्नाम्नो नरकात्पुत्रस्त्रातीति पितरं मुने |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
पुन्नाम्नो नरकाद्यस्मात्पितरं त्राय़ते सुतः |
३८ क
वन पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
पुपोष कौरवश्रेष्ठो धर्मराजो युधिष्ठिरः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय २९३
वैशम्पाय़न उवाच
पुपोष चैनं विधिवद्ववृधे स च वीर्यवान् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
वसिष्ठ उवाच
पुमांश्चैवापुमांश्चैव त्रैलिङ्ग्यं प्राकृतं स्मृतम् |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
पुमांसं वन्धय़ेत्प्राज्ञः शय़ने तप्त आय़से |
६० क
आदि पर्व
अध्याय ७४
देवय़ान्यु उवाच
पुमांसो ये हि निन्दन्ति वृत्तेनाभिजनेन च |
१० क
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
पुमांस्तत्र नरश्रेष्ठ गमनादेव सिध्यति |
५८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
पुमांस्तारय़ते गङ्गां वीक्ष्य स्पृष्ट्वावगाह्य च ||
६१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
पुमानाधिरथेः कश्चित्प्रमुखे स्थातुमर्हति ||
८३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८३
भृगुरु उवाच
पुमान्प्रजापतिस्तत्र शुक्रं तेजोमय़ं विदुः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८०
भीष्म उवाच
पुमान्यज्ञश्च सोमश्च न्याय़वृत्तो यथा भवेत् |
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय १८१
कर्ण उवाच
पुमान्योधय़ितुं शक्तः पाण्डवाद्वा किरीटिनः ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
पुम्भिः स्त्रीभिश्च सङ्घुष्टः प्रगीत इव चाभवत् |
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
पुम्भिर्विमिश्रा नार्यश्च ज्ञाताज्ञाताः स्वय़ेच्छय़ा ||
७६ ख
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
पुरं कामचरं दिव्यं पावकार्कसमप्रभम् ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
पुरं कुरूणां संवृत्तं द्रष्टुकामं जनार्दनम् |
२४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
पुरं च ते सुगुप्तं स्याद्दृढप्राकारतोरणम् |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९
भीष्म उवाच
पुरं जनपदं चैव शान्तिरिष्टेव पुष्यति ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय ५८
युधिष्ठिर उवाच
पुरं जनपदो भूमिरव्राह्मणधनैः सह |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
पुरं तद्भुवि विख्यातं नाम्ना भोजकटं नृप ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय २१
वासुदेव उवाच
पुरं नासाद्यत शरैस्ततो मां रोष आविशत् ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३१
कुन्त्यु उवाच
पुरं विषहते यस्मात्तस्मात्पुरुष उच्यते |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
भीष्म उवाच
पुरः पुरोहितं कृत्वा सर्वाण्यन्तःपुराणि च ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
पुरःसरो ममाद्यास्तु भीमः शस्त्रभृतां वरः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
पुरगुप्तिरविश्वासः पौरसङ्घातभेदनम् |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
पुरञ्जय़ो दृढरथः पताकी हेमपङ्कजः |
८५ क
आदि पर्व
अध्याय २२३
जरितारिरु उवाच
पुरतः कृच्छ्रकालस्य धीमाञ्जागर्ति पूरुषः |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
पुरत्रय़विसृष्ट्यर्थं मय़ं वव्रुर्महासुरम् |
१३ ख
वन पर्व
अध्याय २६८
मार्कण्डेय़ उवाच
पुरद्वारेषु सर्वेषु गुल्माः स्थावरजङ्गमाः |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
पुरन्दरं च जानीते परस्त्रीकामचारिणम् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय ९८
लोमश उवाच
पुरन्दरं पुरस्कृत्य व्रह्माणमुपतस्थिरे ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
पुरन्दरधनुःप्रख्या हस्तिकक्ष्या व्यराजत ||
६५ ख
वन पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
पुरन्दरनिय़ोगाच्च पञ्चाव्दमवसत्सुखी ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १६९
अर्जुन उवाच
पुरन्दरपुराद्धीदं विशिष्टमिति लक्षय़े ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४१
भीष्म उवाच
पुरन्दरश्च सन्त्रस्तो वभूव विमनास्तदा ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
पुरन्दरसमं युद्धे मरुद्गणसमं वले |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
पुरन्दरसमे क्रुद्धे निवृत्ते भरतर्षभे ||
७४ ख
वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
पुरन्दरस्तु तामाह मा भैर्नास्ति भय़ं तव |
८ क
वन पर्व
अध्याय २८५
सूर्य उवाच
पुरन्दरस्य कर्ण त्वं वुद्धिमेतामपानुद ||
१४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
पुरन्दरस्य संस्थानं प्रतिपेदे महामनाः ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
पुरन्दरार्थं तपसा प्रय़त्नतः; स्वय़ं कृतं यद्भुवनस्य सूनुना ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०२
कण्व उवाच
पुरन्दरोऽथ सञ्चिन्त्य वैनतेय़पराक्रमम् |
२५ क
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
पुरमानीय़ वद्ध्वा च चकार पुरुषव्रजम् ||
६४ ख
वन पर्व
अध्याय १६६
अर्जुन उवाच
पुरमासुरमाश्लिष्य प्राधमं तं शनैरहम् ||
११ ख