शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
प्रसादय़ित्वा राजानं गोमाय़ुर्वनमभ्यगात् ||
८५ ख
आदि पर्व
अध्याय
७३
देवय़ान्यु उवाच
प्रसादय़िष्ये शर्मिष्ठामित्युक्ता हि सखी मय़ा ||
३४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसादय़े त्वा दुर्धर्ष जीवतामभिमन्युजः ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसादय़े त्वा भगवन्नपराधं क्षमस्व मे |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
राजो उवाच
प्रसादय़े त्वा भगवन्पुत्रेणेच्छामि सङ्गतिम् |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५०
नारद उवाच
प्रसादय़े त्वा वरद प्रसादं कुरु मे प्रभो ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
प्रसादय़े त्वा विप्रर्षे किं ते सूर्यो निपात्यते ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसादय़े त्वां तत्राहं न मे त्वं क्रोद्धुमर्हसि ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
प्रसादय़े त्वां भगवंस्त्यक्तैषा हि पुरा मय़ा ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
४०
अर्जुन उवाच
प्रसादय़े त्वां भगवन्सर्वभूतनमस्कृत |
५९ क
वन पर्व
अध्याय
२८४
कर्ण उवाच
प्रसादय़े त्वां वरदं प्रणय़ाच्च व्रवीम्यहम् |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४
धृतराष्ट्र उवाच
प्रसादय़े त्वामतुलप्रभावं; त्वं नो गतिर्दर्शय़िता च धीरः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२३
कामन्द उवाच
प्रसादय़ेन्मधुरय़ वाचाप्यथ च कर्मणा |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३२
भीष्म उवाच
प्रसादय़ेन्मधुरय़ा वाचाप्यथ च कर्मणा |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
प्रसाधनं च केशानामञ्जनं दन्तधावनम् |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२४
भीष्म उवाच
प्रसाधनं च निष्क्रान्ते नाभिनन्दामि भर्तरि ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
प्रसाधनोपचारज्ञमदासं दासजीवनम् ||
१९ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
प्रसारितकरः प्राय़ात्स्तव्धकर्णेक्षणो द्रुतम् ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
प्रसार्य च यथाङ्गानि कूर्मः संहरते पुनः |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
प्रसार्य वाहुं सुदृढं सुपाणिं; क्रोधेन नृत्यन्निव धर्मराजः ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय
२२
वासुदेव उवाच
प्रसार्य वाहू पततः प्रसार्य चरणावपि |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
प्रसार्य वाहू स रथाद्गतो गां; सञ्छिन्नवर्मा कुरुनन्दनेन |
५१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
प्रसार्य विपुलौ वाहू पीनौ परिघसंनिभौ ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३९
व्यास उवाच
प्रसार्येह यथाङ्गानि कूर्मः संहरते पुनः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
जनक उवाच
प्रसार्येह यथाङ्गानि कूर्मः संहरते पुनः |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
प्रसिद्धं भाषितं दाने तेषां प्रत्यसनं पुनः |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
प्रसिद्धव्यवहारं च प्रशान्तमकुतोभय़म् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
१४७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसीद कपिशार्दूल दुरुक्तं क्षम्यतां मम ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
भीष्म उवाच
प्रसीद त्रिदशश्रेष्ठ पुत्रकामेन स क्रतुः |
३७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
प्रसीद दुर्योधन शाम्य पाण्डवै; रलं विरोधेन धिगस्तु विग्रहम् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
१४७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसीद नास्ति मे शक्तिरुत्थातुं जरय़ानघ |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
१७३
गन्धर्व उवाच
प्रसीद नृपतिश्रेष्ठ भर्ता मेऽय़ं विसृज्यताम् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४९
स्थाणुरु उवाच
प्रसीद भगवन्साधो वर एष वृतो मय़ा ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसीद भगवन्सोमे शापश्चैष निवर्त्यताम् ||
६३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
प्रसीद मम भक्तस्य दीनस्य कृपणस्य च |
१६४ क
वन पर्व
अध्याय
२३९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसीद मा त्यजात्मानं तुष्टश्च सुकृतं स्मर |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
प्रसीद मा वा यद्वा ते कार्यं तत्कुरु माचिरम् ||
२२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसीद मातर्मा गास्त्वं वनमद्य यशस्विनि |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
प्रसीद राजन्क्षम यन्मय़ोक्तं; काले भवान्वेत्स्यति तन्नमस्ते ||
९८ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
प्रसीद राजशार्दूल विनाशो दृश्यते महान् |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
७२
कच उवाच
प्रसीद सुभ्रु त्वं मह्यं गुरोर्गुरुतरी शुभे ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
प्रसीदन्ति च संस्थाय़ तदा व्रह्म प्रकाशते ||
१७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
प्रसीदन्ति नराणां च स्वरवर्णमनांसि च ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
युधिष्ठिर उवाच
प्रसीदन्तु भवन्तो मे प्रणतस्याभिय़ाचतः |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
प्रसीदेति व्रुवन्नेव गतसत्त्वोऽपतद्भुवि ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२३८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसीदेत्यपतद्भूमौ दूय़मानेन चेतसा |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
प्रसुप्तं निशि विश्वस्तं जघ्नुर्यौधिष्ठिरं वलम् ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८४
भीष्म उवाच
प्रसुप्तं वा मृतं वापि तुल्यं मन्यामहे वय़म् ||
१६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२२
गान्धार्यु उवाच
प्रसुप्तमिव शार्दूलं पश्य कृष्ण मनस्विनम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
२५२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसुप्तमुग्रं प्रपदेन हंसि; यः क्रुद्धमासेत्स्यसि जिष्णुमुग्रम् ||
७ ख