कर्ण पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
पूर्णचन्द्रार्कपद्मानां कान्तित्विड्गन्धतः समैः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
पूर्णपात्रमय़ीमाहुः पाकय़ज्ञस्य दक्षिणाम् ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
भीष्म उवाच
पूर्णमण्डलमालोक्य तावुत्थाय़ोपतस्थतुः ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
पूर्णमाकाशमभवद्रुक्मपुङ्खैरजिह्मगैः ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
पूर्णमापूरय़ंस्तेषां द्विषच्छोकावहोऽभवत् ||
५१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
पूर्णमिन्दुं यथा दृष्ट्वा नृणां दृष्टिः प्रसीदति |
७६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१००
भीष्म उवाच
पूर्णा गन्धर्वकन्याभिः सर्वकामदुहोऽक्षय़ाः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
पूर्णां हस्तिगवाश्वस्य वहुरत्नसमाकुलाम् ||
२३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
पूर्णां हस्तिगवाश्वस्य वार्ष्णेय़ न तु तच्चिरम् ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
५२
सूत उवाच
पूर्णाङ्गदः पूर्णमुखः प्रहसः शकुनिर्हरिः ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४५
सनत्सुजात उवाच
पूर्णात्पूर्णान्युद्धरन्ति पूर्णात्पूर्णानि चक्रिरे |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
पूर्णान्यक्षतपात्राणि रुचकान्रोचनांस्तथा |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
११७
गालव उवाच
पूर्णान्येवं शतान्यष्टौ तुरगाणां भवन्तु ते |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
पूर्णाहुतिभिरापूर्णास्तेऽभिपूर्यन्ति तेजसा ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
पूर्णाय़तविसृष्टेन क्षुरेण निशितेन च |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
पूर्णाय़तविसृष्टेन पीतेन निशितेन च |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
पूर्णाय़तविसृष्टेन सम्यक्प्रणिहितेन च |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
पूर्णाय़तविसृष्टेन सम्यक्प्रणिहितेन च |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
पूर्णाय़तविसृष्टेन स्वर्णपुङ्खेन पत्रिणा |
६८ क
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
पूर्णे तु द्वादशे वर्षे खाण्डवप्रस्थमाविशत् ||
१३ ग
विराट पर्व
अध्याय
२०
भीमसेन उवाच
पूर्णे त्रय़ोदशे वर्षे राज्ञो राज्ञी भविष्यसि ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
पूर्णे त्वष्टादशे वर्षे सावित्री तुष्टिमभ्यगात् |
१० ख
वन पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
पूर्णे पूर्णे त्रिरात्रे तु मासमेकं फलाशनः |
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६९
व्राह्मण उवाच
पूर्णे वर्षसहस्रान्ते क्षीणे कर्मणि दुष्कृते |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
पूर्णे वर्षसहस्रान्ते स कृत्वा दुष्करं तपः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
७९
यय़ातिरु उवाच
पूर्णे वर्षसहस्रे तु पुनर्दास्यामि यौवनम् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
पूर्णे वर्षसहस्रे तु पुनस्ते यौवनं त्वहम् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
पूर्णे वर्षसहस्रे तु प्रतिदास्यामि यौवनम् |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
७९
यय़ातिरु उवाच
पूर्णे वर्षसहस्रे तु प्रतिदास्यामि यौवनम् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
२५९
मार्कण्डेय़ उवाच
पूर्णे वर्षसहस्रे तु शिरश्छित्त्वा दशाननः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
वसुहोम उवाच
पूर्णे वर्षसहस्रे तु स गर्भः क्षुवतोऽपतत् ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८७
वैशम्पाय़न उवाच
पूर्णे शतसहस्रे तु विप्राणां तत्र भुञ्जताम् |
१० क
सभा पर्व
अध्याय
४५
दुर्योधन उवाच
पूर्णे शतसहस्रे तु विप्राणां परिविष्यताम् |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
पूर्णे शतसहस्रे द्वे पदातीनां नरोत्तमः |
३३ क
शल्य पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
पूर्णे शतसहस्रे द्वे हय़ानां भरतर्षभ |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
पूर्णेऽथ दिवसे विंशे यो भुङ्क्ते ह्येकभोजनम् |
८४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
पूर्णैर्द्वादशभिर्वर्षैर्व्रह्महा विप्रमुच्यते ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
पूर्यतः सागरस्येव चन्द्रस्योदय़नं प्रति ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
पूर्वं कर्तुर्गच्छति पुण्यपापं; पश्चात्त्वेतदनुय़ात्येव कर्ता ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
पूर्वं कुणिन्दविषय़े वशे चक्रे महीपतीन् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६९
व्राह्मण उवाच
पूर्वं कृच्छ्रं चरिष्येऽहं पश्चाच्छुभमिति प्रभो |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
पूर्वं कृत्वा विधानं च यात्राय़ां नगरे तथा ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
पूर्वं कृतय़ुगं नाम ततस्त्रेताय़ुगं विभो |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
पूर्वं कृतय़ुगे राजन्नैमिषेय़ास्तपस्विनः |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
युधिष्ठिर उवाच
पूर्वं च कथिता धर्मास्त्वय़ा मे कुरुनन्दन ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
पूर्वं चाभिगतं तत्र सोऽपश्यदृषिसत्तमम् ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
पूर्वं चाभिगतं सन्तो भजन्ते पूर्वसारिणः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६७
असित उवाच
पूर्वं चेतय़ते जन्तुरिन्द्रिय़ैर्विषय़ान्पृथक् |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
उमो उवाच
पूर्वं तथैव श्रीकान्तमुत्तरं पश्चिमं तथा ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११५
भीष्म उवाच
पूर्वं तु मनसा त्यक्त्वा तथा वाचाथ कर्मणा |
८ ख