द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
प्रय़ास्यामि ततः पश्चात्पदवीं सव्यसाचिनः ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
प्रय़ास्ये तत्र यत्रासौ मुमूर्षुः सैन्धवः स्थितः |
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
२८३
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रय़ाहि राजन्भद्रं ते घुष्टस्ते नगरे जय़ः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
प्रय़ाहि शीघ्रं कैतव्य व्रूय़ाश्चैव सुय़ोधनम् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२
कर्ण उवाच
प्रय़ाहि सूताशु यतः किरीटी; वृकोदरो धर्मसुतो यमौ च |
३० क
विराट पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़ाहीत्यव्रवीत्सूतं यत्र ते कुरवो गताः ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़ाह्येतद्रथानीकं मद्वाहुवलरक्षितः |
४३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
प्रय़ुक्तः शोभनो वज्र ईशानः प्रभुरव्ययः |
१४६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़ुक्तमस्त्रमस्त्रेण शाम्यतामिति वै मय़ा ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
प्रय़ुक्तरथनागाश्वं योत्स्यमानमशोभत ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३०
कुन्त्यु उवाच
प्रय़ुक्तवन्तः पूर्वं ते यय़ा चरसि मेधय़ा ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३०
कुन्त्यु उवाच
प्रय़ुक्ता स्वामिना सम्यगधर्मेभ्यश्च यच्छति ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
प्रय़ुक्ता स्वामिना सम्यगधर्मेभ्यश्च यच्छति ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
प्रय़ुक्तय़ोः कर्मपथि स्वकर्मणोः; फलं प्रय़ोक्ता लभते यथाविधि |
७८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़ुङ्क्ते पुरुषव्याघ्र तदिदं मय़ि वर्तते ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
प्रय़ुज्य कर्म रक्षोघ्नं क्षुद्रैः पार्थैर्निपातितः |
७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़ुज्य भवते पूजां योत्स्ये कृष्ण त्वय़ेत्युत ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
प्रय़ुज्यमानमाज्ञाय़ दैतेय़ास्त्रं महावलः |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
५६
जनमेजय़ उवाच
प्रय़ुज्यमानान्सङ्क्लेशान्क्षान्तवन्तो दुरात्मनाम् ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़ुज्यमानैर्विततो वेदैरिव महाध्वरः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२९९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़ुज्यापृच्छ्य भरतान्यथास्वान्स्वान्ययुर्गृहान् ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
तुलाधार उवाच
प्रय़ुञ्जते यानि यज्ञे सदा प्राज्ञा द्विजर्षभ |
२८ क
विराट पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़ुञ्जानौ महात्मानौ समरे तौ विचेरतुः ||
२१ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
प्रय़ुद्धानां प्रभग्नानां पुनरावर्ततामपि |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
प्रय़ोक्ता देवसृष्टानामस्त्राणां पृतनागतः ||
३७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
८९
भीष्म उवाच
प्रय़ोगं कारय़ेय़ुस्तान्यथा वलिकरांस्तथा ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५४
द्रोण उवाच
प्रय़ोगं चैव सर्वेषां दातुमर्हति मे भवान् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
१६५
अर्जुन उवाच
प्रय़ोगमुपसंहारमावृत्तिं च धनञ्जय़ |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१७२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़ोगे सुमहान्दोषो ह्यस्त्राणां कुरुनन्दन ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़ोजनं च निर्वृत्तमिह वासे ममार्जुन |
२८ क
सभा पर्व
अध्याय
६३
कर्ण उवाच
प्रय़ोजनं चात्मनि किं नु मन्यते; पराक्रमं पौरुषं चेह पार्थः |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़ोजनं चापि निवासकारणे; न विद्यते मे त्वदृते महाभुज |
३३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़ोजनं चिरं वृत्तं जीवितस्य च मेऽनघ |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
गुरुरु उवाच
प्रय़ोजनमतस्त्वत्र मार्गमिच्छन्ति संस्तुतम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४७
नागभार्यो उवाच
प्रय़ोजनमतिर्नित्यमेवं मोक्षाश्रमी भवेत् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
भीष्म उवाच
प्रय़ोजनमिदं सर्वमाश्रमस्य प्रवेशनम् ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
प्रय़ोजनेषु ये सक्ता न विशेषेषु भारत |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
प्रय़ोजय़ामास तदा नाम गुह्यमिदं मम ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय
१७४
वैशम्पाय़न उवाच
प्लक्षाक्षरौहीतकवेतसाश्च; स्नुहा वदर्यः खदिराः शिरीषाः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
प्लक्षाद्देवी स्रुता राजन्महापुण्या सरस्वती ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
प्लक्षानुदुम्वरवटानश्वत्थान्क्षीरिणस्तथा |
४२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
गौतम्यु उवाच
प्लवन्ते धर्मलघवो लोकेऽम्भसि यथा प्लवाः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४६
धृतराष्ट्र उवाच
प्लवमानमिवाकाशे के शूराः समवारय़न् ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
प्लवमानान्दर्शनीय़ानाकाशे गरुडानिव ||
४५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
प्लवमानान्हते द्रोणे सन्ननौकानिवार्णवे ||
४३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६२
विदुर उवाच
प्लवमानौ हि खचरौ पदातिरनुधावसि ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२७
व्यास उवाच
प्लवैरप्लववन्तो हि किं करिष्यन्त्यचेतसः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
नहुष उवाच
प्लवो भव महर्षे त्वं कुरु मूल्यविनिश्चय़म् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
प्लवोडुपप्रतारश्च नैवात्र मम रोचते ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
व्राह्मण उवाच
पय़ः पिवति यस्तस्या धेनुस्तस्येति निश्चय़ः ||
२३ ख