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कर्ण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
प्रगृह्य च धनुः श्रेष्ठं पार्थं विव्याध साय़कैः ||
४७ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
प्रगृह्य च महावेगं परासुकरणं दृढम् |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
प्रगृह्य च महाशक्तिं कालशक्तिमिवापराम् |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
प्रगृह्य च शरं घोरमेकं सर्पविषोपमम् |
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
प्रगृह्य चित्राणि धनूंषि वीरा; ज्यानेमिघोषैः प्रविकम्पय़न्तः |
४१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
प्रगृह्य चैव धनुषी जघ्नतुर्वै परस्परम् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७४
भीष्म उवाच
प्रगृह्य ज्वलितं शूलं दीप्यमानं स्वतेजसा ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
प्रगृह्य तरसा दोर्भ्यां पशुमारममारय़त् ||
६३ ख
वन पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रगृह्य तानभ्यपतत्तरस्वी; ततोऽव्रवीत्तिष्ठत तिष्ठतेति ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
प्रगृह्य तु ततः खड्गं जलसन्धो महावलः |
४० क
विराट पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रगृह्य दन्ताविव नागराजो; महर्षभं व्याघ्र इवाभ्यधावत् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय ४१
भगवानु उवाच
प्रगृह्य दानवाः शस्तास्त्वय़ा कृष्णेन च प्रभो ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय १०३
लोमश उवाच
प्रगृह्य दिव्यानि वराय़ुधानि; तान्दानवाञ्जघ्नुरदीनसत्त्वाः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २६
युधिष्ठिर उवाच
प्रगृह्य दुर्वुद्धिमनार्जवे रतं; पुत्रं मन्दं मूढममन्त्रिणं तु ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५३
सञ्जय़ उवाच
प्रगृह्य निशितौ खड्गावन्योन्यमभिजघ्नतुः ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय २१८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रगृह्य परिघं घोरं विचचारार्यमा अपि |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५२
भीष्म उवाच
प्रगृह्य राजा भृङ्गारं पाद्यमस्मै न्यवेदय़त् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रगृह्य रुचिरं वाहुं क्षान्तमित्येव फल्गुनम् ||
६१ ख
सभा पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रगृह्य रुचिरं वाहुमिदं वचनमव्रवीत् ||
२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
प्रगृह्य रेजतुः शूरौ देवपुत्रसमौ युधि ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
प्रगृह्य वलवद्वीरो धनुर्जलदनिस्वनम् |
२७ क
स्त्री पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रगृह्य वाहून्क्रोशन्त्यः पुत्रान्भ्रातॄन्पितॄनपि |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०१
भीष्म उवाच
प्रगृह्य वाहून्क्रोशेत भग्ना भग्नाः परा इति ||
४५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
प्रगृह्य विजय़ं वीरो धनुःश्रेष्ठं पुरातनम् |
३३ ख
शल्य पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
प्रगृह्य विपुलं खड्गं सहदेवाय़ प्राहिणोत् ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
प्रगृह्य विपुलं चापं ज्ञातिभिः परिवारितः |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
प्रगृह्य विपुलं चापं सिंहवद्विनदन्मुहुः ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रगृह्य विपुलं वाहुं सहदेवः प्रतापवान् ||
३७ ख
सभा पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रगृह्य विपुलं वृत्तं भुजं चन्दनरूषितम् ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
प्रगृह्य विपुलं शस्त्रमभिमन्युमुपाद्रवन् ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
प्रगृह्य विमलौ राजंस्तावन्योन्यमभिद्रुतौ |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय १७९
भीष्म उवाच
प्रगृह्य शङ्खप्रवरं ततः प्राधममुत्तमम् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३५
व्यास उवाच
प्रगृह्य शस्त्रमाय़ान्तमपि वेदान्तगं रणे |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
प्रगृह्य सुमहच्चापमिन्द्राशनिसमस्वनम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय २५२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रगृह्यमाणा तु महाजवेन; मुहुर्विनिःश्वस्य च राजपुत्री |
२४ क
विराट पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रगृह्याभ्यद्रवत्सूतान्दण्डपाणिरिवान्तकः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रगृह्याभ्यद्रवद्भीमः सैन्धवं कालचोदितम् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय १७
सूत उवाच
प्रगृह्याभ्यद्रवन्देवान्सहिता दैत्यदानवाः ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
प्रगृह्यामन्त्र्य गाण्डीवं शरांश्च नतपर्वणः ||
४१ ख
आदि पर्व
अध्याय ४२
सूत उवाच
प्रगृह्यारण्यमगमत्समीपं तस्य पन्नगः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रगृह्यासिममेय़ात्मा रूपमन्यच्चकार ह ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
प्रग्रहैश्चर्मपट्टैश्च तं वद्ध्वा पर्वतोपमम् |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
प्रग्रहो निग्रहोऽव्यग्रो नैकशृङ्गो गदाग्रजः ||
९४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
प्रघोषय़ेदथैवं च रक्षणार्थं पुरस्य वै ||
४८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
प्रचकर्ष महत्सैन्यं दुराधर्षो महामनाः ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय २६७
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रचकर्ष महत्सैन्यं हरीणां भीमतेजसाम् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
प्रचकार महामाय़ां मोहय़न्निव भारत ||
५५ ख
विराट पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रचक्रमे निधानाय़ शस्त्राणां भरतर्षभ ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रचक्रुर्वहुलां पूजां कुत्सन्तो धृतराष्ट्रजम् ||
४७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २३
व्राह्मण उवाच
प्रचचार पुनः प्राणस्तमपानोऽभ्यभाषत ||
१० ग