आदि पर्व
अध्याय
२८
सूत उवाच
प्रजग्मुः सहिता रुद्रैः पतगेन्द्रप्रधर्षिताः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रजग्मुर्जाह्नवीतीरे प्रमाणाख्यं महावटम् ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रजज्ञिरे महाभागा दक्षकन्यास्त्रय़ोदश ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रजज्ञे च ततः काले राजन्राजीवलोचना |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रजज्ञे त्वथ शार्दूली सिंहान्व्याघ्रांश्च भारत |
६३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
प्रजज्ञे भरतश्रेष्ठ शरसङ्घैः किरीटिनः ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रजज्ञे राक्षसी पुत्रं भीमसेनान्महावलम् ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
प्रजज्वाल च तेजस्वी कालाग्निरिव सङ्क्षय़े ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
प्रजज्वाल च रोषेण गहनेऽग्निरिवोत्थितः ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रजज्वाल ततः कोपाद्भगवान्हव्यवाहनः ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
प्रजज्वाल तथाविद्धा भीमेन महती गदा ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८५
भीष्म उवाच
प्रजज्वाल नभो राजन्धूमाय़न्ते दिशो दश |
२१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रजज्वाल महाज्वालं तेजोमण्डलसंवृतम् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२७४
मातलिरु उवाच
प्रजज्वाल महाज्वालेनाग्निनाभिपरिष्कृतः ||
२८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रजज्वाल महार्चिष्मद्युगान्तानलसंनिभम् ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
प्रजज्वाल यथा वह्निर्दहन्कक्षमिवैधितः ||
१०७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
प्रजज्वाल रणे क्रुद्धो हविषा हव्यवाडिव ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
प्रजज्वाल रणे पार्थो विधूम इव पावकः ||
१२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
प्रजज्वाल रणे भीष्मो विधूम इव पावकः ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रजज्वालातुलार्चिष्मान्स्वनादैः पूरय़ञ्जगत् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
प्रजनं चाप्युतान्यत्र न कथञ्चन विद्यते ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
प्रजनः सर्वभूतानामुपस्थोऽध्यात्ममुच्यते |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१
देवस्थान उवाच
प्रजनः स्वेषु दारेषु मार्दवं ह्रीरचापलम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
प्रजनः स्वेषु दारेषु शौचमद्रोह एव च ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३२
श्रीभगवानु उवाच
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
प्रजनाद्ध्यभिनिर्वृत्ताः सर्वे प्राणभृतो मुने |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
प्रजनानन्दय़ोः शेफो विसर्गे पाय़ुरिन्द्रिय़म् ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
प्रजनो हीय़ते तस्या रतिश्च भरतर्षभ |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् |
५५ क
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रजहार दुराधर्षे किरातसमरूपिणि ||
४३ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
प्रजहार महावेगां शक्तिं तस्य महोरसि ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१९
भीष्म उवाच
प्रजहास ततो हासं शुकः सम्प्रेक्ष्य भास्करम् ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
प्रजहास महाहासं कृते प्रतिकृतं पुनः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
९२
लोमश उवाच
प्रजहुः सर्वपापानि श्रेय़श्च प्रतिपेदिरे ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
प्रजह्यात्समरे प्राणांस्तस्माद्विन्दामि कश्मलम् ||
८८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
प्रजह्यात्समरे शत्रून्प्राणान्रक्षन्महाहवे ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय
४५
सूत उवाच
प्रजा इमास्तव पिता षष्टिं वर्षाण्यपालय़त् |
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
वसुहोम उवाच
प्रजा जाग्रति लोकेऽस्मिन्दण्डो जागर्ति तासु च |
५० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
सौदास उवाच
प्रजा निसर्गाद्विप्रान्वै क्षत्रिय़ाः पूजय़न्ति ह |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८३
पराशर उवाच
प्रजा भृत्यांश्च पुत्रांश्च स्वधर्मेणानुपालय़ ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
प्रजा यस्य विवर्धन्ते सरसीव महोत्पलम् |
१०६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
प्रजा रक्षति यः सम्यग्धर्म एव स केवलः ||
१० ग
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
प्रजा राजभय़ादेव न खादन्ति परस्परम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८३
भृगुरु उवाच
प्रजा विपरिवर्तन्ते स्वैः स्वैः कर्मभिरावृताः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
प्रजा विवर्धते राजन्ननन्तां चाश्नुते श्रिय़म् ||
४७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२९
समुद्र उवाच
प्रजा वृषलतां प्राप्ता व्राह्मणानामदर्शनात् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२१९
स्कन्द उवाच
प्रजा वो दद्मि कष्टं तु भवतीभिरुदाहृतम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८१
भृगुरु उवाच
प्रजा व्राह्मणसंस्काराः स्वधर्मकृतनिश्चय़ाः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
प्रजां च लभते काञ्चित्पुनर्द्वन्द्वेषु मज्जति ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
धृतराष्ट्र उवाच
प्रजाः कथं सूतपुत्र सम्प्राप्ताः श्यामतामिह ||
१८ ख