आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
प्रजाः कुरुकुलश्रेष्ठ पाण्डवाञ्शीलभूषणान् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७२
भीष्म उवाच
प्रजाः क्लिश्नात्ययोगेन कामद्वेषसमन्वितः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
प्रजाः क्लिश्नात्ययोगेन प्रविश्यति तदा कलिः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
प्रजाः पशूंश्च स्वर्गं च हन्ति यज्ञो ह्यदक्षिणः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रजाः पालय़ धर्मेण यथेन्द्रस्त्रिदिवं नृप ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
प्रजाः पालय़ते यो हि धर्मेण मनुजाधिपः |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
प्रजाः पालय़तोऽसम्यगधर्मेणेह भूपतेः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
प्रजाः संरक्षितुं सम्यग्दण्डनीतिसमाहितः ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
प्रजाः समुदिताः सर्वाः सत्यधर्मपराय़णाः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
१०३
लोमश उवाच
प्रजाः सर्वा महाराज विप्रजग्मुर्यथागतम् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९
युधिष्ठिर उवाच
प्रजाः सर्वाः स्वधर्मस्थाः समः प्राणभृतः प्रति ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
प्रजाः सृजेति व्यादिष्टः पूर्वं दक्षः स्वय़म्भुवा |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९४
मनुरु उवाच
प्रजाः सृष्टा मनसा कर्मणा च; द्वावप्येतौ सत्पथौ लोकजुष्टौ |
१२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
प्रजाः सृष्टाः परेणेमाः किं करिष्याम्यनेन वै ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४८
भीष्म उवाच
प्रजाः सृष्ट्वा महातेजाः प्रजासर्गे पितामहः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
प्रजागरं ततः पर्व धृतराष्ट्रस्य चिन्तय़ा ||
५० ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
प्रजागरः सम्प्रजज्ञे धृतराष्ट्रस्य चिन्तय़ा ||
१४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
प्रजागरः सर्वजनमाविवेश विशां पते ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रजागरस्थौ ध्रुवमप्रशान्तौ; धर्मेण सत्येन च वार्यमाणौ ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रजागरे पपश्यामि विचित्रं देहमात्मनः ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
प्रजातेरभवत्पुत्रः क्षुप इत्यभिविश्रुतः |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
प्रजानन्न च योधान्स्वान्परस्परजिघांसय़ा ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
प्रजानां कल्मषे मग्नोऽकीर्तिं पापं च विन्दति ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
भीष्म उवाच
प्रजानां क्रोशतीनां वै नैवाक्षुभ्यत मे मनः |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
प्रजानां पतिमव्यग्रं भूतानां पतिमव्ययम् ||
२९ ग
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रजानां पतय़ः सर्वे सप्त चैव महर्षय़ः ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
प्रजानां पतय़ः सर्वे सरितः पन्नगा नगाः |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१००
पृथिव्यु उवाच
प्रजानां पतय़े चैव पृथग्घोमो विधीय़ते |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०१
भीष्म उवाच
प्रजानां पतय़ो ये स्म दिक्षु प्रत्येकशः स्मृताः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रजानां पालनं धर्मो राज्ञां राजीवलोचन |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१
देवस्थान उवाच
प्रजानां पालने युक्ता दममुत्तममास्थिताः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१९३
उत्तङ्क उवाच
प्रजानां पालने यो वै पुरा राजर्षिभिः कृतः |
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
प्रजानां रक्षणं कार्यं न कार्यं कर्म गर्हितम् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
प्रजानां रक्षिता साधुर्दण्डनीतिविशारदः ||
९७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रजानां रेमिरे तुल्यं नेत्राणि हृदय़ानि च ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
प्रजानां सङ्क्षय़ो न स्यात्कथं तन्मे वदाभिभो ||
५८ ख
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
प्रजानां सन्धिमूलं हि जन्म विद्धि शुभानने ||
२९ ख
विराट पर्व
अध्याय
२
अर्जुन उवाच
प्रजानां समुदाचारं वहु कर्मकृतं वदन् |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
प्रजानां हितकामेन त्वगस्त्येन महात्मना |
५६ क
आदि पर्व
अध्याय
३४
व्रह्मो उवाच
प्रजानां हितकामोऽहं न निवारितवांस्तदा ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
प्रजानां हितमन्विच्छन्धर्ममूलं विशां पते ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
वसुहोम उवाच
प्रजानामधिपं श्रेष्ठं सर्वधर्मभृतामपि ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५७
भीष्म उवाच
प्रजानामनुकम्पार्थं गीतं राज्ञा विचख्नुना ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रजानामनुरागं च चिन्तय़ानो व्यदह्यत ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रजानामन्नकामानामन्योन्यपरिभक्षणात् |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
प्रजानामपचारेण स्वस्ति तेऽस्तु महासुर ||
११० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
प्रजानामभिवृद्धानां युगान्ते पर्युपस्थिते |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
प्रजानामिव सङ्क्रुद्धं शूलपाणिमवस्थितम् |
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९४
भीष्म उवाच
प्रजापतिं श्रेष्ठतमं पृथिव्यां; देवर्षिसङ्घप्रवरो महर्षिः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रजापतिः प्रजा दक्षः सिसृक्षुर्जनमेजय़ ||
७ ख