द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
प्रादुरासन्हर्षय़न्तः सौभद्रमपलाय़िनम् |
७८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
प्रादुरासन्हृषीकेशाः शतशोऽथ सहस्रशः ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
प्रादुरासीच्छराणां च सुमुक्तानां सुदारुणः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
प्रादुरासीत्कृते द्रोणे हर्षः सेनापतौ तदा ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रादुरासीत्खरस्पर्शः सङ्ग्राममभिचोदय़न् ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
प्रादुरासीत्ततो वाय़ुः क्षोभय़ाणो नभस्तलम् |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रादुरासीत्तदा तेन वुवुधे स जनव्रजः ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
प्रादुरासीत्तदा राजंस्त्वत्सैन्ये भरतर्षभ |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
प्रादुरासीदुभय़तो भेरीशव्दश्च दारुणः ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
प्रादुरासीदुभय़तो राजन्मध्यङ्गतेऽहनि ||
४३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रादुरासीद्यथा पूर्वं कुरुपाण्डवसेनय़ोः ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
प्रादुरासीद्रजस्तीव्रं न प्राज्ञाय़त किञ्चन ||
४० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रादुरासीन्महाञ्शव्दः खे शरीरं न दृश्यते |
९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रादुरासीन्महाञ्शव्दः पक्षिणां पततामिव ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
प्रादुरासीन्महाञ्शव्दः शराणां नतपर्वणाम् |
५४ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
प्रादुरासीन्महाञ्शव्दः श्रुत्वा तद्वलसङ्क्षय़म् ||
६४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
प्रादुरासीन्महाञ्शव्दो दिक्षु सर्वासु भारत ||
३५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रादुरासीन्महाञ्शव्दो व्यथय़न्भुवनान्युत ||
१९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रादुरासीन्महाराज पृथां श्रुत्वा तथागताम् ||
४२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
प्रादुरासीन्महाराज सृष्टय़ोर्वज्रय़ोरिव ||
३७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
प्रादुरासीन्महाशव्दस्तालानां पततामिव ||
६५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
प्रादुरासीन्महाशव्दो भीरूणां भय़वर्धनः |
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४
व्यास उवाच
प्रादुरास्तां ततस्तस्य करौ जलजसंनिभौ |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रादुरास्तां तथा दोर्भ्यां सङ्कर्षणधनञ्जय़ौ |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२४५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रादुर्भवति तद्योगात्कल्याणमतिरेव सः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७६
भृगुरु उवाच
प्रादुर्भवत्यूर्ध्वशिखः कृत्वा वितिमिरं नभः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८२
नारद उवाच
प्रादुर्भवन्ति वार्ष्णेय़ स्वकृता यदि वान्यतः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
व्यास उवाच
प्रादुर्भावं गमिष्यामि तदात्मज्ञानदेशिकः ||
८५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
प्रादुर्भावः कंसहेतोर्मथुराय़ां भविष्यति ||
८२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
प्रादुर्भावगतश्चाहं सुरकार्येषु नित्यदा |
६१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
प्रादुर्भावश्च भूतानां देहन्यासस्तथैव च |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
नारद उवाच
प्रादुर्भावाश्च कथिता भविष्यन्ति हि ये यथा ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२०
भीष्म उवाच
प्रादुर्भूताः क्षणे तस्मिंस्तदद्भुतमिवाभवत् ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
सञ्जय़ उवाच
प्रादुर्भूते ततस्तस्मिन्नस्त्रे नाराय़णे तदा |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
प्रादुर्भूतेषु चैतेषु भय़माहुरुपस्थितम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
प्रादुर्भूतोऽस्मि ते मित्रं सुहृत्त्वं च मम त्वय़ि |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४९
नारद उवाच
प्रादुर्वभूव विश्वेभ्यः खेभ्यो नारी महात्मनः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
प्रादुर्वभूव सुमहानग्निः कालानलोपमः ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय
९९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रादुर्वभूवाविदितः क्षणेन कुरुनन्दन ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
प्रादुर्वभूवुः सहिताः शक्रस्येवामरा दिवि ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
प्रादुर्वभूवुर्वैन्यस्य चिन्तनादेव पाण्डव |
१२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
प्रादुश्चकार तद्दिव्यमस्त्रं नाराय़णं तदा ||
६० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३२
सञ्जय़ उवाच
प्रादुश्चकारास्त्रमहीनतेजा; माहेन्द्रमन्यत्स जघान तेऽस्त्रे ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
प्रादुश्चक्रुर्महात्मानः सिंहनादरवानपि ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
प्रादुश्चक्रे ततः पार्थः शाक्रमस्त्रं महारथः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
प्रादुश्चक्रे ततो द्रौणिरस्त्रं नाराय़णं तदा |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
प्रादुश्चक्रे ततो व्राह्ममस्त्रमस्त्रविदां वरः ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८५
भीष्म उवाच
प्रादुश्चक्रे तदा व्राह्मं परमास्त्रं महाव्रतः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
प्रादुश्चक्रे तदाग्नेय़मस्त्रमस्त्रविदां वरः ||
५१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८२
भीष्म उवाच
प्रादुश्चक्रे दिव्यमस्त्रं महात्मा; क्रोधाविष्टो हैहय़ेशप्रमाथी ||
१२ ख