chevron_left  प्रज्ञाचक्षुरचक्षुष्ट्वाद्धृतराष्ट्रोarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रज्ञाचक्षुरचक्षुष्ट्वाद्धृतराष्ट्रो जनेश्वरः |
५ क
वन पर्व
अध्याय २००
व्याध उवाच
प्रज्ञाचक्षुर्नर इह दोषं नैवानुरुध्यते |
४८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
प्रज्ञाचक्षुर्यः प्रणेता कुरूणां; वहुश्रुतो वृद्धसेवी मनीषी |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६५
भीष्म उवाच
प्रज्ञाचक्षुर्यदा कामे दोषमेवानुपश्यति |
१९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
प्रज्ञाचक्षुश्च दुर्धर्षः कां गतिं प्रतिपत्स्यते ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय ११७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रज्ञाचक्षुश्च राजर्षिः क्षत्ता च विदुरः स्वय़म् ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रज्ञाचक्षुषमासीनं शकुनिः सौवलस्तदा ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रज्ञाचक्षुषमासीनमुवाचाभ्येत्य सत्वरः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
युधिष्ठिर उवाच
प्रज्ञातलक्षणे राजन्नमित्रे मित्रतां गते |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १११
भीष्म उवाच
प्रज्ञानं शौचमेवेह शरीरस्य विशेषतः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
मुनिरु उवाच
प्रज्ञानतृप्तो विक्रान्तस्त्वद्विधो नानुशोचति ||
४७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३४४
व्राह्मण उवाच
प्रज्ञानवचनाद्योऽय़मुपदेशो हि मे कृतः |
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२८
व्यास उवाच
प्रज्ञानाभिः सर्वतन्त्रप्रतोदो ज्ञानसारथिः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय २७२
भीष्म उवाच
प्रज्ञानाशश्च वलवान्क्षणेन समपद्यत ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२३
कामन्द उवाच
प्रज्ञाप्रणाशको मोहस्तथा धर्मार्थनाशकः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४७
शौनक उवाच
प्रज्ञाप्रासादमारुह्य अशोच्यः शोचते जनान् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७
युधिष्ठिर उवाच
प्रज्ञाप्रासादमारुह्य नशोच्याञ्शोचतो जनान् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
प्रज्ञाप्रासादमारुह्य मुह्यतो महतो जनान् |
९३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
प्रज्ञाभिमानिनं चैव श्रीर्भय़ान्नोपसर्पति ||
५० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३७
विदुर उवाच
प्रज्ञाभिमानी प्रतिकूलवादी; त्याज्यः स तादृक्त्वरय़ैव भृत्यः ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
विदुर उवाच
प्रज्ञामेवागमय़ति यः प्राज्ञेभ्यः स पण्डितः |
५६ क
स्त्री पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रज्ञाम्भसा महाराज निर्वापय़ सदा सदा ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१५
भीष्म उवाच
प्रज्ञालाभात्तु दैतेय़ उताहो धृतिमत्तय़ा |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
प्रज्ञालाभे हि पुरुषः शास्त्राण्येवान्ववेक्षते |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
प्रज्ञालाभो हि भूतानामुत्तमः प्रतिभाति माम् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२९
व्यास उवाच
प्रज्ञावद्भिः प्रकॢप्तानि यानासनगृहाणि च ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२९
व्यास उवाच
प्रज्ञावन्तः प्रवक्तारो ज्ञानवद्भिरनुष्ठिताः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय १९७
विदुर उवाच
प्रज्ञावन्तौ नरश्रेष्ठावस्मिँल्लोके नराधिप |
९ क
वन पर्व
अध्याय २४५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रज्ञावांस्त्वेव पुरुषः संय़ुक्तः परय़ा धिय़ा |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रज्ञावान्कुरुवृद्धोऽय़ं सर्वेषां नः पितामहः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
प्रज्ञावान्वा वुध्यमानोऽपि धर्मं; संरम्भाद्वा सोऽपि भूतेरपैति ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
गृध्र उवाच
प्रज्ञाविज्ञानय़ुक्तेन वुद्धिसञ्ज्ञाप्रदाय़िना |
५९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४०
विदुर उवाच
प्रज्ञावृद्धं धर्मवृद्धं स्ववन्धुं; विद्यावृद्धं वय़सा चापि वृद्धम् |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३७
विदुर उवाच
प्रज्ञाशरेणाभिहतस्य जन्तो; श्चिकित्सकाः सन्ति न चौषधानि |
५४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २८
युधिष्ठिर उवाच
प्रज्ञाश्रुताभ्यां वृत्तेन शीलेन च यथा भवान् |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २३
भीष्म उवाच
प्रज्ञाश्रुताभ्यां वृत्तेन शीलेन च समन्वितः |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
प्रज्ञासमवतारोऽय़ं कविभिः सम्भृतं मधु ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११५
भीष्म उवाच
प्रज्ञाय़न्ते यथा भावास्तथा चित्तं निरुध्यते ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २८
युधिष्ठिर उवाच
प्रज्ञैषिणो ये च हि कर्म चक्रु; र्नास्त्यन्ततो नास्ति नास्तीति मन्ये ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२८
व्यास उवाच
प्रज्ञय़ा निर्मितैर्धीरास्तारय़न्त्यवुधान्प्लवैः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
प्रज्ञय़ा प्रापितार्थो हि वलिरैश्वर्यसङ्क्षय़े |
३ क
स्त्री पर्व
अध्याय २
विदुर उवाच
प्रज्ञय़ा मानसं दुःखं हन्याच्छारीरमौषधैः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१७
नारद उवाच
प्रज्ञय़ा मानसं दुःखं हन्याच्छारीरमौषधैः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय २०६
व्याध उवाच
प्रज्ञय़ा मानसं दुःखं हन्याच्छारीरमौषधैः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रज्ञय़ा रहितो दुःखी नित्यं भीतो वनेचरः |
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय १६२
गन्धर्व उवाच
प्रज्ञय़ा वय़सा चैव वृद्धः कीर्त्या दमेन च ||
५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
प्रज्ञय़ा हि स्वय़ा युक्तास्तां च निन्दन्ति मानवाः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६
द्रुपद उवाच
प्रज्ञय़ानवमश्चासि शुक्रेणाङ्गिरसेन च ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
प्रज्ञय़ाभ्यधिकाञ्शूरान्गुणय़ुक्तान्वहूनपि |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
प्रज्वलन्ती महोल्केव तिष्ठत्यस्य हि वासवी |
३३ ख