शान्ति पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
प्राप्य राज्यं महातेजा धर्मराजो युधिष्ठिरः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
२००
वैशम्पाय़न उवाच
प्राप्य राज्यं महातेजाः सत्यसन्धो युधिष्ठिरः |
६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
प्राप्य राज्यं महात्मानः पाण्डवा हतशत्रवः |
४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१
जनमेजय़ उवाच
प्राप्य राज्यं महाभागाः पाण्डवा मे पितामहाः |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
युधिष्ठिर उवाच
प्राप्य राज्यानि शतशो महीं जित्वापि भारत |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
प्राप्य लोकान्सुय़ुद्धेन क्षिप्रमेव यिय़ासवः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१३
भीष्म उवाच
प्राप्य लोके च सत्कारं स्वर्गं वै प्रेत्य गच्छति ||
१२ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
प्राप्य वर्तय़से नूनं तेनासि हरिणः कृशः ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
२९९
वैशम्पाय़न उवाच
प्राप्य वामनरूपेण प्रच्छन्नं व्रह्मरूपिणा |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
प्राप्य वैश्रवणावासं किं वक्ष्यथ धनेश्वरम् ||
५४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
प्राप्य शस्त्रेण निधनं प्राप्स्यन्ति गतिमुत्तमाम् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
प्राप्य श्वेतं महाद्वीपं तच्चित्तास्तद्दिदृक्षवः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
वैशम्पाय़न उवाच
प्राप्य श्वेतं महाद्वीपं दृष्ट्वा च हरिमव्ययम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२५
भीष्म उवाच
प्राप्य श्वेतं महाद्वीपं नारदो भगवानृषिः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
प्राप्य श्वेतं महाद्वीपं भूत्वा चन्द्रप्रभो नरः |
११७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३७
व्यास उवाच
प्राप्य संस्कारमेताभ्यामाश्रमाभ्यां ततः परम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२३५
वैशम्पाय़न उवाच
प्राप्य सर्वानभिप्राय़ांस्ततो व्रजत माचिरम् ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
प्राप्यते कर्मणा सर्वं न दैवादकृतात्मना ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
भीष्म उवाच
प्राप्यते च यथा शीलं तमुपाय़ं वदस्व मे ||
६२ ख
सभा पर्व
अध्याय
१२
युधिष्ठिर उवाच
प्राप्यते येन तत्ते ह विदितं कृष्ण सर्वशः ||
३५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
प्राप्यते सुमहद्दुःखं विषाग्निप्रतिमं विभो ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५६
भीष्म उवाच
प्राप्यते हि यथा सत्यं तच्च श्रोतुं त्वमर्हसि |
७ क
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
प्राप्यन्ते तानि तीर्थानि सद्भिः शिष्टानुदर्शिभिः ||
९१ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
प्राप्यन्ते पार्थिवैरेते समृद्धैर्वा नरैः क्वचित् |
३६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
प्राप्यन्तेऽर्थैः सुलघुभिः प्रभावाद्विदुरस्य वै ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
११५
वैशम्पाय़न उवाच
प्राप्याधिपत्यमिन्द्रेण यज्ञैरिष्टं यशोर्थिना ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
प्राप्यानुज्ञां गुरुजनादहं तार्क्ष्यमचिन्तय़म् |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
प्राप्यापदं न व्यथते कदा चि; दुद्योगमन्विच्छति चाप्रमत्तः |
८८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
प्राप्याप्यङ्कुरहेतुत्वमवीजत्वान्न जाय़ते ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
प्राप्यार्थकालं च भवेदनर्थः; कथं नु तत्स्यादिति तत्कुतः स्यात् ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६८
भीष्म उवाच
प्राप्यार्थमुपय़ुञ्जीत धर्मे कामं विवर्जय़ेत् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
प्राप्यावध्यं व्रह्मपुरं राजेव स्यामहं सुखी ||
५२ ख
वन पर्व
अध्याय
२५५
वैशम्पाय़न उवाच
प्राप्याश्रमपदं राजन्द्रौपदीं परिसान्त्वय़ ||
४१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
प्राप्याष्टगुणमैश्वर्यं ये न यान्ति च विस्मय़म् |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९७
मनुरु उवाच
प्राप्येन्द्रिय़गुणान्पञ्च सोऽस्तमावृत्य गच्छति ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
भीष्म उवाच
प्राप्येह लोके सत्कारं सुगतिं प्रतिपद्यते ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
भीष्म उवाच
प्राप्येह लोके सत्कारं स्वर्गं समभिपद्यते ||
३१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
प्राप्स्यते च भवान्पुण्यं धर्मे च परमां स्थितिम् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
प्राप्स्यते चाप्यसौ क्षुद्रः सैन्धवो वालघातकः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
प्राप्स्यतो वानरत्वं हि प्रजापतिसुतावृषी ||
७९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
प्राप्स्यन्ति पुरुषव्याघ्राः प्राणांस्त्यक्त्वा महाहवे ||
४६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
प्राप्स्यसि त्वममित्रघ्न सहितः कुरुपाण्डवैः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
प्राप्स्यसे च यदिष्टं तत्साङ्ख्ययोगेप्सितं पदम् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२३
भीष्म उवाच
प्राप्स्यसे त्वन्नपानानि यानि दास्यसि कानिचित् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
८३
नारद उवाच
प्राप्स्यसे महतीं कीर्तिं यथा राजा महाभिषः ||
१०७ ख
वन पर्व
अध्याय
१९३
उत्तङ्क उवाच
प्राप्स्यसे महतीं कीर्तिं शाश्वतीमव्ययां ध्रुवाम् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९७
भीष्म उवाच
प्राप्स्यसे विपुलां वुद्धिं तथा श्रेय़ोऽभिपत्स्यसे ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६९
व्राह्मण उवाच
प्राप्स्यसे शाश्वताँल्लोकाञ्जितान्स्वेनैव कर्मणा ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
भीष्म उवाच
प्राप्स्यसेऽस्मदनुध्यानान्मा च त्वां ग्लानिरास्पृशेत् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
१८३
मार्कण्डेय़ उवाच
प्राप्स्यामः फलमत्यन्तं वहुलं निरुपद्रवम् |
३ क