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शान्ति पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
पितृभ्यो देवताभ्यश्च गता वैवस्वतक्षय़म् ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४७
वासुदेव उवाच
पितृभ्रातॄन्परित्यज्य प्राप्तवान्पुरमृद्धिमत् ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय २
शौनक उवाच
पितृमातृमय़ी सिद्धिः प्राप्ता कर्ममय़ी च ते |
७८ क
स्त्री पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
पितृमेधाश्च केषाञ्चिदवर्तन्त महात्मनाम् |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय ११७
वैशम्पाय़न उवाच
पितृलोकं गतः पाण्डुरितः सप्तदशेऽहनि ||
२७ ख
सभा पर्व
अध्याय ११
युधिष्ठिर उवाच
पितृलोकगतश्चापि त्वय़ा विप्र पिता मम |
५० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
श्वशुर उवाच
पितृलोकगताः सर्वे तारिताः पितरस्त्वय़ा |
६१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६९
व्राह्मण उवाच
पितृलोकमहं प्राप्य धर्मराजमुपागमम् ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
महेश्वर उवाच
पितृलोकसमीपस्थास्त उञ्छन्ति यथाविधि |
४४ क
शल्य पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
पितृलोकाच्च तं यान्तं याम्यं लोकमपश्यत ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय १७०
गन्धर्व उवाच
पितृलोकादुपागम्य सर्व ऊचुरिदं वचः ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४२
सनत्सुजात उवाच
पितृलोके राज्यमनुशास्ति देवः; शिवः शिवानामशिवोऽशिवानाम् ||
६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २०
गान्धार्यु उवाच
पितृलोके समेत्यान्यां मामिवामन्त्रय़िष्यसि ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४६
भीष्म उवाच
पितृवंशमिमं पश्य त्वत्कृते नरकं गतम् |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
विदुर उवाच
पितृवत्त्वय़ि वर्तन्ते तेषु वर्तस्व पुत्रवत् ||
६७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
पितृवत्पालय़ेद्वैश्यो युक्तः सर्वपशूनिह |
२२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
पितृवद्भ्रातृवच्चैव भवन्तः पालय़न्ति नः |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६
भीष्म उवाच
पितृवनभवनाभं दृश्यते चामराणां; न च फलति विकर्मा जीवलोकेन दैवम् ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
पितृवित्ताम्वुदेवेशानपि यो योद्धुमुत्सहेत् ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
पितृविप्रवधेनाहमार्तो वै पाण्डवाग्रज |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय १०९
भीष्म उवाच
पितृवृत्त्या त्विमं लोकं मातृवृत्त्या तथापरम् |
८ ख
आदि पर्व
अध्याय ११३
वैशम्पाय़न उवाच
पितृवेश्मन्यहं वाला निय़ुक्तातिथिपूजने |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
पितृव्येण परित्यक्तः पार्थद्वेषाद्दुरात्मना ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७४
युधिष्ठिर उवाच
पितृशुश्रूषणे किं च मातृशुश्रूषणे तथा |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१९
भीष्म उवाच
पितृशुश्रूषय़ा सिद्धिं सम्प्राप्तोऽय़मनुत्तमाम् ||
२१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३२२
भीष्म उवाच
पितृशेषेण विप्रांश्च संविभज्याश्रितांश्च सः |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
पितृशोकसमाविष्टे सह मात्रा परन्तप ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
पितृशोकाभिसन्तप्तो विषादार्तोऽस्य वै पिता |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
युधिष्ठिर उवाच
पितृष्वसामभ्यवदद्यथाविधि; सम्पूजितश्चाप्यगमत्प्रदक्षिणम् ||
५१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
पितृष्वसामातुलजौ भ्रातरावपराजितौ |
६४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
पितृष्वसारं गोविन्दः सोऽभ्यगच्छदरिन्दमः ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
पितृष्वसारं मा भैषीरित्युवाच जनार्दनः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
पितृष्वसारं शोचन्तीं शौरिः पार्थसखः पृथाम् ||
८९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
युधिष्ठिर उवाच
पितृष्वसाय़ाश्च तथा महाभुजो; विनिर्ययौ पौरजनाभिसंवृतः ||
५३ ख
सभा पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
पितृष्वसुः कृते दुःखं सुमहन्मर्षय़ाम्यहम् |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय १८३
वैशम्पाय़न उवाच
पितृष्वसुश्चापि यदुप्रवीरा; वगृह्णतां भारतमुख्य पादौ ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
पितृसद्मानि सततं देवताय़तनानि च |
१० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
अश्वत्थामो उवाच
पितृहन्तॄनहं हत्वा पाञ्चालान्निशि सौप्तिके |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०२
नारद उवाच
पितृहीनमपि ह्येनं गुणतो वरय़ामहे |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९२
भीष्म उवाच
पितृय़ज्ञानकुर्वन्त विधिदृष्टेन कर्मणा ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६५
इन्द्र उवाच
पितृय़ज्ञास्तथा कूपाः प्रपाश्च शय़नानि च |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
पितॄंश्च पितृलोकस्थान्देवलोके च देवताः |
२५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
पितो उवाच
पितॄंस्त्राणात्तारय़ति पुत्र इत्यनुशुश्रुम |
४५ क
शल्य पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
पितॄणां गतमानृण्यं क्षत्रधर्मस्य चोभय़ोः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
पितॄणां च महाभाग सततं संशितव्रत |
६० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
पितॄणां च स्वधा प्रोक्ता पशूनां चापि वीरुधः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय १०८
लोमश उवाच
पितॄणां चोदकं तत्र ददौ पूर्णमनोरथः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३४
अभिमन्युरु उवाच
पितॄणां जय़माकाङ्क्षन्नवगाहे भिनद्मि च ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
पितॄणां तत्र वै दत्तमक्षय़ं भवति प्रभो ||
७२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२६
भीष्म उवाच
पितॄणां देवतानां च ततोऽऽश्रममिय़ां तदा ||
४ ख