द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
पार्थाञ्जित्वाजय़च्चेदीन्पाञ्चालान्सृञ्जय़ानपि |
४७ क
वन पर्व
अध्याय
१६२
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थानभ्याजगामाशु देवराजः पुरन्दरः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थानां जय़कामं तं पुत्राणां मम कण्टकम् |
६९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८०
धृतराष्ट्र उवाच
पार्थानां मामकानां च तान्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
पार्थानामकरोद्भीष्मः सततं समितिक्षय़म् ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
पार्थानामकरोद्भीष्मः सततं समितिक्षय़म् ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थानामन्त्र्य कुन्तीं च प्रातिष्ठत महातपाः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थानामभिषङ्गेण तथा क्रुद्धं जनार्दनम् |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
पार्थान्वालान्वनवासप्रतप्ता; न्गोपाय़स्व स्वं यशस्तात रक्षन् ||
७१ ख
सभा पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थान्सुमनसो दृष्ट्वा पार्थिवांश्च वशानुगान् |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थाय़ाग्निर्ददौ चापि गाण्डीवं धनुरुत्तमम् |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७८
भरद्वाज उवाच
पार्थिवं धातुमाश्रित्य शारीरोऽग्निः कथं भवेत् |
१ क
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्राह्मण उवाच
पार्थिवं धातुमासाद्य शारीरोऽग्निः कथं भवेत् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१७२
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थिवं रथमास्थाय़ शोभमानो धनञ्जय़ः ||
४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
पार्थिवक्षय़मासाद्य निःशङ्कः प्रविवेश ह ||
२६ ख
सभा पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थिवत्वं चिकीर्षामि धर्मराजस्य धीमतः ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
पार्थिवप्रवरं सुप्तं युधिष्ठिरमवोधय़त् ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
पार्थिवश्च सदा गन्धो गन्धश्च वहुधा स्मृतः |
४१ क
विराट पर्व
अध्याय
१७
द्रौपद्यु उवाच
पार्थिवस्य सुता नाम का नु जीवेत मादृशी |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
पार्थिवाः पुरुषव्याघ्र तेषां पापं हरन्ति ते ||
२७ ख
विराट पर्व
अध्याय
१७
द्रौपद्यु उवाच
पार्थिवाः पृथिवीपाला यस्यासन्वशवर्तिनः |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थिवाः पृथिवीहेतोः समभित्यक्तजीविताः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
पार्थिवाः स भवान्राजन्नकस्माद्व्यथते कथम् ||
५६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थिवानपि चोद्देशान्सरितश्च सरांसि च ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२४२
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थिवानां च राजेन्द्र व्राह्मणानां तथैव च |
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
पार्थिवानां समेतानां वहून्यासन्नरोत्तम |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
पार्थिवानामधर्मत्वात्प्रजानामभवः सदा ||
३५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
पार्थिवानामपि व्यक्तं मृत्युं पश्यामि सर्वशः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२९
व्यास उवाच
पार्थिवानि द्वय़ान्याहुर्मध्यमान्युत्तमानि च |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२९
व्यास उवाच
पार्थिवानि विशिष्टानि तानि ह्यन्नानि भुञ्जते ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९८
नारद उवाच
पार्थिवानीव चाभान्ति पुनर्नगमय़ानि च |
११ क
सभा पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थिवान्पार्थिवश्रेष्ठ शिशुपालोऽल्पचेतनः |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
पार्थिवान्समरे कृष्ण दुर्योधनपुरोगमान् ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१
जनमेजय़ उवाच
पार्थिवाश्च महाभागा नानादेशसमागताः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
पार्थिवाश्चानुभूय़ास्या विवाहं विस्मय़ान्विताः |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
२८२
माण्डव्य उवाच
पार्थिवी च प्रवृत्तिस्ते तथा जीवति सत्यवान् ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थिवीं समितिं द्रष्टुमृषय़ोऽभ्यागता नृप |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
युधिष्ठिर उवाच
पार्थिवेन विशेषेण किं कार्यमवशिष्यते |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७१
युधिष्ठिर उवाच
पार्थिवेभ्यो महावाहो समय़े गम्यतामिति ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
युधिष्ठिर उवाच
पार्थिवै राजपुत्रैर्वा शक्याः प्राप्तुं पितामह |
३ क
वन पर्व
अध्याय
४३
अर्जुन उवाच
पार्थिवैः सुमहाभागैर्यज्वभिर्भूरिदक्षिणैः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९
युधिष्ठिर उवाच
पार्थिवैर्नृपतिः स्वल्पैः कारणैरेव वध्यते ||
३५ ख
सभा पर्व
अध्याय
४५
दुर्योधन उवाच
पार्थिवैर्वहुभिः कीर्णमुपस्थानं दिदृक्षुभिः |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
पार्थिवो जाय़ते तात दण्डनीतिवशानुगः ||
१३५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
पार्थिवो यस्तु गन्धो वै घ्राणेनेह स गृह्यते |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थिवो व्यजय़द्राजन्न भूतिं न पुनः श्रिय़म् ||
५६ ख
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
पार्थिवोऽश्वपतिर्नाम सर्वभूतहिते रतः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
गुरुरु उवाच
पार्थिवोऽय़ं तथा देहो मृद्विकारैर्विलिप्यते ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
पार्थे वा शक्रकल्पे वै वधार्थं वासवीं प्रभो ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थेन च महाय़ुद्धे समेताभ्यामसंशय़म् ||
२७ ख