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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिलभ्य तु सा सञ्ज्ञामुत्तरा भरतर्षभ |
५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
प्रतिलभ्य पुनश्चेत इदं वचनमव्रवीत् ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११३
भीष्म उवाच
प्रतिलभ्य वरं श्रेष्ठं यय़ावुष्ट्रः स्वकं वनम् ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
प्रतिलव्य ततः सञ्ज्ञां चित्रसेनो महारथः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
भीष्म उवाच
प्रतिलोमं तु वर्तन्तो वाह्याद्वाह्यतरं पुनः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११९
भीष्म उवाच
प्रतिलोमं न भृत्यास्ते स्थाप्याः कर्मफलैषिणा ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
उमो उवाच
प्रतिलोमः कथं देव शक्यो धर्मो निषेवितुम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०८
गुरुरु उवाच
प्रतिलोमां दिशं वुद्ध्वा संसारमवुधास्तथा ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
प्रतिलोमानुलोमश्च भवत्यथ शतक्रतुः ||
३२ ग
आदि पर्व
अध्याय १८७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिवक्तुं तदा युक्तं नाशकत्तं युधिष्ठिरम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय ७२
दमय़न्त्यु उवाच
प्रतिवाक्यं च सुश्रोणि वुध्येथास्त्वमनिन्दिते ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
प्रतिवाक्यं स एवासिर्मामको दास्यते तव |
२६ ख
वन पर्व
अध्याय १३५
लोमश उवाच
प्रतिवारणहेत्वर्थं वुद्ध्या सञ्चिन्त्य वुद्धिमान् ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिविन्ध्य इति ख्यातो वभूव प्रथितः क्षितौ ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
प्रतिविन्ध्यं तथा चित्रश्चित्रकेतनकार्मुकः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४३
सञ्जय़ उवाच
प्रतिविन्ध्यं तु समरे कुर्वाणं कर्म दुष्करम् |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिविन्ध्यं युधिष्ठिरः |
८२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४३
सञ्जय़ उवाच
प्रतिविन्ध्यमथ क्रुद्धं प्रदहन्तं रणे रिपून् |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४०
सञ्जय़ उवाच
प्रतिविन्ध्यमथाय़ान्तं मय़ूरसदृशैर्हय़ैः |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
प्रतिविन्ध्यस्ततश्चित्रं भित्त्वा पञ्चभिराशुगैः |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
प्रतिविन्ध्यस्ततो रक्षो विभेद निशितैः शरैः |
३७ क
कर्ण पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
प्रतिविन्ध्यस्ततो राजंस्तोमरं हेमभूषितम् |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४३
सञ्जय़ उवाच
प्रतिविन्ध्यहय़ानुग्रैः पातय़ामास यच्छरैः ||
३४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
प्रतिविन्ध्याय़ चिक्षेप रुक्मजालविभूषिताम् ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
प्रतिविन्ध्यो धनुस्तस्य छित्त्वा भारत साय़कैः |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिविन्ध्यो युधिष्ठिरात्सुतसोमो वृकोदरात् |
१०२ क
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिविन्ध्यो युधिष्ठिरात्सुतसोमो वृकोदरात् |
६५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४१
भीष्म उवाच
प्रतिविम्वमिवादर्शे गुरुपत्न्याः शरीरगम् ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
प्रतिविम्वमिवादर्शे पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ||
१९७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
प्रतिविव्याध तं तूर्णं तव पुत्रो महीपतिम् |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
सञ्जय़ उवाच
प्रतिविव्याध तं तूर्णं धृष्टद्युम्नोऽपि मारिष |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४२
सञ्जय़ उवाच
प्रतिविव्याध तं राजा नवभिर्निशितैः शरैः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८४
सञ्जय़ उवाच
प्रतिविव्याध तान्सर्वान्पञ्चभिः पञ्चभिः शरैः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
प्रतिविव्याध राधेय़स्तावद्भिरथ तं पुनः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५१
युधिष्ठिर उवाच
प्रतिवीक्षितुमप्याजौ भेत्तुं तत्कुत एव तु ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
प्रतिवीरैश्च संमर्दे पत्तिसङ्घाः सहस्रशः ||
५३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिवुद्धः स वार्ष्णेय़ो ददर्शाग्रे किरीटिनम् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
प्रतिवुद्धः सुखं सुप्तो महार्हे शय़नोत्तमे |
७ क
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिवुद्धस्तु कौन्तेय़ः सर्वान्सर्पानपोथय़त् |
७७ क
आदि पर्व
अध्याय ११९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिवुद्धस्तु भीमस्तान्सर्वान्सर्पानपोथय़त् |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
प्रतिवुद्धस्तु स मुनिस्तौ प्रोवाच विशां पते |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
नारद उवाच
प्रतिवुद्धाश्च ते सर्वे भक्ताश्च पुरुषोत्तमम् ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
प्रतिवुद्धो विकुरुते व्रह्माक्षय़्यं क्षपाक्षय़े |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८३
सञ्जय़ उवाच
प्रतिव्यूहं त्वमपि हि कुरु पार्षत माचिरम् ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
प्रतिव्यूहन्ननीकानि भीष्मस्य भरतर्षभ ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५१
युधिष्ठिर उवाच
प्रतिव्यूह्य रथानीकं यतमानं तथा रणे ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
प्रतिव्यूह्य वलं सर्वं रणमध्ये व्यवस्थितः |
८ क
वन पर्व
अध्याय १९६
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रतिव्रतानां निय़तं धर्मं चावहितः शृणु ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिव्रुवन्तीमेकं मे पतिं देहीति शङ्करम् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७५
भीष्म उवाच
प्रतिव्रूय़ाच्छेषमर्धं द्विजातिः; प्रतिगृह्णन्वै गोप्रदाने विधिज्ञः ||
१४ ख