शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
भीष्म उवाच
पर्णं त्यक्त्वा जलाहारस्तदासीद्द्विजसत्तमः ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
पर्णशालेति विख्यातो रमणीय़ो नराधिप |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
पर्णाशा जननी यस्य शीततोय़ा महानदी ||
४४ ख
आदि पर्व
अध्याय
४७
सूत उवाच
पर्यक्रामंश्च विधिवत्स्वे स्वे कर्मणि याजकाः ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
पर्यक्रामत्समन्ताच्च पार्थेन सह केशवः ||
७१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
भीष्म उवाच
पर्यक्रामद्दह्यमान इतश्चेतश्च तेजसा ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
पर्यगच्छञ्शनैः सर्वा दिशः खं च क्षितिं तथा ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
पर्यगृह्णंस्ततः सर्वे समाय़ान्तं महारथाः ||
३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
पर्यगृह्णत तं विद्वान्सूतो गावल्गणिस्तदा |
२० क
वन पर्व
अध्याय
२३१
वैशम्पाय़न उवाच
पर्यगृह्णन्त गन्धर्वाः परिवार्य समन्ततः ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
पर्यग्नि कुर्वंश्च नृपं द्विरदस्थं पुरोहिताः ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
पर्यङ्क इव विभ्राजन्नुपविष्टो महामनाः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
पर्यङ्क इव विभ्राजन्नुपविष्टो वभूव ह ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
पर्यङ्कशय़्या भूमिश्च समाने यस्य देहिनः |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
पर्यङ्कान्सर्वसौवर्णान्परार्ध्यास्तरणास्तृतान् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
पर्यङ्के पृथिवीपाल दिव्यास्तरणसंस्तृते ||
८२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
पर्यङ्केषु परार्ध्येषु स्पर्ध्यास्तरणवत्सु च |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
३८
सूत उवाच
पर्यतप्यत तत्पापं कृत्वा राजा महातपाः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
१३५
लोमश उवाच
पर्यतप्यत तेजस्वी मन्युनाभिपरिप्लुतः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
४६
सूत उवाच
पर्यतप्यत दुःखार्तः प्रत्यपिंषत्करे करम् ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
१०६
लोमश उवाच
पर्यतप्यत दुःखेन तेषां गतिमचिन्तय़त् ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय
३८
सूत उवाच
पर्यतप्यत भूय़ोऽपि कृत्वा तत्किल्विषं मुनेः ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
पर्यतिष्ठत तेजस्वी स्ववाहुवलमाश्रितः ||
९ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
पर्यत्यजत कौरव्य करुणं परिदेवतीम् ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
गङ्गो उवाच
पर्यधावत शैलांश्च नदीः प्रस्रवणानि च |
७१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२८
सञ्जय़ उवाच
पर्यधावन्त पाञ्चाला वध्यमाना महात्मना |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
पर्यपृच्छच्च तां भीमः किमिहेच्छस्यनिन्दिते ||
८८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७
शल्य उवाच
पर्यपृच्छत देवेशः प्रहृष्टो व्राह्मणर्षभम् ||
५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
पर्यपृच्छत धर्मात्मा धर्मराजं युधिष्ठिरम् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९४
सञ्जय़ उवाच
पर्यपृच्छत राजेन्द्र द्रोणमङ्गिरसां वरम् ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३६
शम्वर उवाच
पर्यपृच्छत्कथमिमे सिद्धा इति निशाकरम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
६५
वृहदश्व उवाच
पर्यपृच्छत्ततः सर्वान्क्रमेण सुहृदः स्वकान् ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
पर्यपृच्छत्ततस्तस्याः पितरं चात्मकारणात् ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०७
भीष्म उवाच
पर्यपृच्छत्पञ्चशिखं छिन्नधर्मार्थसंशय़म् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१२२
लोमश उवाच
पर्यपृच्छत्सुहृद्वर्गं प्रत्यजानन्न चैव ते ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८७
वैशम्पाय़न उवाच
पर्यपृच्छददीनात्मा कुन्तीपुत्रं सुवर्चसम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४५
भीष्म उवाच
पर्यपृच्छद्यथान्याय़ं श्रुत्वैव च जगाम सः ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२६
व्राह्मण उवाच
पर्यपृच्छन्नुपासीनाः श्रेय़ो नः प्रोच्यतामिति ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
भीष्म उवाच
पर्यपृच्छन्महातेजा राज्ञः कुशलमव्ययम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
पर्यभ्रमन्त वै राजन्नसुराः कालचोदिताः ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
पर्यमर्दत संहृष्टा कल्याणी मृदुपाणिना ||
८७ ख
आदि पर्व
अध्याय
६६
शकुन्तलो उवाच
पर्यरक्षन्त तां तत्र शकुन्ता मेनकात्मजाम् ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
पर्यरक्षन्त युध्यन्तं वज्राय़ुधमिवामराः ||
५४ ख
वन पर्व
अध्याय
२३०
वैशम्पाय़न उवाच
पर्यवर्तत गन्धर्वैर्दशभिर्दशभिः सह ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
पर्यवर्तत राजानं पुण्डरीकेक्षणोऽच्युतः ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८७
वैशम्पाय़न उवाच
पर्यवर्तन्त ते सर्वे वृकस्थलनिवासिनः ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
पर्यवर्तन्त सहिता निशाकाले परन्तपाः ||
५१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
पर्यवर्तय़दव्यग्रो रथं रथवरस्य तम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
भीष्म उवाच
पर्यवस्थापितो राजा सेनजिन्मुमुदे सुखम् ||
५३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
पर्यवस्थाप्य चात्मानमन्योन्येन पुनस्तदा |
५० ख