वन पर्व
अध्याय
२८४
कर्ण उवाच
प्राप्स्यामि परमं लोके यशः स्वर्भानुसूदन |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
प्रापय़न्यवनाञ्शीघ्रं मनःपवनरंहसः ||
३१ ख
विराट पर्व
अध्याय
५०
अर्जुन उवाच
प्रापय़स्वैष तेजोभिप्रमाथी युद्धदुर्मदः ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
प्रापय़ामास भीष्माय़ रथं प्रति जनेश्वर ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
प्रापय़ामास राजेन्द्र सह तेन शिखण्डिना ||
१६ ग
आदि पर्व
अध्याय
१५२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रापय़िष्याम्यहं तस्मै इदमन्नं दुरात्मने |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
प्रापय़ेय़ं परं लोकं किमु कर्णं महारणे ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
तुलाधार उवाच
प्रापय़ेय़ुः प्रजाः स्वर्गं स्वधर्मचरणेन वै |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२
सञ्जय़ उवाच
प्राभ्रश्यन्त कराग्रेभ्यो दृष्ट्वा द्रोणं निपातितम् ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रामथद्वलमास्थाय़ पाकशासनिराहवे ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रामथ्नाद्धास्तिनपुरं वातो दक्षिणपश्चिमः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
प्रामाण्येनानुवर्तन्ते दृश्यन्ते हि दृढव्रताः ||
६० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
प्रामुञ्चत्पुङ्खसंय़ुक्ताञ्शरानाशीविषोपमान् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
प्रामृद्नाच्च वहून्योधान्वाय़ुर्वृक्षानिवौजसा ||
८८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
भरद्वाज उवाच
प्रार्थना पुरुषस्येव तस्य मात्रा न विद्यते ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
प्रार्थनाच्चैव तीर्थस्य स्नानाच्च पितृतर्पणात् |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
२०३
पितामह उवाच
प्रार्थनीय़ेन रूपेण कुरु भद्रे प्रलोभनम् ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
अष्टावक्र उवाच
प्रार्थितं दर्शनादेव भजमानां भजस्व माम् ||
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९७
भीष्म उवाच
प्रार्थितं व्रतशौचाभ्यां सत्कृतं देशकालय़ोः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२७७
राजो उवाच
प्रार्थितः पुरुषो यश्च स निवेद्यस्त्वय़ा मम |
३३ क
सभा पर्व
अध्याय
१२
युधिष्ठिर उवाच
प्रार्थितो राजसूय़ो मे न चासौ केवलेप्सय़ा |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
प्रार्थय़न्तश्च तं विप्रा वदन्ति गुणवुद्धय़ः |
१०० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
प्रार्थय़न्ति च यद्दान्ता लभन्ते तन्न संशय़ः ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४६
व्राह्मण्यु उवाच
प्रार्थय़न्ति जनाः सर्वे वीरहीनां तथा स्त्रिय़म् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
व्यास उवाच
प्रार्थय़न्ति परं लोके स्थानमेव च शाश्वतम् ||
८८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
श्रीकृष्ण उवाच
प्रार्थय़न्तो जय़ं युद्धे प्रथितं च महद्यशः |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
प्रार्थय़ाना निपतिताः सङ्क्षुण्णा वरवारणैः |
४३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
प्रार्थय़ाना यशो दीप्तं मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ||
२ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
८९
सञ्जय़ उवाच
प्रार्थय़ाना यशो राजन्स्वर्गं वा युद्धशालिनः ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय
२८६
सूर्य उवाच
प्रार्थय़ानो रणे वत्स कुण्डले ते जिहीर्षति ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
प्रार्थय़ानौ तदान्योऽन्यं मण्डलानि विचेरतुः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
१५४
द्रोण उवाच
प्रार्थय़ामि त्वय़ा सख्यं पुनरेव नराधिप |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
प्रार्थय़ामो जय़ं युद्धे शाश्वतानि सुखानि च ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
प्रार्थय़िष्यन्ति राजेन्द्रास्तस्मान्मैवं मनः कृथाः ||
१० ग
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
प्रार्थय़िष्ये तु तत्कर्म येन विस्तीर्यते यशः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
६२
वृहदश्व उवाच
प्रार्थय़ेद्यदि मां कश्चिद्दण्ड्यस्ते स पुमान्भवेत् |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रार्थय़ेय़ं त्वय़ा सख्यं पुनरेव नरर्षभ |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२३
व्राह्मण उवाच
प्रालीय़त ततो व्यानः पुनश्च प्रचचार ह |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
प्रावर्तत कुरूणां च पाण्डवानां च भारत ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
प्रावर्तत ततो युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
प्रावर्तत नदी घोरा रुधिरौघप्रवाहिनी ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
प्रावर्तत नदी घोरा शोणितान्त्रतरङ्गिणी ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
प्रावर्तत नदी घोरा शोणितौघतरङ्गिणी ||
४६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
प्रावर्तत नदी घोरा शोणितौघतरङ्गिणी |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८९
सञ्जय़ उवाच
प्रावर्तत नदी तत्र केशशैवलशाद्वला ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
प्रावर्तत नदी रौद्रा कुरुसृञ्जय़सङ्कुला ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२८
सञ्जय़ उवाच
प्रावर्तत महद्युद्धं निघ्नतामितरेतरम् ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
प्रावर्तत महद्युद्धं राजन्दुर्मन्त्रिते तव ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
प्रावर्तत महाघोरं राज्ञां देहावकर्तनम् ||
१ ख
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रावर्तत महापानं प्रभासे तिग्मतेजसाम् ||
१४ ख