आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रदाय़ विपुलं वित्तं गृहान्प्रास्थापय़त्तदा ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रदाय़ शस्त्राण्यस्माकं युद्धेन द्रौपदीं हर ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
११०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रदाय़ सर्वं विप्रेभ्यः पाण्डुः पुनरभाषत |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
प्रदाय़ सुरलोकस्थः पुण्यान्तेऽपि न चाल्यते ||
२६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रदाय़ाथ मणिं द्रौणिः पाण्डवानां महात्मनाम् |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
प्रदाय़ैषामुचितं तात राज्यं; सुखी पुत्रैः सहितो मोदमानः |
१०४ क
आदि पर्व
अध्याय
११७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रदाय़ोपनिधिं राजा पाण्डुः स्वर्गमितो गतः ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय
७१
विदुर उवाच
प्रदिशञ्शरसम्पातान्कुन्तीपुत्रोऽर्जुनस्तदा |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
१५८
अर्जुन उवाच
प्रदिशत्यभय़ं तेऽद्य कुरुराजो युधिष्ठिरः ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रदिशस्व वलं तस्य योऽधिकारार्थचिन्तकः |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय
१८५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रदिष्टशुल्का द्रुपदेन राज्ञा; सानेन वीरेण तथानुवृत्ता |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
२९
प्रह्लाद उवाच
प्रदिष्टानि च देय़ानि न दद्युर्भर्तृशासनात् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
भीष्म उवाच
प्रदिष्टे चासने तेन शनैरहमुपाविशम् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३९
सञ्जय़ उवाच
प्रदीपानां सहस्रैश्च दीप्यमानैः समन्ततः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४०
व्यास उवाच
प्रदीपार्थं नरः कुर्यादिन्द्रिय़ैर्वुद्धिसत्तमैः |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय
६०
वासुदेव उवाच
प्रदीपिता जतुगृहे मात्रा सह सुदुर्मते ||
४२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
प्रदीपैः काञ्चनैस्तत्र गन्धतैलावसेचनैः |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
प्रदीपैर्हि परित्यक्तैर्ज्वलद्भिस्तैः समन्ततः |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
प्रदीप्तं पावकं यद्वत्पतङ्गाः कालचोदिताः ||
१० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
प्रदीप्तनेत्रजिह्वाश्च ज्वालावक्त्रास्तथैव च |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रदीप्तमस्त्रमाग्नेय़ं ददाहास्य रथं तु तत् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रदीप्तमिव चाकाशं दृष्ट्वा भीमो न्यमीलय़त् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
नारद उवाच
प्रदीप्तमिव शैलान्तं कस्तं देशं न सन्त्यजेत् ||
४३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
प्रदीप्तमैरावतवंशसम्भवं; शिरो जिहीर्षुर्युधि फल्गुनस्य ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
जम्वुक उवाच
प्रदीप्ताः पुत्रशोकेन यथैवावुद्धय़स्तथा |
८३ क
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रदीप्तात्पर्वतश्रेष्ठाद्विचित्राभरणस्रजः ||
७८ ख
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रदीप्तानि व्यदृश्यन्त सहदेववले तदा ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
प्रदीप्ताश्च दिशः सर्वा धार्तराष्ट्रस्य माधव |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
प्रदीप्तेनेव दीपेन मनोदीपेन पश्यति |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
प्रदीप्तेऽग्नौ महाराज रोषदीप्तेन चेतसा ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
प्रदीप्तोल्कमभवच्चान्तरिक्षं; देहेषु भूरीण्यपतन्वय़ांसि |
८६ क
सभा पर्व
अध्याय
५७
दुर्योधन उवाच
प्रदीप्य यः प्रदीप्ताग्निं प्राक्त्वरन्नाभिधावति |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रदीर्यमाणां वसुधां गिरीणां शिखराणि च |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१६५
अर्जुन उवाच
प्रदीय़मानं देवैस्तु देवदत्तं जलोद्भवम् |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
प्रदुद्राव च वेगेन प्रणदन्भैरवं स्वनम् |
४८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
प्रदुद्राव दिशः सर्वा वीक्षमाणं भय़ार्दितम् ||
३९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
प्रदुद्राव भय़ात्सेना तावकी भरतर्षभ ||
४९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
प्रदुद्राव भय़ाद्रक्षो हित्वा सात्यकिमाहवे ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
प्रदुद्रुवुः कुरवश्चैव सर्वे; सवाजिनागाः सरथाः समन्तात् |
४३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
प्रदुद्रुवुर्दिशो भीता भीमाज्जाते महाभय़े ||
६७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
प्रदुद्रुवुर्दिशो भीताश्चुक्रुशुश्चापि सूतजम् ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
प्रदुद्रुवुस्ततस्तेऽन्ये पुत्रास्तव विशां पते |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
२६८
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रदुद्रुवुस्ते शतशः कपिभिः समभिद्रुताः ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रदृश्यन्तां च कर्माणि प्राणिनां गतय़स्तथा |
७२ क
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
प्रदेशिनीं ततोऽस्यास्ये शक्रः समभिसन्दधे ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
प्रदेशिनीं शक्रदत्तामास्वाद्य स शिशुस्तदा |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
१०२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रदेशेष्वपि राष्ट्राणां कृतं युगमवर्तत ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रद्युम्न इव गोविन्दं विनय़ेनोपतस्थिवान् ||
८ ख
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रद्युम्नं चानिरुद्धं च ततश्चुक्रोध भारत ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
प्रद्युम्नं योधय़ामास शाल्वः परपुरञ्जय़ः ||
१० ख