अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
प्रशान्तं च क्षणेनैव देवदेवस्य माय़या ||
११४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
प्रशान्तचेता मुदितः स्वमालय़ं; त्रिविष्टपं प्राप्य मुमोद वासवः ||
११८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रशान्तचेताः कौरव्यः स्वराज्यं प्राप्य केवलम् |
६ क
वन पर्व
अध्याय
११३
लोमश उवाच
प्रशान्तभूय़िष्ठरजाः प्रहृष्टः; समाससादाङ्गपतिं पुरस्थम् ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३९
व्यास उवाच
प्रशान्तमिव संशुद्धं सत्त्वं तदुपधारय़ेत् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५६
भीष्म उवाच
प्रशान्तवाङ्मना नित्यं ह्रीस्तु धर्मादवाप्यते ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
प्रशान्ताः समभूताश्च श्रिय़ं तानश्नुवीमहि ||
४२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
प्रशान्तात्मा विगतभीर्व्रह्मचारिव्रते स्थितः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
प्रशान्तादपि मे प्राज्ञ भेतव्यं वलिनः सदा ||
१६९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रशान्तामखिलां पार्थ पृथिवीं पृथिवीपतिः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
७८
वृहदश्व उवाच
प्रशान्ते तु पुरे हृष्टे सम्प्रवृत्ते महोत्सवे |
१ क
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रशान्ते मानसे दुःखे शारीरमुपशाम्यति ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२११
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रशान्तेऽग्निर्महाभाग परिश्रान्तो गवाम्पतिः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०८
गुरुरु उवाच
प्रशान्तो ज्ञानवान्भिक्षुर्निरपेक्षश्चरेत्सुखम् ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रशाम्य भरतश्रेष्ठ भ्रातृभिः सह पाण्डवैः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
राम उवाच
प्रशाम्य भरतश्रेष्ठ मा च युद्धे मनः कृथाः ||
४४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रशाम्य भरतश्रेष्ठ मा मन्युवशमन्वगाः ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२५
व्यास उवाच
प्रशाम्यति तदा ज्योतिर्वाय़ुर्दोधूय़ते महान् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२५
व्यास उवाच
प्रशाम्यति तदा वाय़ुः खं तु तिष्ठति नानदत् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
प्रशाम्यते च राजा हि नारीवोद्यमवर्जितः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
प्रशाम्यमाने शैनेय़े सहदेवेन मारिष |
५४ क
आदि पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रशासति पुनः क्षत्रे धर्मेणेमां वसुन्धराम् |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
प्रशास्ता वै पृथिवी येन सर्वा; सुय़ोधनं कुशलं तात पृच्छेः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१०६
लोमश उवाच
प्रशास्य सुचिरं कालं राज्यं राजीवलोचनः |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६२
युधिष्ठिर उवाच
प्रश्नं कञ्चित्प्रवक्ष्यामि तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
उत्तङ्क उवाच
प्रश्नं तु कञ्चित्प्रष्टुं त्वां व्यवसिष्ये परन्तप ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२१
व्राह्मण उवाच
प्रश्नं तु वाङ्मनसोर्मां यस्मात्त्वमनुपृच्छसि |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
भीष्म उवाच
प्रश्नं पप्रच्छ मेधावी यन्मां त्वं परिपृच्छसि ||
२३ ख
सभा पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रश्नं प्रव्रूहि कृष्णां त्वमजितां यदि मन्यसे ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रश्नमेतं मय़ा पृष्टो भगवानग्निसम्भवः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२०३
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रश्नमेतं समुद्दिष्टं व्राह्मणेन युधिष्ठिर |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
प्रश्नानुक्तान्विव्रुवन्तं च सम्य; क्तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
११३ ख
वन पर्व
अध्याय
२९६
यक्ष उवाच
प्रश्नानुक्त्वा तु कौन्तेय़ ततः पिव हरस्व च ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
प्रश्नानुक्त्वा तु कौन्तेय़ ततः पिव हरस्व च ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
प्रश्नानुक्त्वा तु कौन्तेय़ ततः पिव हरस्व च ||
२३ ग
वन पर्व
अध्याय
२९६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रश्नानुक्त्वा तु माद्रेय़ ततः पिव हरस्व च ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२९६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रश्नानुक्त्वा यथाकामं ततः पिव हरस्व च ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
१७७
सर्प उवाच
प्रश्नानुच्चारितांस्तु त्वं व्याहरिष्यसि चेन्मम |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रश्रितं मधुरं स्निग्धं पप्रच्छ वदतां वरः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८५
पराशर उवाच
प्रश्रिता विनय़ोपेता दमनित्याः सुसंशिताः |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
प्रश्रिते दानशीले च सदैव निवसाम्यहम् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
प्रश्रय़ेणाव्रवीद्राजा धृतराष्ट्रोऽम्विकासुतः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रष्टुं चाशक्नुवन्तस्ते वीक्षां चक्रुः परस्परम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
प्रष्टुं धर्मस्य निष्ठां वै मोक्षस्य च पराय़णम् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
प्रसक्तः पुत्रपशुषु धनधान्यसमाकुलः ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय
८
सुदेष्णो उवाच
प्रसक्तमभिवीक्षेथाः स कामवशगो भवेत् ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
प्रसक्तमभ्यवर्षन्त शरवर्षाणि भागशः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
प्रसक्तवुद्धिर्विषय़ेषु यो नरो; यो वुध्यते ह्यात्महितं कदा च न |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३८
श्रीभगवानु उवाच
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ ||
१६ ख