अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
भीष्म उवाच
प्रेत्यभावे महाप्राज्ञ तद्यथास्ति तथा वद ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
प्रेत्यभावे सुखं धर्माच्छश्वत्तैरुपभुज्यते ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
प्रेत्येह च स धर्मात्मा सम्प्राप्नोति महद्यशः ||
१४ ग
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१२
धृतराष्ट्र उवाच
प्रेत्येह चैव कर्तव्यमात्मनिःश्रेय़सं परम् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७४
कश्यप उवाच
प्रेत्यैतय़ोरन्तरवान्विशेषो; यो वै पुण्यं चरते यश्च पापम् ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रेप्सन्तं समरे द्रोणं के वीराः पर्यवारय़न् ||
६७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रेम्णा च वहुमानाच्च सौहृदाच्च व्रवीम्यहम् ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
प्रेम्णा दृष्टश्च वहुधा आशिषा च प्रय़ोजितः ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
प्रेरितो वासुदेवेन संरव्धेन यशस्विना |
३२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२१
व्राह्मण उवाच
प्रेर्यमाणा महाभागे विना प्राणमपानती |
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
प्रेरय़त्यभ्रसङ्घातान्धूमजांश्चोष्मजांश्च यः |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
प्रेरय़त्सव्यसाची तांस्त्रिधैकैकमथाच्छिनत् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
७३
केशिन्यु उवाच
प्रेषितं तत्र राज्ञा च मांसं सुवहु पाशवम् ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२२
स्त्र्यु उवाच
प्रेषितस्तेन विप्रेण कन्यापित्रा द्विजर्षभ |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
प्रेषिता द्विजमुख्येन मर्माण्युद्दिश्य सर्वशः ||
५३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
प्रेषिता धर्मराजेन भीमसेनपदानुगाः |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
प्रेषिता भीमसेनेन शरास्ते दृढधन्वना |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
प्रेषिताः परलोकाय़ परमास्त्रैः किरीटिना |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८९
सञ्जय़ उवाच
प्रेषिताश्च महामात्रैर्वारणाः परवारणाः |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
प्रेषितो धर्मपुत्रेण पर्थैषोऽभ्येति सात्यकिः ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रेषितो धृतराष्ट्रस्य समीपं मधुसूदनः |
५ ख
वन पर्व
अध्याय
२१२
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रेष्य चाग्निरथर्वाणमन्यं देशं ततोऽगमत् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१९६
द्रोण उवाच
प्रेष्यतां द्रुपदाय़ाशु नरः कश्चित्प्रिय़ंवदः |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४
द्रुपद उवाच
प्रेष्यतां धृतराष्ट्राय़ वाक्यमस्मिन्समर्प्यताम् ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९३
दुर्योधन उवाच
प्रेष्यतां वापि राधेय़स्तेषामागमनाय़ वै |
१६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
धृतराष्ट्र उवाच
प्रेष्यभूतः प्रवर्तेय़ं पाण्डवेय़स्य शासनात् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
प्रेष्यमाणा विकल्पन्ते गुह्यं चाप्यनुय़ुञ्जते |
५० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५७
सञ्जय़ उवाच
प्रेष्यवत्पाण्डुपाञ्चालानुपभोक्ष्यामहे ततः ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
प्रेष्यवत्पुरुषव्याघ्रो वालव्यजनमुत्क्षिपन् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२९
प्रह्लाद उवाच
प्रेष्याः पुत्राश्च भृत्याश्च तथोदासीनवृत्तय़ः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रेष्याः पुरो विंशतिरात्तशस्त्रा; धनूंषि वर्माणि शरांश्च पीतान् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
१९१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रेष्याः सम्प्रददौ कृष्णो नानादेश्याः सहस्रशः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रेष्याश्च सर्वे निखिलेन राज; न्हर्षं समापेतुरतीव तत्र ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
१३९
लोमश उवाच
प्रेष्यैरुत्सार्यमाणस्तु राजन्नर्वावसुस्तदा |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
शुक्र उवाच
प्रेष्यो भवतु राज्ञश्च यस्ते हरति पुष्करम् ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
प्रेष्योऽहं तव दुर्धर्ष क्रिय़तां किं पितामह ||
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८५
भीष्म उवाच
प्रेषय़ं मृत्युसङ्काशं वाणं सर्पविषोपमम् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
प्रेषय़त्परमक्रुद्धो यमस्य सदनं प्रति ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
प्रेषय़त्समरे तूर्णं हार्दिक्यस्य युधिष्ठिरः ||
३६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
प्रेषय़द्यत्र राजासौ धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय
८
सुदेष्णो उवाच
प्रेषय़न्ति च वै दासीर्दासांश्चैवंविधान्वहून् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२८
सञ्जय़ उवाच
प्रेषय़न्परलोकाय़ विचरन्तो ह्यभीतवत् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३०
सञ्जय़ उवाच
प्रेषय़न्मृत्युलोकाय़ सर्वानिषुभिराशुगैः ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
प्रेषय़ामास कालाय़ शरैः संनतपर्वभिः ||
५० ख
आदि पर्व
अध्याय
१००
वैशम्पाय़न उवाच
प्रेषय़ामास कृष्णाय़ ततः काशिपतेः सुता ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२००
वैशम्पाय़न उवाच
प्रेषय़ामास कृष्णाय़ै भगवन्तमुपस्थितम् ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रेषय़ामास कौन्तेय़ो विराटश्च महीपतिः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२२९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रेषय़ामास कौरव्य उत्सारय़त तानिति ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रेषय़ामास कौरव्य वारणं पाण्डवं प्रति ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रेषय़ामास दौत्येन रावणस्य ततोऽङ्गदम् ||
५४ ख