अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
प्रत्यक्षं दृश्यते लोके कृतस्याप्यकृतस्य च ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
प्रत्यक्षं पश्यसि ह्येतान्दिव्ययोगसमन्वितान् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६२
नारद उवाच
प्रत्यक्षं प्रीतिजननं भोक्तृदात्रोर्भवत्युत |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
प्रत्यक्षं फलमश्नन्ति कर्मणां लोकसाक्षिकम् ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०८
भीष्म उवाच
प्रत्यक्षं भिन्नहृदय़ा भेदय़ेय़ुः कृतं नराः |
५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
५
अश्वत्थामो उवाच
प्रत्यक्षं भूमिपालानां भवतां चापि संनिधौ |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
३६
भीमसेन उवाच
प्रत्यक्षं मन्यसे कालं मर्त्यः सन्कालवन्धनः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२०४
व्याध उवाच
प्रत्यक्षं मम यो धर्मस्तं पश्य द्विजसत्तम |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यक्षं मे महावाहो सङ्ग्रामे रोमहर्षणे |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यक्षं यन्मय़ा दृष्टं दृष्टं योगवलेन च ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४७
युधिष्ठिर उवाच
प्रत्यक्षं लोकतः सिद्धं लोकाश्चागमपूर्वकाः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यक्षं वः कुरवो यद्व्रवीमि; युध्यमाना धार्तराष्ट्रा न सन्ति |
९० क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
प्रत्यक्षं वासुदेवस्य भीमेनानभिजातवत् ||
९० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यक्षं वृष्णिशार्दूल पादस्पर्शमिवोरगः ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यक्षं सर्वभूतानां नदीमश्वरथां प्रति ||
१९ ग
वन पर्व
अध्याय
४६
धृतराष्ट्र उवाच
प्रत्यक्षं सर्वलोकस्य खाण्डवे यत्कृतं पुरा |
४० क
वन पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
प्रत्यक्षं हि त्वय़ा दृष्ट ऋषिर्गच्छन्महातपाः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
प्रत्यक्षं ह्येतय़ोर्मूलं कृतान्तैतिह्ययोरपि |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
वासुदेव उवाच
प्रत्यक्षकर्मा सर्वस्य नारदोऽय़ं महानृषिः |
४२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२८
यतिरु उवाच
प्रत्यक्षतः साधय़ामो न परोक्षमुपास्महे ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
प्रत्यक्षदर्शनं यज्ञे गतिं चानुत्तमां शुभाम् |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यक्षदर्शी भगवान्भूतभव्यभविष्यवित् ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
प्रत्यक्षदर्शी लोकानां सर्वदर्शी भवेन्नरः ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
प्रत्यक्षदर्शी सर्वस्य पित्रा पृष्टो महात्मना |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
११५
युधिष्ठिर उवाच
प्रत्यक्षदर्शी सर्वस्य पूर्ववृत्तस्य कर्मणः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यक्षदर्शी सर्वस्य भूतभव्यभविष्यवित् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२४६
युधिष्ठिर उवाच
प्रत्यक्षधर्मा भगवान्यस्य तुष्टो हि कर्मभिः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६२
कपिल उवाच
प्रत्यक्षधर्माः शुचय़ः श्रद्दधानाः परावरे ||
८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
४
कृप उवाच
प्रत्यक्षमपि ते सर्वं तन्मे मर्माणि कृन्तति ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यक्षमागमो वेति किं तय़ोः कारणं भवेत् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
कपिल उवाच
प्रत्यक्षमिह पश्यन्ति भवन्तः सत्पथे स्थिताः |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
प्रत्यक्षमिह पश्यन्तो भवन्तः सत्पथे स्थिताः |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
वृत्र उवाच
प्रत्यक्षमेतद्भवतस्तथान्येषां मनीषिणाम् |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यक्षमेतद्भवतां यद्वक्ष्यामि हितं वचः |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यक्षमेतद्भवतां यद्वृत्तं कुरुसंसदि |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८७
राम उवाच
प्रत्यक्षमेतल्लोकानां सर्वेषामेव भामिनि |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६४
भीष्म उवाच
प्रत्यक्षसुखभूय़िष्ठमात्मसाक्षिकमच्छलम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
प्रत्यक्षहेतवो योगाः साङ्ख्याः शास्त्रविनिश्चय़ाः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
प्रत्यक्षा च परोक्षा च वृत्तिश्चास्य भवेत्सदा |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
प्रत्यक्षा च परोक्षा च सर्वाधिकरणेषु च |
६८ क
वन पर्व
अध्याय
१८१
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रत्यक्षाः सर्वधर्माणां दान्ता विगतमत्सराः ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३१
श्रीभगवानु उवाच
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३२
भीष्म उवाच
प्रत्यक्षावेव धर्मार्थौ क्षत्रिय़स्य विजानतः |
१ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
७
विदुर उवाच
प्रत्यक्षाश्च परोक्षाश्च ते व्यालाः कथिता वुधैः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
प्रत्यक्षेण परोक्षं तदनुमानेन सिध्यति ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय
१९६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यक्षेण हि विप्रर्षे देवा दृश्यन्ति सत्तम |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
प्रत्यक्षेणानुमानेन तथौपम्योपदेशतः |
४१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०३
कण्व उवाच
प्रत्यक्षो ह्यस्य सर्वस्य नारदोऽय़ं महातपाः |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
प्रत्यक्षो ह्यागमोऽभिन्नः कृतान्तो वा न किञ्चन ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
८७
धौम्य उवाच
प्रत्यक्स्रोता नदी पुण्या नर्मदा तत्र भारत ||
२ ख