शान्ति पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
पप्रच्छ काश्यपो वाग्मी किमागमनकारणम् ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
पप्रच्छ कोऽय़ं प्रथमं समेय़िवा; ननेन योऽय़ं प्रसमीक्षते सभाम् ||
४ ग
आदि पर्व
अध्याय
१८७
वैशम्पाय़न उवाच
पप्रच्छ चैनं धर्मात्मा यथा ते प्रद्रुताः पुरा |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
भीष्म उवाच
पप्रच्छ जनको राजा ज्ञानं नैःश्रेय़सं परम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९८
भीष्म उवाच
पप्रच्छ जनको राजा प्रश्नं प्रश्नविदां वरः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८८
वैशम्पाय़न उवाच
पप्रच्छ तं महात्मानं द्रौपद्यर्थे विशां पतिः ||
४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
पप्रच्छ तमृषिं चापि वैशम्पाय़नमच्युतम् |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
पप्रच्छ तांश्च सर्वान्स प्राह धर्मभृतां वरः ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
पप्रच्छ तानृषीन्सर्वान्कस्याश्रमवरस्त्वय़म् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२०
वैशम्पाय़न उवाच
पप्रच्छ धर्मराजस्य समीपस्थान्दिवौकसः ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०१
कण्व उवाच
पप्रच्छ नारदं तत्र प्रीतिमानिव चाभवत् ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
पप्रच्छ पुनरेवेमं मोक्षधर्मं सुदुर्वचम् ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१००
भीष्म उवाच
पप्रच्छ भरतश्रेष्ठ यदेतत्पृच्छसेऽद्य माम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१९६
वैशम्पाय़न उवाच
पप्रच्छ भरतश्रेष्ठो धर्मप्रश्नं सुदुर्वचम् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
६५
वृहदश्व उवाच
पप्रच्छ भार्या कस्येय़ं सुता वा कस्य भामिनी ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
पप्रच्छ भ्रातरं भीमं भीमकर्माणमाहवे ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
पप्रच्छ मातलिं प्रीत्या स चाप्येनमुवाच ह ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५७
सञ्जय़ उवाच
पप्रच्छ रथशार्दूल कर्णं प्रति महारथम् ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
पप्रच्छ राजन्प्रह्रादो वुद्धिमान्प्राज्ञसंमतः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
पप्रच्छ रामस्तं वाग्मी कस्त्वं प्रव्रूहि पृच्छतः |
३७ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
वैशम्पाय़न उवाच
पप्रच्छ विनय़ोपेतो धर्मराजो युधिष्ठिरः ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
पप्रच्छ स ततः प्रेष्यान्प्रहृष्टः क्षत्रिय़र्षभः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
पप्रच्छ सन्देहमिमं छिन्नधर्मार्थसंशय़म् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११४
भीष्म उवाच
पप्रच्छ सरितः सर्वाः संशय़ं जातमात्मनः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
पप्रच्छ सरितां श्रेष्ठां कच्चिद्गर्भः सुखोदय़ः ||
६६ ग
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
पप्रच्छ सर्वान्कुशलं तदानीं; गतेषु सर्वेष्वथ तापसेषु ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
पप्रच्छर्षिगणान्रामः कुरुक्षेत्रस्य यत्फलम् ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
भीष्म उवाच
पप्रच्छर्षिवरं राजा करालजनकः पुरा ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
पप्रच्छागमने हेतुमटने च प्रय़ोजनम् ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
पप्रच्छागमसम्पन्नानृषीन्देवांश्च भार्गवः ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
भीष्म उवाच
पप्रच्छाङ्गिरसं वीर गौतमः संशितव्रतः ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
पप्रच्छानन्तरमिदं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् ||
१०२ ख
वन पर्व
अध्याय
५१
वृहदश्व उवाच
पप्रच्छानामय़ं चापि तय़ोः सर्वगतं विभुः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९८
वैशम्पाय़न उवाच
पप्रच्छानामय़ं राजंस्ततस्तान्पाण्डुनन्दनान् |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
पप्रच्छानामय़ं राजन्कुशलं च नराधिपम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
पप्रच्छावसरं गत्वा भ्रातॄन्विदुरपञ्चमान् ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७
अगस्त्य उवाच
पप्रच्छुः संशय़ं देव नहुषं जय़तां वर ||
८ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
वासुदेव उवाच
पप्रच्छुर्विनय़ोपेता निःश्रेय़समिदं परम् ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
पप्रच्छैनं ततः प्रश्नं देवकी धर्मदर्शिनी ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
परं क्षिपति दोषेण वर्तमानः स्वय़ं तथा |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
परं गुह्यमिमं प्रश्नं शृणुष्वावहितो नृप ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
परं चाभिप्रय़ातस्य चक्रं तस्य महात्मनः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
परं चाश्वासय़ेत्साम्ना स्वशक्तिं चोपलक्षय़ेत् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०७
गुरुरु उवाच
परं तत्सर्वभूतेभ्यस्तेन यान्ति परां गतिम् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
परं तु शुक्लं विमलं विशोकं; गतक्लमं सिध्यति दानवेन्द्र |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
परं त्यजन्तीह विलोभ्यमाना; हुताशनं वाय़ुरिवेन्धनस्थम् ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
परं धर्मात्पाण्डवस्यानृशंस्यं; धर्मः परो वित्तचय़ान्मतोऽस्य |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
परं धाता विधाता च सुखदुःखे च सर्वदा ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
परं नाराय़णात्मानं निर्द्वन्द्वं प्रकृतेः परम् ||
९१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
परं निर्वेदमगमंश्चिन्तय़न्तो नराधिपम् |
११ क