chevron_left  प्रकाशकर्माarrow_drop_down
उद्योग पर्व
अध्याय १४३
कुन्त्यु उवाच
प्रकाशकर्मा तपनो योऽय़ं देवो विरोचनः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
प्रकाशगूढवृत्तिषु स्वधर्ममेव पालय़ ||
५५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रकाशन्तो दिशः सर्वा विस्मय़ं परमं यय़ुः ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४१
भीष्म उवाच
प्रकाशमकरोदत्रिस्तपसा स्वेन संय़ुगे ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३०
धृतराष्ट्र उवाच
प्रकाशमभवद्रात्रौ कथं कुरुषु सञ्जय़ ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४३
व्रह्मो उवाच
प्रकाशलक्षणा देवा मनुष्याः कर्मलक्षणाः |
२० क
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
प्रकाशवहुलत्वाच्च सत्त्वं ज्याय़ इहोच्यते ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
प्रकाशवहुलो धीरो निर्विवित्सोऽनसूय़कः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
प्रकाशश्चाप्रकाशश्च दण्डोऽथ परिशव्दितः |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३१
राजो उवाच
प्रकाशस्य च वागिन्द्रो वभूव जय़तां वरः ||
६० ख
आदि पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रकाशार्थं यय़ौ तत्र रक्षार्थं च महाय़शाः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
प्रकाशार्थगतिर्नूनं रहस्यकुशलः कृती |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३८
सञ्जय़ उवाच
प्रकाशितं चाभरणप्रभाभि; र्भृशं प्रकाशं नृपते वभूव ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४९
व्राह्मण उवाच
प्रकाशितस्त्वं स्वगुणैर्यशोगर्भगभस्तिभिः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३८
सञ्जय़ उवाच
प्रकाशिताय़ां तु तथा ध्वजिन्यां; द्रोणोऽग्निकल्पः प्रतपन्समन्तात् |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३९
सञ्जय़ उवाच
प्रकाशिते तथा लोके रजसा च तमोवृते |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६२
सञ्जय़ उवाच
प्रकाशितेषु लोकेषु पुनर्युद्धमवर्तत ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
प्रकाशिरे शङ्खमृदङ्गनिस्वनैः; प्रकम्पितानीव वनानि वाय़ुना ||
५२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
कृप उवाच
प्रकाशे सर्वभूतानां विजेता युधि शात्रवान् ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २८
काक उवाच
प्रकाशेनाभिविख्यातौ त्वं तु खद्योतवन्नृषु ||
६५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
प्रकाशोऽष्टविधस्तत्र गुह्यस्तु वहुविस्तरः ||
४० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
प्रकाशौ च पुनस्तूर्णं वभूवतुरुभौ रणे ||
६१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
प्रकाशौ च मुहूर्तेन तत्रैवास्तामरिन्दमौ |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३८
सञ्जय़ उवाच
प्रकाश्यमाना ददृशुर्निशाय़ां; यथान्तरिक्षे जलदास्तडिद्भिः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११५
भीष्म उवाच
प्रकाशय़ति दोषान्स्वान्सर्पः फणमिवोच्छ्रितम् ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४
शल्य उवाच
प्रकाशय़स्व चात्मानं दैत्यदानवसूदन |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
प्रकीर्णका विप्रकीर्णाः कुथाश्च; प्रधानमुक्तातरलाश्च हाराः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
प्रकीर्णकेशा विध्वस्ता न द्वावेकत्र धावतः ||
८३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रकीर्णकेशां सुश्रोणीं दुर्योधनभुजाङ्कगाम् |
२३ क
स्त्री पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रकीर्णकेशाः क्रोशन्तीः कुररीरिव माधव ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय ६०
दुर्योधन उवाच
प्रकीर्णकेशी पतितार्धवस्त्रा; दुःशासनेन व्यवधूय़माना |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
कृष्ण उवाच
प्रकीर्णकेशे विमुखे व्राह्मणे च कृताञ्जलौ |
६२ क
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
प्रकीर्णकेश्यो व्यथिताः कुरर्य इव दुःखिताः |
५६ क
विराट पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रकीर्णपर्णानि यथा वसन्ते; विशातय़ित्वात्यनिलो नुदन्खे |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११
भीष्म उवाच
प्रकीर्णभाण्डामनवेक्ष्यकारिणीं; सदा च भर्तुः प्रतिकूलवादिनीम् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
भीष्म उवाच
प्रकीर्णमूर्धजा चैव घोरनेत्रा च भारत ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रकीर्णमूर्धजा राजन्यक्षाधिपतिमव्रुवन् ||
१६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २१
गान्धार्यु उवाच
प्रकीर्णमूर्धजाः पत्न्यो रुदत्यः पर्युपासते ||
६ ख
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रकीर्णमूर्धजाः सर्वा विमुक्ताभरणस्रजः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०८
गुरुरु उवाच
प्रकीर्णमेषभारो हि यद्वद्धार्येत दस्युभिः |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
महेश्वर उवाच
प्रकीर्णमैथुना ये च क्लीवा जाय़न्ति ते नराः ||
५२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रकीर्णरश्मावादित्ये विमले लोहिताय़ति ||
२० ख
स्त्री पर्व
अध्याय २५
गान्धार्यु उवाच
प्रकीर्णसर्वाभरणा रुदन्त्यः शोककर्शिताः |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
प्रकीर्णान्मूर्धजान्धुन्वन्दन्तैर्दन्तानुपस्पृशन् |
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३८
व्रह्मो उवाच
प्रकीर्तिताः सत्त्वगुणा विशेषतो; यथावदुक्तं गुणवृत्तमेव च |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
प्रकीर्य केशान्धावन्तः प्रत्यदृश्यन्त भारत ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
प्रकीर्य केशान्धावन्तः प्रत्यदृश्यन्त भारत ||
३८ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रकीर्य केशान्सुशुभान्भूषणान्यवमुच्य च |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५०
भीष्म उवाच
प्रकीर्य सर्वतः सर्वे जालं चकृषिरे तदा ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
प्रकीर्यत महासेना शरवर्षाभितापिता |
३३ क