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आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
पञ्चभ्य इव भूतेभ्यो लोकसंविधय़स्त्रय़ः ||
२३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९१
वसिष्ठ उवाच
पञ्चमं विद्धि राजेन्द्र भौतिकं सर्गमर्थवत् ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९८
याज्ञवल्क्य उवाच
पञ्चमं सर्गमित्याहुर्भौतिकं भूतचिन्तकाः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
भीष्म उवाच
पञ्चमः स महावेगो विवहो नाम मारुतः ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
पञ्चमस्तु भवेद्भागः शूद्रापुत्राय़ भारत ||
५४ ख
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्चमस्तु वभूवैषां प्रवरो यो महासुरः |
५० क
द्रोण पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
पञ्चमे दिवसे चैव पृथिवी ते भविष्यति ||
६० ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
पञ्चमे दिवसे नारी षष्ठेऽहनि पुमान्भवेत् |
१४३ क
विराट पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
पञ्चमे पञ्चमे वर्षे द्वौ मासावुपजाय़तः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
पञ्चमे वाथ षष्ठे वा वर्षे कन्या प्रसूय़ते |
४८ क
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
पञ्चमेन शिरः काय़ात्सारथेस्तु समाक्षिपत् ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय २६५
मार्कण्डेय़ उवाच
पञ्चमो लोकपालानामिति मे प्रथितं यशः ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
पञ्चम्यां चैव षष्ठ्यां च पौर्णमास्यां च भारत |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
पञ्चम्यां वहवः पुत्रा जाय़न्ते कुर्वतां नृप |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२२
भीष्म उवाच
पञ्चरात्रविदो मुख्यास्तस्य गेहे महात्मनः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्चरात्रविदो ये तु यथाक्रमपरा नृप |
६७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्चरात्रस्य कृत्स्नस्य वेत्ता तु भगवान्स्वय़म् |
६३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८८
भीष्म उवाच
पञ्चवर्गप्रमाथीनि नेच्छेच्चैतानि वीर्यवान् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय २१०
मार्कण्डेय़ उवाच
पञ्चवर्णः स तपसा कृतस्तैः पञ्चभिर्जनैः |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २७
व्राह्मण उवाच
पञ्चवर्णानि दिव्यानि पुष्पाणि च फलानि च |
८ क
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्चवर्णानि पात्यन्ते पुष्पाणि भरतर्षभ |
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१
नारद उवाच
पञ्चवर्षकदेशीय़ो वालो नागेन्द्रविक्रमः |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
व्रह्मो उवाच
पञ्चवार्षिकमेतत्तु क्षत्रिय़स्य फलं स्मृतम् |
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९६
वसिष्ठ उवाच
पञ्चविंशं महात्मानं न चासावपि वुध्यते |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
विश्वावसुरु उवाच
पञ्चविंशं यदेतत्ते प्रोक्तं व्राह्मणसत्तम |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
पञ्चविंशक इत्येष व्यक्ताव्यक्तमय़ो गुणः ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९६
वसिष्ठ उवाच
पञ्चविंशतिकस्यास्य योऽय़ं देहेषु वर्तते |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२८
व्यास उवाच
पञ्चविंशतितत्त्वानि तुल्यान्युभय़तः समम् |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९६
वसिष्ठ उवाच
पञ्चविंशतितत्त्वानि प्रवदन्ति मनीषिणः ||
१४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
वसिष्ठ उवाच
पञ्चविंशतिनिष्ठोऽय़ं यदासम्यक्प्रवर्तते |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
पञ्चविंशतिमं प्रश्नं पप्रच्छान्वीक्षिकीं तथा ||
२७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
वसिष्ठ उवाच
पञ्चविंशतिमस्तात लिङ्गेष्वनिय़तात्मकः ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९१
वसिष्ठ उवाच
पञ्चविंशतिमो योऽय़ं ज्ञानादेव प्रवर्तते ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९१
वसिष्ठ उवाच
पञ्चविंशतिमो विष्णुर्निस्तत्त्वस्तत्त्वसञ्ज्ञकः |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
वसिष्ठ उवाच
पञ्चविंशतिसर्गं तु तत्त्वमाहुर्मनीषिणः ||
४९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
पञ्चविंशतिसाहस्रान्निजघान महारथान् ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
वसिष्ठ उवाच
पञ्चविंशस्तथैवात्मा तस्यैवा प्रतिवोधनात् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९५
वसिष्ठ उवाच
पञ्चविंशात्परं तत्त्वं न पश्यति नराधिप |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
पञ्चविंशे तु दिवसे यः प्राशेदेकभोजनम् |
९९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९६
भीष्म उवाच
पञ्चविंशो महाराज परमर्षिनिदर्शनात् ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९४
वसिष्ठ उवाच
पञ्चविंशोऽप्रवुद्धात्मा वुध्यमान इति स्मृतः |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
पञ्चविंशोऽभिमन्येत नान्योऽस्ति परमो मम |
७१ क
स्त्री पर्व
अध्याय ५
विदुर उवाच
पञ्चशीर्षधरैर्नागैः शैलैरिव समुन्नतैः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
पञ्चशीर्षा यवाश्चैव शतशीर्षाश्च शालय़ः ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
पञ्चषष्टिसहस्राणि तथाश्वानां शतानि च |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७९
भरद्वाज उवाच
पञ्चसाधारणे ह्यस्मिञ्शरीरे जीवितं कुतः |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५९
वासुदेव उवाच
पञ्चसेनापरिवृतो द्रोणप्रेप्सुर्महामनाः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २११
भीष्म उवाच
पञ्चस्रोतसि यः सत्रमास्ते वर्षसहस्रिकम् ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २३
व्राह्मण उवाच
पञ्चहोतॄनथैतान्वै परं भावं विदुर्वुधाः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्चाग्निमध्ये च तपस्तेपे संवत्सरं नृपः ||
१५ ख