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वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
पूजय़ा प्रतिजग्राह प्रीय़माणस्तदर्हय़ा ||
१३ ग
वन पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
पूजय़ा प्रतिजग्राह सपुत्रस्तं नराधिपः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
पूजय़ां चक्रिरे हृष्टाः प्रशशंसुश्च फाल्गुनिम् ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
पूजय़ां चक्रुरभ्येत्य ते स्म सर्वे हलाय़ुधम् ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
पूजय़ानश्च तान्सर्वान्सर्वलोकेश्वरेश्वरः ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८०
व्यास उवाच
पूजय़ामास गा नित्यं तस्मात्त्वमपि पूजय़ ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४२
भीष्म उवाच
पूजय़ामास च गुरुं विधिवत्स गुरुप्रिय़ः ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३१
राजो उवाच
पूजय़ामास च ततो विधिना परमेण ह ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय १६२
वैशम्पाय़न उवाच
पूजय़ामास चैवाथ विधिवद्भूरिदक्षिणः |
७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४३
सूत उवाच
पूजय़ामास तमृषिमनुमान्य पुनः पुनः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
पूजय़ामास तांश्चापि विधिवद्भूरिदक्षिणः |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
पूजय़ामास तांश्चैव वृष्ण्यन्धकमहारथान् ||
५२ ख
विराट पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
पूजय़ामास दिव्येन पुष्पवर्षेण भारत ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२२
भीष्म उवाच
पूजय़ामास देवेशं तच्छेषेण पितामहान् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
पूजय़ामास देवेशं हरिं नाराय़णं प्रभुम् ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
पूजय़ामास धर्मेण स चैनं प्रत्यपालय़त् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
पूजय़ामास धौम्यं च यमाभ्यामभिवादितः |
९ क
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
पूजय़ामास पार्थस्य कोपं चास्याकरोद्भृशम् ||
६६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०६
भीष्म उवाच
पूजय़ामास पूजार्हं विधिदृष्टेन कर्मणा ||
४२ ख
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
पूजय़ामास माद्रेय़ः पावकं पुरुषर्षभः ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४२
भीष्म उवाच
पूजय़ामास यत्नेन स पक्षी पक्षिजीविनम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
पूजय़ामास रत्नैश्च गन्धैर्माल्यैश्च सर्वशः ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय ५४
सूत उवाच
पूजय़ामास राजेन्द्रः शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
पूजय़ामास विधिवच्छल्यं धर्मभृतां वरः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
पूजय़ामास विधिवद्वाग्भिरद्भिः फलैरपि ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय २४३
वैशम्पाय़न उवाच
पूजय़ामास विप्रेन्द्रान्क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ||
२३ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
पूजय़ामास विविधैर्गन्धमाल्यैर्महाधनैः |
५४ क
आदि पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
पूजय़ामास शर्मिष्ठां धर्मं च प्रत्यपादय़त् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२५
भीष्म उवाच
पूजय़ामास शिरसा मनसा तैश्च पूजितः |
२ क
वन पर्व
अध्याय २६२
मार्कण्डेय़ उवाच
पूजय़ामास सत्कारैः फलमूलादिभिस्तथा ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय २८९
वैशम्पाय़न उवाच
पूजय़ामास सा कन्या वर्धमानैस्तु सर्वदा ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७६
भीष्म उवाच
पूजय़ामासुरव्यग्रा मधुपर्केण भार्गवम् |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
पूजय़ामासुरूचुश्च सान्त्वपूर्वमिदं वचः ||
३० ख
सभा पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
पूजय़ित्वा कुरुश्रेष्ठो दैवतानि निवेश्य च ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६८
भीष्म उवाच
पूजय़ित्वा च तद्वाक्यं माण्डव्यो मोक्षमाश्रितः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
वैशम्पाय़न उवाच
पूजय़ित्वा च देवेशं पुनराय़ात्स्वमाश्रमम् ||
१२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३७
व्यास उवाच
पूजय़ित्वा ततः पश्चाद्गृहस्थो भोक्तुमर्हति ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
पूजय़ित्वा ततो द्रोणं विधिवत्स निषादजः |
३२ क
सभा पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
पूजय़ित्वा तु पूजार्हं व्रह्मक्षत्रं विशेषतः |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
पूजय़ित्वा द्विजांश्चैव पूजितश्च तपोधनैः |
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
पूजय़ित्वा धनाध्यक्षं प्रणिपत्याभिवाद्य च |
९ क
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
पूजय़ित्वा यथा रामं प्रतिजग्मुर्यथागतम् |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
पूजय़ित्वा यथान्याय़मनुजज्ञे गृहान्प्रति ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१२
भीष्म उवाच
पूजय़ित्वा यथान्याय़मभिवाद्य कृताञ्जलिः |
३० क
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
पूजय़ित्वा यथान्याय़मव्रवीत्तं शकुन्तला |
१५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
पूजय़ित्वा वचस्तत्तदकार्षीत्परवीरहा ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
पूजय़ेत्तादृशं दृष्ट्वा शय़नासनभोजनैः ||
२७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
युधिष्ठिर उवाच
पूजय़ेथा महाप्राज्ञ मद्वाक्येन यथार्हतः ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
पूजय़ेथा महाभागान्यथाचार्यान्यथा पितॄन् ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
पूजय़ेथा याय़जूकांस्तवाप्यंशो भवेद्यथा ||
९ ख