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वन पर्व
अध्याय ६९
वृहदश्व उवाच
प्रमाणात्परिहीनस्तु भवेदिति हि मे मतिः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
प्रमाणानि हि पूज्यानि ततस्तं पूजय़ाम्यहम् |
२३ क
वन पर्व
अध्याय ३२
युधिष्ठिर उवाच
प्रमाणान्यतिवृत्तो हि वेदशास्त्रार्थनिन्दकः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५२
युधिष्ठिर उवाच
प्रमाणे चाप्रमाणे च विरुद्धे शास्त्रता कुतः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३४
शुक उवाच
प्रमाणे चाप्रमाणे च विरुद्धे शास्त्रता कुतः ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय ९
नारद उवाच
प्रमाणेन यथा याम्या शुभप्राकारतोरणा ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रमाणेऽथ लय़स्थाने किंनराः कृतनिश्रमाः |
३२ क
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रमाथिनं महावीर्यं दृढमुष्टिं दुरासदम् |
५६ क
कर्ण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
प्रमाथिनं वलवन्तं प्रहारिणं; प्रभञ्जनं मातरिश्वानमुग्रम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय २७१
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रमाथिनमभिद्रुत्य प्रममाथ महावलः ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
देवा ऊचुः
प्रमाथिभिर्घोररूपैर्भीमोदग्रैर्गणैर्वृतः |
८९ क
वन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
प्रमादं परिरक्षद्भिरुग्रसेनोद्धवादिभिः ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४२
सनत्सुजात उवाच
प्रमादं वै मृत्युमहं व्रवीमि; सदाप्रमादममृतत्वं व्रवीमि ||
४ ख
विराट पर्व
अध्याय ४
धौम्य उवाच
प्रमादमवहेलां च कोपं च परिवर्जय़ेत् ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३६
श्रीभगवानु उवाच
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
मुनिरु उवाच
प्रमादाद्धि स्खलेद्राजा स्खलिते नास्ति जीवितम् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय १८९
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रमादाद्यत्कृतं तेऽभूत्संय़ग्दानेन तज्जय़ |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४२
सनत्सुजात उवाच
प्रमादाद्वै असुराः पराभव; न्नप्रमादाद्व्रह्मभूता भवन्ति |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३६
श्रीभगवानु उवाच
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निवध्नाति भारत ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
प्रमादिनं हि राजानं लोकाः परिभवन्त्युत ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रमादय़ति तत्कर्म न तत्राहुरतिक्रमम् ||
१४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २२
गान्धार्यु उवाच
प्रमापय़ति चात्मानमाक्रोशति च पाण्डवान् ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२
वृहस्पतिरु उवाच
प्रमीय़ते चास्य प्रजा ह्यकाले; सदा विवासं पितरोऽस्य कुर्वते |
२१ क
सभा पर्व
अध्याय ४८
दुर्योधन उवाच
प्रमीय़माणमारव्धं पच्यमानं तथैव च |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४८
शौनक उवाच
प्रमीय़माणानुन्मोच्य भ्रूणहा विप्रमुच्यते ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
प्रमुक्तं द्रोणकर्णाभ्यां व्रह्मास्त्रमरिमर्दन |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
प्रमुक्ता रथिभिर्वाणा भीमवेगाः सुतेजनाः |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
प्रमुखस्थे तदा कर्णे वलं पाण्डवरक्षितम् |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
प्रमुखे तस्य सैन्यस्य द्रोणोऽवस्थितनाय़के |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
प्रमुखे तिष्ठमानं च न कञ्चिन्न निहन्ति सः ||
५२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
प्रमुखे पाण्डवेय़ानां कुरूणां च नृशंसवत् ||
७७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
प्रमुखे पाण्डुपुत्राणां तव चैव विशां पते |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३५
सञ्जय़ उवाच
प्रमुखे पाण्डुपुत्राणां धृष्टद्युम्नस्य चाभिभो ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
प्रमुखे वर्तमानं तु द्विपं वङ्गस्य सात्यकिः |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
प्रमुखे वर्तमानस्य भल्लेनापहरद्रथात् ||
५६ ख
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
प्रमुखे वर्तमानस्य भल्लेनापाहरच्छिरः ||
६२ ख
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
प्रमुखे वर्तमानस्य भल्लेनापाहरद्ध्वजम् |
६४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
प्रमुखे वृष्णिसिंहस्य पार्थस्य च महात्मनः ||
८० ख
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रमुखे सर्वसैन्यस्य भीतोद्विग्नस्य भारत |
३१ क
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
प्रमुखे सहदेवस्य जघानाश्वांश्च मद्रराट् |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
प्रमुखे सूतपुत्रस्य सोदर्या निहतास्त्रय़ः ||
६० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०१
भीष्म उवाच
प्रमुचश्चेध्मवाहश्च भगवांश्च दृढव्रतः ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
प्रमुञ्चन्तं वाणसङ्घानमोघा; न्मर्मच्छिदो वीरहणः सपत्रान् |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रमुञ्चेमान्मृत्युपाशात्क्षत्रिय़ान्क्षत्रिय़र्षभ |
५२ क
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रमुमोचाशनिप्रख्यं शरमग्निशिखोपमम् ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८३
सञ्जय़ उवाच
प्रमूढा नैव विविदुर्मृधे कृत्यं स्म किञ्चन ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रमूढा पृथिवी सर्वा मृत्युपाशसिता कृता |
२६ क
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रमूढोऽभूत्प्रजासर्गे तपस्तेपे महत्ततः ||
५१ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १२४
सञ्जय़ उवाच
प्रमृज्य वदनं शुभ्रं पुण्डरीकसमप्रभम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय २८१
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रमृज्याश्रूणि नेत्राभ्यां सावित्री धर्मचारिणी ||
९५ ख