वन पर्व
अध्याय
१३१
श्येन उवाच
प्रमृते मय़ि धर्मात्मन्पुत्रदारं नशिष्यति |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
प्रमृद्नंश्च शरांस्तांस्ताञ्शरव्रातैर्महाय़शाः ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
प्रमृद्य च रथश्रेष्ठान्युधिष्ठिरमपीडय़त् ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रमृद्य तरसा राष्ट्रं पुरं ते मृदितं मय़ा |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रमृद्य तरसा शैलं मानुषेण धनेश्वर |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
प्रमृद्य पद्भ्यामहितान्निहन्ति यः; पुनश्च दोर्भ्यां शतमन्युविक्रमः ||
७६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रमृद्य परराष्ट्राणि कृतार्थं पुनरागतम् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रमृष्टभाण्डा मृष्टान्ना काले भोजनदाय़िनी |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
प्रमोदने श्वापदपक्षिरक्षसां; जनक्षय़े वर्तति तत्र दारुणे |
७६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
प्रमोहः सर्वसत्त्वानामतीव समपद्यत |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
प्रमोहनास्त्रेण रणे मोहितानात्मजांस्तव ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
प्रमोहो भ्रम आवर्तो घ्राणश्रवणदर्शने |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
गुरुरु उवाच
प्रमोहो हर्षजः प्रीतिरसन्देहो धृतिः स्मृतिः |
२२ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२५
गान्धार्यु उवाच
प्रम्लाननलिनाभानि भान्ति वक्त्राणि माधव ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
प्रम्लानेषु च माल्येषु ततः पिपतिषोर्भय़म् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
२६९
मार्कण्डेय़ उवाच
प्ररुजश्चारुजश्चैव प्रघसश्चैवमादय़ः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२८
सूत उवाच
प्ररुजेन च संय़ुद्धं चकार प्रलिहेन च ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
प्ररुरोद भृशोद्विग्नो हा राजन्निति सस्वरम् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६४
भीष्म उवाच
प्ररूपय़न्ति तद्भावमागमैरेव शाश्वतम् ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
श्रीभगवानु उवाच
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि |
९ क
सभा पर्व
अध्याय
४६
दुर्योधन उवाच
प्रलम्भं च शृणुष्वान्यं गदतो मे नराधिप |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
प्रलम्वं नरकं जम्भं पीठं चापि महासुरम् |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
प्रलम्वाभरणो वाहुरुदतिष्ठद्विशां पते ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
प्रलव्धश्च हृषीकेशस्तच्च कर्म विरोधितम् |
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३२
विदुरो उवाच
प्रलव्धस्य हि शत्रोर्वै शेषं कुर्वन्ति साधवः ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
२३५
चित्रसेन उवाच
प्रलव्धा धर्मराजस्य कृष्णाय़ाश्च धनञ्जय़ ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
प्रलापं नृपतेः श्रुत्वा विद्रवन्ति दिशो दश ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
प्रलापः क्रिय़ते कस्मात्सुमहाञ्शोकमूर्छितैः |
५३ क
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रलापय़ुक्ता महती कथा न्यस्ता पटे यथा ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय
२७
सूत उवाच
प्रलीनान्स्वेष्विवाङ्गेषु निराहारांस्तपोधनान् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०९
गुरुरु उवाच
प्रलीनैरिन्द्रिय़ैर्देही वर्तते देहवानिव ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
प्रलीय़ते चोद्भवति तस्मान्निर्दिश्यते तथा ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
प्रलीय़न्ते यथाकालमूर्मय़ः सागरे यथा ||
१२ ग
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रलोभनार्थं तस्याथ प्राहिणोत्पाकशासनः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२५९
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रलोभ्य वरदानेन सर्वानेव पृथक्पृथक् ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
प्रलोभय़त भद्रं वः शमय़ध्वं भय़ं मम ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
११३
लोमश उवाच
प्रलोभय़न्त्यो विविधैरुपाय़ै; राजग्मुरङ्गाधिपतेः समीपम् ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
वासुदेव उवाच
प्रलय़ं चापवर्गं च भूतानां प्रभवाप्ययौ ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
जनमेजय़ उवाच
प्रलय़ं न विजानन्ति आत्मनः परिनिर्मितम् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रलय़ं यान्ति भूय़िष्ठं पृथिव्यां पृथिवीपते ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६७
भीष्म उवाच
प्रलय़े च कमभ्येति तद्भवान्प्रव्रवीतु मे ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७५
युधिष्ठिर उवाच
प्रलय़े च कमभ्येति तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रलय़े चापि निर्वृत्ते प्रवुद्धे च पितामहे |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
गुरुरु उवाच
प्रलय़े प्रकृतिं प्राप्य युगादौ सृजते प्रभुः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
प्रलय़ेऽध्यात्ममाविश्य सुप्त्वा सोऽन्ते विवुध्यते ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
प्रलय़ोत्पत्तितत्त्वज्ञाः सर्वज्ञाः समदर्शिनः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२८४
कर्ण उवाच
प्रवक्ताद्य हितान्वेषी शृणु चेदं वचो मम ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२९
व्यास उवाच
प्रवक्तॄणि द्वय़ान्याहुरात्मज्ञानीतराणि च |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२९
व्यास उवाच
प्रवक्तॄणि विशिष्टानि सर्वधर्मोपधारणात् ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
प्रवक्तॄन्पृच्छते योऽन्यान्स वै ना पदमर्च्छति ||
२७ ख