सभा पर्व
अध्याय
५०
दुर्योधन उवाच
प्रत्यमित्रश्रिय़ं दीप्तां वुभूषुर्भरतर्षभ ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रत्ययं कुरु मे देवि वानरोऽस्मि न राक्षसः ||
६३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६७
भीष्म उवाच
प्रत्ययं परिरक्षन्तौ महत्कर्म करिष्यतः ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्ययाद्धास्तिनपुरं शोकोपहतचेतनः ||
५३ ख
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रत्ययार्थं कथां चेमां कथय़ामास जानकी |
६७ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्ययुध्यत यः सर्वान्पुरा वः सपदानुगान् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यर्चितः पुष्पधरस्य मूले; महाद्रुमस्योपविवेश राजा ||
२४ ख
सभा पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यर्चितश्च तैः सर्वैर्यज्ञाय़ैव मनो दधे ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यवारय़दाय़स्तः प्रकुर्वन्विपुलं क्षय़म् ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यवारय़दाय़ान्तमार्ष्यशृङ्गिर्महारथः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यविध्यंस्ततः पार्थस्तानविध्यत्त्रिभिस्त्रिभिः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७२
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यविध्यच्छितैर्वाणैः षड्विंशत्या स्तनान्तरे ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यविध्यत तान्सर्वान्पिता देवव्रतस्तव |
१०० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यविध्यत्पुनश्चान्यैः सा भीमं पुनराव्रजत् ||
१६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यविध्यत्स तान्सर्वान्दर्शय़न्पाणिलाघवम् ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यविध्यदमेय़ात्मा किरीटी भरतर्षभ ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यविध्यदमेय़ात्मा व्रह्मास्त्रं समुदीरय़न् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यविध्यदसम्भ्रान्तस्तदद्भुतमिवाभवत् ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यविध्यद्ध्वजांश्चैषां भल्लैश्चिच्छेद काञ्चनान् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यविध्यन्महातेजा वलवानपकारिणम् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यविध्यन्महावेगैश्चतुर्भिश्चतुरो हय़ान् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
प्रत्यविध्यमहं तं तु वज्रैरिव शिलोच्चय़म् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
१६७
अर्जुन उवाच
प्रत्यविध्यमहं रोषाद्दशभिर्दशभिः शरैः ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
प्रत्यव्रुवं महाराज यत्तच्छृणु समाहितः ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
प्रत्यव्रुवं महावाहो यथाश्रुतमरिन्दम ||
४१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
व्रह्मो उवाच
प्रत्यव्रुवं यद्देवेन्द्र तन्निवोध शचीपते ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
२२९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यव्रुवंस्तान्पुरुषानिदं सुपरुषं वचः ||
२५ ख
मौसल पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यव्रुवंस्तान्मुनय़ो यत्तच्छृणु नराधिप ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२४४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यव्रुवन्मृगास्तत्र हतशेषा युधिष्ठिरम् ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५२
भीष्म उवाच
प्रत्यव्रूतां च तमृषिमेवमस्त्विति भारत ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
१९४
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रत्यव्रूतां महाराज सहितौ मधुसूदनम् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४
नारद उवाच
प्रत्यषेधच्च तां कन्यामसत्कृत्य नराधिपान् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यषेधद्द्रुतं क्रुद्धो महावातो घनानिव ||
३३ ख
विराट पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यषेधद्वहूनेकः सपत्नांश्चैव दिग्जय़े ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यषेधन्त राजानं श्लाघमानं पुनः पुनः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यस्तो वहुभिर्वाणैर्दशधर्मगतेन वै ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यहन्यन्त ते सर्वे गदामासाद्य साय़काः |
५९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यहीय़त काकाच्च मुहूर्तमिव मारिष ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
भृगुरु उवाच
प्रत्याक्रोशेदिहाक्रुष्टस्ताडितः प्रतिताडय़ेत् |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६
मरुत्त उवाच
प्रत्याख्यातश्च तेनापि नाहं जीवितुमुत्सहे ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्याख्यातश्च तेनापि स तदा शूरमानिना ||
३५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६
व्यास उवाच
प्रत्याख्यातश्च तेनाहं जीवितुं नाद्य कामय़े |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्याख्यातस्त्वहं तेन न दद्यामिति भार्गव ||
३० ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
प्रत्याख्याता निरानन्दा शाल्वेन च निराकृता ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
६२
वृहदश्व उवाच
प्रत्याख्याता मय़ा तत्र नलस्यार्थाय़ देवताः |
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
प्रत्याख्याता हि शाल्वेन त्वय़ा नीतेति भारत |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
प्रत्याख्याता ह्यसत्कृत्य स कस्मै रोचय़ेद्वचः ||
३५ ग
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
प्रत्याख्याताः शमस्यार्थे किं नु तस्याद्य भेषजम् ||
३४ ख
विराट पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्याख्यातो राजपुत्र्या सुदेष्णां कीचकोऽव्रवीत् |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७
मरुत्त उवाच
प्रत्याख्यातो हि तेनास्मि तथानपकृते सति ||
१८ ख