chevron_left  प्रपन्नार्तिविनाशाय़arrow_drop_down
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
प्रपन्नार्तिविनाशाय़ व्रह्मद्विट्सङ्घघातिने ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
प्रपश्य वुद्धिचक्षुषा प्रदृश्यते हि सर्वतः ||
५३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
प्रपाणां च सभानां च सङ्क्रमाणां च भारत |
६३ क
सभा पर्व
अध्याय ५५
विदुर उवाच
प्रपातं वुध्यते नैव वैरं कृत्वा महारथैः ||
५ ख
सभा पर्व
अध्याय ५९
विदुर उवाच
प्रपाते त्वं लम्वमानो न वेत्सि; व्याघ्रान्मृगः कोपय़सेऽतिवाल्यात् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
प्रपातैराय़ुधान्युग्राण्युद्वहन्तं न चुक्षुभे ||
६८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६७
यम उवाच
प्रपाश्च कार्याः पानार्थं नित्यं ते द्विजसत्तम |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
प्रपाश्च विपणीश्चैव यथोद्देशं समादिशेत् ||
५१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९२
अग्निरु उवाच
प्रपितामहाय़ च तत एष श्राद्धविधिः स्मृतः ||
१३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
प्रपुष्पिताग्रशिखरः पारिजात इव द्रुमः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
विश्वामित्र उवाच
प्रपूतात्मा धर्ममेवाभिपत्स्ये; यदेतय़ोर्गुरु तद्वै व्रवीहि ||
८२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
प्रपेततुः स्पर्धय़ाथ ततस्तौ हंसवाय़सौ |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
प्रपेतुः सर्वतो दिग्भ्यः प्रदिग्भ्यश्चार्जुनं प्रति ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय ४७
सूत उवाच
प्रपेतुरग्नावुरगा मातृवाग्दण्डपीडिताः ||
२५ ग
वन पर्व
अध्याय १४३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रपेतुरनिशं तत्र शीघ्रवातसमीरिताः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय १५५
व्राह्मण उवाच
प्रपेदे छन्दय़न्कामैरुपय़ाजं धृतव्रतम् ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
प्रपेदे यमुनामेव सोऽपि तस्यां न्यमज्जत ||
४२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७६
भीष्म उवाच
प्रपेदे शरणं चैव शरण्यं भृगुनन्दनम् ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
प्रफुल्लं चम्पकं यद्वद्भ्रमरा मधुलिप्सवः ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय ८७
धौम्य उवाच
प्रफुल्लनलिनं राजन्देवगन्धर्वसेवितम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रफुल्लपङ्कजवतीं नलिनीं सुमनोहराम् ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
प्रभग्नं च वलं दृष्ट्वा जगाम परमां व्यथाम् ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
प्रभग्नं च वलं दृष्ट्वा वध्यमानं महारथैः ||
८८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
प्रभग्नं द्रुतमाविग्नमतीव शरपीडितम् ||
५६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
प्रभग्नं पुनरेवासीत्तव सैन्यं समाकुलम् ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
प्रभग्नं वलमेतद्धि योत्स्यमानं जनार्दन ||
७९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
प्रभग्नं वाय़ुवेगेन महाशालं यथा वने ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय १६५
गन्धर्व उवाच
प्रभग्नं सर्वतस्त्रस्तं विश्वामित्रस्य पश्यतः ||
३८ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
प्रभग्नं स्ववलं दृष्ट्वा पुत्रस्ते द्रोणमभ्ययात् ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
प्रभग्ननीडैर्मणिहेममण्डितैः; स्तृता मही द्यौरिव शारदैर्घनैः ||
२४ ख
विराट पर्व
अध्याय ६४
उत्तर उवाच
प्रभग्नमव्रवीद्भीतं राजपुत्रं महावलम् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
प्रभग्ना विनिवर्तन्ते कृतास्त्रा युद्धदुर्मदाः ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४
व्यास उवाच
प्रभग्ना सहसा राजन्दिशो विभ्रामिता परैः |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
प्रभग्नांस्तावकान्राजन्सृञ्जय़ाः पृष्ठतोऽन्वय़ुः ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
प्रभग्नानथ तान्दृष्ट्वा राजा दुर्योधनोऽव्रवीत् |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
प्रभग्नेषु च वीरेषु पाण्डवेन महात्मना ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय २४९
कोटिकाश्य उवाच
प्रभङ्करोऽथ भ्रमरो रविश्च; शूरः प्रतापः कुहरश्च नाम ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
प्रभज्यमानं तत्सैन्यं दृष्ट्वा देवकिनन्दनः |
४० क
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
प्रभज्यमानं सैन्यं तु दृष्ट्वा यादवनन्दनः |
३० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
प्रभद्रकगणान्सर्वानभिदुद्राव वेगवान् |
६१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
प्रभद्रकाः शीघ्रतरा युवानो; विशारदाः सिंहसमानवीर्याः |
३० क
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
प्रभद्रकाणां प्रवरानहनत्सप्तसप्ततिम् ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभद्रकाश्च पाञ्चाला भीमसेनमुखा यय़ुः ||
५० ग
द्रोण पर्व
अध्याय १२९
सञ्जय़ उवाच
प्रभद्रकाश्च पाञ्चालाः षट्सहस्राः प्रहारिणः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
प्रभद्रकास्तु पाञ्चालाः षट्सहस्राण्युदाय़ुधाः |
३६ क
शल्य पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
प्रभद्रकैः समाय़ुक्तो योधय़ामास धन्विनौ ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभवं च प्रतिष्ठां च दान्ता निन्दन्त आसते ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभवं च सरस्वत्याः प्लक्षप्रस्रवणं वलः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९८
भीष्म उवाच
प्रभवं चाप्ययं चैव कालसङ्ख्यां तथैव च |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८
संवर्त उवाच
प्रभवं सर्वभूतानां धारणं धरणीधरम् ||
२६ ख