chevron_left  प्रवृत्ताश्चैवarrow_drop_down
सौप्तिक पर्व
अध्याय २
कृप उवाच
प्रवृत्ताश्चैव दृश्यन्ते निवृत्ताश्चैव सर्वशः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०२
भीष्म उवाच
प्रवृत्तास्त्रिदिवे राजन्दिव्याश्चैव सनातनाः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४९
नारद उवाच
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कल्पय़ामास वै प्रभुः ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भय़ाभय़े |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय ३८
श्रीभगवानु उवाच
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१५
भीष्म उवाच
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च भूतानां यो न वुध्यते |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
प्रवृत्तिं ज्ञातुमाय़ाताविह पाण्डवनन्दन ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२६
कृशतनुरु उवाच
प्रवृत्तिं यो न जानाति साशा कृशतरी मय़ा ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१०
गुरुरु उवाच
प्रवृत्तिः पुनरावृत्तिर्निवृत्तिः परमा गतिः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
व्यास उवाच
प्रवृत्तिधर्मान्विदधे कृत्वा लोकस्य चित्रताम् ||
८८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
जनमेजय़ उवाच
प्रवृत्तिधर्मान्विदधे स एव भगवान्प्रभुः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रवृत्तिधर्मिणश्चैव प्राजापत्येन कल्पिताः ||
६२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
प्रवृत्तिमधिगच्छन्तु न हि शुध्यति मे मनः ||
५२ ख
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रवृत्तिरुपलव्धा ते वैदेह्या रावणस्य च |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
युधिष्ठिर उवाच
प्रवृत्तिलक्षणं धर्मं पश्यामि परमं नृप |
७९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१०
गुरुरु उवाच
प्रवृत्तिलक्षणं धर्मं प्रजापतिरथाव्रवीत् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१०
गुरुरु उवाच
प्रवृत्तिलक्षणं धर्ममृषिर्नाराय़णोऽव्रवीत् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
प्रवृत्तिलक्षणश्चैव धर्मो नाराय़णात्मकः |
७७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
प्रवृत्तिलक्षणे धर्मे फलार्थिभिरभिद्रुते |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रवृत्तिलक्षणैर्युक्तं नावेक्षति हरिः स्वय़म् ||
७१ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
महेश्वर उवाच
प्रवृत्तिलक्षणो धर्मो गृहस्थेषु विधीय़ते |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२९
शुक उवाच
प्रवृत्तिलक्षणो धर्मो निवृत्तिरिति चैव हि ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३३
भीष्म उवाच
प्रवृत्तिलक्षणो धर्मो निवृत्तौ च सुभाषितः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०५
गुरुरु उवाच
प्रवृत्तिलक्षणो धर्मो यथाय़मुपपद्यते |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४३
व्रह्मो उवाच
प्रवृत्तिलक्षणो योगो ज्ञानं संन्यासलक्षणम् ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
प्रवृत्तिश्च निवृत्तिश्च निय़तः शाश्वतो ध्रुवः |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रवृत्तिय़ुक्तं कर्तव्यं युष्मत्प्राणोपवृंहणम् ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६३
सञ्जय़ उवाच
प्रवृत्ते तुमुले युद्धे द्रोणपाण्डवय़ोर्मृधे ||
४८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
प्रवृत्ते वैशसे युद्धे शाल्वार्थं नापतं पुरा |
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
जनमेजय़ उवाच
प्रवृत्तौ च निवृत्तौ च यो यथा परिकल्पितः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२२
भीष्म उवाच
प्रवृत्तौ च निवृत्तौ च योनिरेतद्भविष्यति |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
प्रवृत्तौ च निवृत्तौ च विधानमृषिनिर्मितम् ||
७६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा तत्फलं सोऽश्नुतेऽवशः ||
६८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
शुक उवाच
प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा स ते छेत्स्यति संशय़म् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
प्रवृत्तौ शरसम्पातं कर्तुं पुरुषसत्तमौ ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३६
व्रह्मो उवाच
प्रवृत्त्यात्मकमेवाहू रजः पर्याय़कारकम् |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १
भीष्म उवाच
प्रवृत्तय़श्च या लोके तथैव च निवृत्तय़ः |
४७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
व्रह्मो उवाच
प्रवृत्तय़श्च याः सर्वाः पश्यन्ति परिणामजाः ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय २०
सूत उवाच
प्रवृद्धः सहसा पक्षी महाकाय़ो नभोगतः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रवृद्धजनसस्या च सहदेवा व्यरोचत ||
२५ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
प्रवृद्धध्वजमण्डूकां भेरीविस्तीर्णकच्छपाम् |
११९ क
वन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
प्रवृद्धमवलेपं च तस्य दुष्कृतकर्मणः ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रवृद्धविटपैर्वृक्षैः सुखच्छाय़ैः समावृतम् |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
प्रवृद्धशृङ्गद्रुमवीरुदोषधी; प्रवृद्धनानाविधपर्वतौकसौ |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
प्रवृद्धानां च वृक्षाणां शाखाः प्रच्छेदय़ेत्तथा |
४० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय २
कृप उवाच
प्रवृष्टे च यथा देवे सम्यक्क्षेत्रे च कर्षिते |
७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रवेक्ष्यति महात्मानं विदुरश्च युधिष्ठिरम् |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
प्रवेक्ष्यति महासेनां पुत्राणां मम सञ्जय़ ||
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
प्रवेक्ष्यति रणे सेनां पुत्राणां मे वृकोदरः ||
३३ ख