विराट पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
पुनरीय़ुः सुसंरव्धा धनञ्जय़जिघांसय़ा |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२८५
सूर्य उवाच
पुनरुक्तं च वक्ष्यामि त्वं राधेय़ निवोध तत् |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३७
द्रोण उवाच
पुनरुक्तं च वक्ष्यामि यत्कार्यं भूतिमिच्छता |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
पुनरुक्तं च वक्ष्यामि विश्रम्भेण जनार्दन |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
पुनरुक्तं प्रवक्ष्यामि दिष्टमेतदिति प्रभो ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
पुनरुक्तेन किं तेन भाषितेन पुनः पुनः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२८२
मार्कण्डेय़ उवाच
पुनरुक्त्वा च करुणां वाचं तौ शोककर्शितौ |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
पुनरुच्चारय़न्वाणीं याहि याहीति सारथिम् ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
पुनरुत्तस्थतुः शीघ्रं रसानामालय़ात्तदा |
५६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
पुनरुत्पततः कांश्चिद्दूरादपि नरोत्तमान् |
७८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
पुनरुद्विग्नहृदय़ः किमेतदिति चिन्तय़म् ||
११३ ख
वन पर्व
अध्याय
११४
लोमश उवाच
पुनरुन्मज्ज्य सलिलाद्वेदीरूपा स्थिता वभौ ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३७
वैशम्पाय़न उवाच
पुनरूचुर्महावीर्यं भीमसेनमिदं वचः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
पुनरूचुश्च ते सर्वे तापसाः संशितव्रताः ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६
द्रुपद उवाच
पुनरेकाग्रकरणं तेषां कर्म भविष्यति ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
पुनरेव कथां चक्रुः कन्यां प्रति वनौकसः ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
पुनरेव च तान्कर्णो जघानाशु पतत्रिभिः ||
३९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०२
कण्व उवाच
पुनरेव च तेनोक्तं वैनतेय़ेन गच्छता |
१५ क
विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
पुनरेव च वक्ष्यामि न हि तृप्यामि तं व्रुवन् ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
पुनरेव च वक्ष्यामि पाण्डवेदं निवोध मे |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
पुनरेव च विप्रर्षिः प्रोवाच कुशिकं नृपम् |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
पुनरेव चतुःषष्ट्या राजन्विव्याध तं नृपम् ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
पुनरेव ततो द्यूते समाह्वय़त पाण्डवान् ||
१०२ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
पुनरेव ततो राजन्महानासीत्सुदारुणः |
५ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
पुनरेव तदा भीमो राजानमिदमव्रवीत् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
भीष्म उवाच
पुनरेव तु तं शक्रः प्रहसन्निदमव्रवीत् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
भीष्म उवाच
पुनरेव तु पप्रच्छ जनको मिथिलाधिपः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
१००
वैशम्पाय़न उवाच
पुनरेव तु सा देवी परिभाष्य स्नुषां ततः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
पुनरेव महर्षिस्तं कृष्णद्वैपाय़नोऽव्रवीत् |
१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
पुनरेव महातेजा धृतराष्ट्रोऽव्रवीदिदम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५०
नारद उवाच
पुनरेव महातेजा व्रह्मा वचनमव्रवीत् ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११५
वैशम्पाय़न उवाच
पुनरेव महातेजाः पप्रच्छ वदतां वरम् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५०
नारद उवाच
पुनरेव महात्मानं नेति देवेशमव्ययम् ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
पुनरेव महानादं व्यसृजन्त महारथाः ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
पुनरेव महाभागः सञ्जय़ं पर्यपृच्छत ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
पुनरेव महावाहुं धृतराष्ट्रमुवाच ह ||
१५ ख
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
पुनरेव महावाहुर्विराटो राजसत्तमः |
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
पुनरेव वचः प्राह शनैराचार्यपुङ्गवः ||
६८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
पुनरेव शितैर्वाणैर्युधिष्ठिरमपीडय़त् ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
२०५
मार्कण्डेय़ उवाच
पुनरेव स धर्मात्मा व्याधो व्राह्मणमव्रवीत् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
पुनरेव सभामध्ये सर्वे तु समुपाविशन् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
पुनरेवं न कर्तव्यं मम चेदिच्छसि प्रिय़म् ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
पुनरेवं न कर्तव्यं मम चेदिच्छसि प्रिय़म् ||
१२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
पुनरेवानुपप्रच्छ साम्पराय़े भवाभवौ ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
पुनरेवान्वधावत्स तं हय़ं कामचारिणम् ||
४३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
पुनरेवान्ववर्तन्त पाण्डवानातताय़िनः ||
६२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
पुनरेवाभवत्तीव्रः पूर्णसागरय़ोरिव ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१७
वैशम्पाय़न उवाच
पुनरेवाभ्यवर्षत्तमम्भः प्रविसृजन्वहु ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
पुनरेवाभ्यहन्यन्त तव सैन्यप्रहर्षणाः ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
पुनरेवार्जुनो वाक्यमुवाचेदं वृकोदरम् ||
३२ ख