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सभा पर्व
अध्याय ८
नारद उवाच
पुण्यगन्धाः स्रजस्तत्र नित्यपुष्पफलद्रुमाः |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
पुण्यगन्धोदय़ं दिव्यं वाय़व्यैरुपशोभितम् ||
५७ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
पुण्यतीर्थानुसंय़ानं वभ्रुवाहनजन्म च ||
९१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
इन्द्र उवाच
पुण्यतीर्थेषु च तथा गात्राण्याप्लावय़न्ति ते ||
५१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
पुण्यतीर्थैश्च कलिलं कुरुक्षेत्रं प्रकीर्तितम् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९८
सूर्य उवाच
पुण्यदानेषु सर्वेषु परमक्षय़्यमेव च ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४८
शौनक उवाच
पुण्यदेशाभिगमनं पवित्रं परमं स्मृतम् |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
पुण्यनामा सुनामा च सुवक्त्रः प्रिय़दर्शनः |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६७
असित उवाच
पुण्यपापक्षय़ार्थं च साङ्ख्यं ज्ञानं विधीय़ते |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६७
असित उवाच
पुण्यपापमय़ं देहं क्षपय़न्कर्मसञ्चय़ात् |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६७
असित उवाच
पुण्यपापविनाशान्ते पुण्यपापसमीरितम् |
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०२
याज्ञवल्क्य उवाच
पुण्यपापविय़ुक्तानां स्थानमाहुर्मनीषिणाम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९१
वसिष्ठ उवाच
पुण्यपापेन मानुष्यं पुण्येनैकेन देवताः ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०२
याज्ञवल्क्य उवाच
पुण्यपापेन मानुष्यमधर्मेणाप्यधोगतिम् ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२१
व्यास उवाच
पुण्यमन्यत्पापमन्यन्न पुण्यं न च पापकम् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
पुण्यमश्वशिरःस्थानं स्थानमाथर्वणस्य च ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
पुण्यमाहुः कुरुक्षेत्रं कुरुक्षेत्रात्सरस्वतीम् |
१२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४८
शौनक उवाच
पुण्यमाहुः कुरुक्षेत्रं सरस्वत्यां पृथूदकम् |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
भीष्म उवाच
पुण्यमेतत्तपश्चैव स्वर्गश्चैष सनातनः |
५० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
पुण्यमेतदभिख्यातं त्रिषु लोकेषु भारत ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
पुण्यमेवाप्नुय़ामेह पापं पापोपसेवनात् ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
पुण्यया क्षेमय़ा वाचा चक्षुषा चावलोकय़ ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय २१४
वैशम्पाय़न उवाच
पुण्यलक्षणकर्माणं स्वदेहमिव देहिनः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
पुण्यशीतामलजलाः पश्यन्प्रीतमनाभवत् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६
भीष्म उवाच
पुण्यशीलं नरं प्राप्य किं दैवं प्रकरिष्यति ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
पुण्यश्च रमणीय़श्च स देशो वः प्रकीर्तितः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२१
व्यास उवाच
पुण्यश्च वाति गन्धस्ते मन्ये कर्मविधानतः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय ७७
वृहदश्व उवाच
पुण्यश्लोकं तदा राजन्नभिवाद्य कृताञ्जलिः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय ५८
वृहदश्व उवाच
पुण्यश्लोकस्ततो राजा दमय़न्तीमथाव्रवीत् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय ७२
वाहुक उवाच
पुण्यश्लोकस्य वै सूतो वार्ष्णेय़ इति विश्रुतः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७४
कश्यप उवाच
पुण्यस्य लोको मधुमान्घृतार्चि; र्हिरण्यज्योतिरमृतस्य नाभिः |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२१
व्यास उवाच
पुण्यस्यैव हि ते गन्धः पुण्यस्यैव च दर्शनम् |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
पुण्यस्वाध्याय़सङ्घुष्टां पुलिनैरुपशोभिताम् |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४
व्यास उवाच
पुण्या गन्धाश्चाहुतीनां प्रवान्ति; जय़स्यैतद्भाविनो रूपमाहुः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
पुण्या गन्धाश्चाहुतीनां प्रवान्ति; जय़स्यैतद्भाविनो रूपमाहुः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय ८६
धौम्य उवाच
पुण्या द्वारवती तत्र यत्रास्ते मधुसूदनः |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
पुण्या पुण्यतमैर्जुष्टा गङ्गा भागीरथी शुभा |
२७ क
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
पुण्या संहर्षणी तेषां वानराणां महात्मनाम् ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३
शल्य उवाच
पुण्यां चेमामहं दिव्यां प्रवृत्तामुत्तराय़णे |
२३ क
शल्य पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
पुण्यां तीर्थशतोपेतां विप्रसङ्घैर्निषेविताम् ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय ८५
यय़ातिरु उवाच
पुण्यां योनिं पुण्यकृतो व्रजन्ति; पापां योनिं पापकृतो व्रजन्ति |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
पुण्यां हैमवतीं देवीं सरिच्छ्रेष्ठां सरस्वतीम् |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७६
युधिष्ठिर उवाच
पुण्यांश्च लोकाञ्जय़ति तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
पुण्यांश्च सात्त्विकान्गन्धान्स्पर्शजान्देहसंश्रितान् |
६० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८०
व्यास उवाच
पुण्याः पवित्राः सुभगा दिव्यसंस्थानलक्षणाः |
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८१
श्रीरु उवाच
पुण्याः पवित्राः सुभगा ममादेशं प्रय़च्छत |
२१ क
वन पर्व
अध्याय ८८
धौम्य उवाच
पुण्यानामपि तत्पुण्यं तत्र ते संशय़ोऽस्तु मा ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय ८६
धौम्य उवाच
पुण्यानामपि पुण्योऽसौ मङ्गलानां च मङ्गलम् ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय २०९
व्राह्मण उवाच
पुण्यानि च भविष्यन्ति पावनानि मनीषिणाम् ||
११ ग
वन पर्व
अध्याय ११८
वैशम्पाय़न उवाच
पुण्यानि चाप्याय़तनानि तेषां; ददर्श राजा सुमनोहराणि ||
१३ ख