अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
भीष्म उवाच
पुरा राजा व्यवहारानधर्म्या; न्पश्यत्यहं परलोकं व्रजामि ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
पुरा रामभय़ादेव तापस्यं समुपाश्रितम् ||
५५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
पुरा वसिष्ठो भगवान्पितामहमपृच्छत ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६४
भीष्म उवाच
पुरा वसुमतीपालो यज्ञं चक्रे दिदृक्षय़ा |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१४२
अर्जुन उवाच
पुरा विकुरुते माय़ां भुजय़ोः सारमर्पय़ ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
पुरा विकुर्वते मूढाः पापात्मानः समागताः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
पुरा विवाति मारुतो यमस्य यः पुरःसरः |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
पुरा वृका भय़ङ्करा मनुष्यदेहगोचराः |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
पुरा वृत्रेण दैत्येन भिन्नदेहाः सहस्रशः ||
४९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
भीष्म उवाच
पुरा वेदान्व्राह्मणा ग्राममध्ये; घुष्टस्वरा वृषलाञ्श्रावय़न्ति |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
पुरा वै दण्डकारण्ये राघवेण महात्मना |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
पुरा वै नैमिषारण्ये देवाः सत्रमुपासते |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
पुरा वैकर्तनं कर्णमेष पापो घटोत्कचः |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३०
कुन्त्यु उवाच
पुरा वैश्रवणः प्रीतो न चासौ तां गृहीतवान् ||
८ ग
मौसल पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
पुरा व्यूढेष्वनीकेषु दृष्ट्वोत्पातान्सुदारुणान् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४०
भीष्म उवाच
पुरा शक्रस्य कथितां नारदेन सुरर्षिणा ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
पुरा शक्रस्य यजतः सर्व ऊचुर्महर्षय़ः |
८ क
विराट पर्व
अध्याय
३९
अर्जुन उवाच
पुरा शक्रेण मे दत्तं युध्यतो दानवर्षभैः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
पुरा शरीरमन्तको भिनत्ति रोगसाय़कैः |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
पुरा शौचं कृतं राजन्हत्वा दैवतकण्टकान् ||
९१ ख
वन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
पुरा स नापराध्नोति सिद्धानां व्रह्मवादिनाम् ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
पुरा स भगवान्साक्षाद्धनुषाक्रीडत प्रभो |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
१४२
अर्जुन उवाच
पुरा संरज्यते प्राची पुरा सन्ध्या प्रवर्तते |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
पुरा समूलवान्धवं प्रभुर्हरत्यदुःखवित् |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
पुरा सर्वं प्रव्यथते मय़ि क्रुद्धे पुरन्दर |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
पुरा सर्वान्प्रमथ्नाति व्रूह्यस्य वधमाशु नः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
पुरा सहिक्क एव ते प्रवाति मारुतोऽन्तकः |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय
१६७
वसिष्ठ उवाच
पुरा साङ्गस्य वेदस्य शक्तेरिव मय़ा श्रुतः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
पुरा सुगुप्तां विवुधैरिवाहवे; विरोचनो देववरूथिनीमिव ||
५८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
भीष्म उवाच
पुरा सुदुःसहं भद्रे मम दुःखं त्वय़ा कृतम् ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
पुरा सृष्टानि भूतानि पीड्यन्ते क्षुधय़ा भृशम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
भीष्म उवाच
पुरा सोऽन्तर्जलगतः स्थाणुभूतो महाव्रतः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७६
भृगुरु उवाच
पुरा स्तिमितनिःशव्दमाकाशमचलोपमम् |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११७
नारद उवाच
पुरा हि कन्यकुव्जे वै गाधेः सत्यवतीं सुताम् |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
पुरा हि दुःखदीर्णानां भवान्गतिरभूद्धि नः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
२५३
वैशम्पाय़न उवाच
पुरा हि निर्भर्त्सनदण्डमोहिता; प्रमूढचित्ता वदनेन शुष्यता |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
पुरा हि नैमिषेय़ाणां सत्रे द्वादशवार्षिके |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८२
अर्जुन उवाच
पुरा हि श्रुतमेतद्वै वसुभिः कथितं मय़ा |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
पुरा हि सोमो राजेन्द्र रोहिण्यामवसच्चिरम् |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय
१५८
अर्जुन उवाच
पुरा हिमवतश्चैषा हेमशृङ्गाद्विनिःसृता |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
पुरा हिरण्मय़ान्नगान्निरीक्षसेऽद्रिमूर्धनि ||
४३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
पुरा ह्युक्तो नाकरोस्त्वं वचो मे; द्यूते जितां द्रौपदीं प्रेक्ष्य राजन् |
६८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
पुरा ह्येष हरिर्भूत्वा वैकुण्ठोऽकुण्ठसाय़कः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१९९
मार्कण्डेय़ उवाच
पुराकृतमिति ज्ञात्वा जीवाम्येतेन कर्मणा ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१९९
मार्कण्डेय़ उवाच
पुराकृतस्य पापस्य कर्मदोषो भवत्ययम् |
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
पुरागस्त्यो महातेजा दीक्षां द्वादशवार्षिकीम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
पुराणं च भविष्यं च सरहस्यं च सत्तम ||
९७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
पुराणं वेदसमितं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ||
७२ ख
वन पर्व
अध्याय
२०५
व्याध उवाच
पुराणं शाश्वतं दिव्यं दुष्प्रापमकृतात्मभिः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
पुराणः शाश्वतो देवो विष्णोरंशः सनातनः ||
२९ ख