शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
पुराणः शाश्वतो धर्मः सर्वप्राणभृतां समः |
९६ क
वन पर्व
अध्याय
८६
धौम्य उवाच
पुराणः श्रूय़ते श्लोकस्तं निवोध युधिष्ठिर ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
पुराणगीतं धर्मज्ञ तच्छृणुष्व यथातथम् ||
३६ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
पुराणचौराः साध्यक्षाश्चरन्ति विषय़े तव ||
७२ ख
आदि पर्व
अध्याय
११३
वैशम्पाय़न उवाच
पुराणदृष्टो धर्मोऽय़ं पूज्यते च महर्षिभिः ||
६ ग
आदि पर्व
अध्याय
५
शौनक उवाच
पुराणमखिलं तात पिता तेऽधीतवान्पुरा |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
५१
सूत उवाच
पुराणमागम्य ततो व्रवीम्यहं; दत्तं तस्मै वरमिन्द्रेण राजन् |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
पुराणमितिहासाश्च तथाख्यानानि यानि च |
१४१ क
वन पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
पुराणमृषिभिः प्रोक्तं सर्वज्ञैः सर्वदर्शिभिः ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
पुराणमृषिभिर्जुष्टं वेदेषु परिनिश्चितम् ||
४८ ख
आदि पर्व
अध्याय
११३
वैशम्पाय़न उवाच
पुराणमृषिभिर्दृष्टं धर्मविद्भिर्महात्मभिः ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
पुराणर्षिरचिन्त्यात्मा समीपमपराजितः ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
पुराणसंश्रिताः पुण्याः कथा वा धर्मसंश्रिताः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८२
वैशम्पाय़न उवाच
पुराणि च व्यतिक्रामन्राष्ट्राणि विविधानि च ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
पुराणि चैषामनुसृत्य भूमिपाः; पुरेषु भोगान्निखिलानिहाजय़न् |
४१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
व्रह्मो उवाच
पुराणि तानि कालेन जग्मुरेकत्वतां तदा ||
११६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
पुराणि न च तं शेकुर्दानवाः प्रतिवीक्षितुम् |
५८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
पुराणि भोगान्वासांसि द्विजातिभ्यो नृपोत्तम ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
पुराणे पुरुषः प्रोक्तो व्रह्मा प्रोक्तो युगादिषु |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय
६४
भीष्म उवाच
पुराणे भैरवं रूपं विष्णो भूतपतेति वै ||
३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
पुराणे सोपनिषदे तथैव ज्योतिषेऽर्जुन ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
५
शौनक उवाच
पुराणे हि कथा दिव्या आदिवंशाश्च धीमताम् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
शल्य उवाच
पुराणैः कर्मभिर्देवं तुष्टाव वलसूदनम् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
पुरात्स निर्ययौ राजा व्राह्मणैस्तापसैः सह ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
७७
वृहदश्व उवाच
पुरादल्पपरीवारो जगाम निषधान्प्रति ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
पुराद्विराटस्य महावलस्य; प्रत्युद्ययुः पुत्रमनन्तवीर्यम् ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
भीष्म उवाच
पुराधर्मो वर्धते नेह याव; त्तावद्गच्छामि परलोकं चिराय़ ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
पुरान्धकारमेककोऽनुपश्यसि त्वरस्व वै |
४३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
पुरापवर्तनं नन्दां महानन्दां च सेव्य वै |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
पुराभिमन्युर्लक्ष्यं नः पश्यतां हन्ति वीर्यवान् |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
भीष्म उवाच
पुरावरान्प्रत्यवरान्गरीय़सो; यावन्नरा नावमंस्यन्ति सर्वे |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
पुरावृत्ताः कथाः पुण्याः सदाचाराः सनातनाः |
४३ क
आदि पर्व
अध्याय
१५८
अर्जुन उवाच
पुरास्त्रमिदमाग्नेय़ं प्रादात्किल वृहस्पतिः |
२६ क
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
पुराहं त्वरितो यातः सभामैन्द्रीं जितक्लमः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०२
भीष्म उवाच
पुराहं मृगय़ां यातो मार्कण्डेय़ाश्रमे स्थितः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
भीष्म उवाच
पुराहं राजशार्दूल तीर्थान्यनुचरन्प्रभो |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
पुराहमात्मजः पार्थ प्रथितः कारणान्तरे |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
पुराय़मस्मान्गृह्णाति क्षिप्रकारी जनार्दनः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
१८३
सनत्कुमार उवाच
पुराय़ोनिर्युधाजिच्च अभिय़ा मुदितो भवः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
पुरिकाय़ां पुरि पुरा श्रीमत्यां पौरिको नृपः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
पुरी समन्ताद्विहिता सपताका सतोरणा |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
युधिष्ठिर उवाच
पुरीं द्वारवतीमद्य द्रष्टुं शूरसुतं प्रभुम् ||
४२ ख
मौसल पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
पुरीमिमामेष्यति सव्यसाची; स वो दुःखान्मोचय़िता नराग्र्यः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
पुरीषं यदि वा मूत्रं ये न कुर्वन्ति मानवाः |
३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
पुरीषमसृजन्केचित्केचिन्मूत्रं प्रसुस्रुवुः ||
८४ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
जमदग्निरु उवाच
पुरीषमुत्सृजत्वप्सु हन्तु गां चापि दोहिनीम् |
६३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०६
गुरुरु उवाच
पुरीषमूत्रविक्लेदशोणितप्रभवाविलम् ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
पुरीषमूत्रे नोदीक्षेन्नाधितिष्ठेत्कदाचन |
२२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
पुरुकुत्सो नृपः सिद्धिं महतीं समवाप्तवान् ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६९
भीष्म उवाच
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च महेष्वासो महावलः |
२ क