सभा पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रावेशय़न्गृहं क्षत्तुः स्वय़मार्ततराः शनैः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७
युधिष्ठिर उवाच
प्रावेशय़महं लुव्धो वाहिनीं द्रोणपालिताम् ||
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
प्रावेय़ाः सह मौनेय़ैर्गन्धर्वाप्सरसां गणाः |
४२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
प्रावोधय़त पादेन शय़नस्थं महीपते ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
सञ्जय़ उवाच
प्राव्राजय़स्तदारण्ये रौरवाजिनवाससः ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
प्राश्नीय़ादानुपूर्व्येण यथादीक्षमतन्द्रितः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
७३
वृहदश्व उवाच
प्राश्य मत्वा नलं सूदं प्राक्रोशद्भृशदुःखिता ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
इन्द्र उवाच
प्रासतोमरसङ्घाताः खड्गशक्तिपरश्वधाः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
प्रासतोमरसङ्घातैः खड्गैश्च सपरश्वधैः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रासतोमरहस्तैश्च यय़ौ योधशतैर्वृतः ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
प्रासपट्टिशनिस्त्रिंशाञ्शत्रुभिः सम्प्रवेरितान् |
५९ क
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
प्रासर्पकाले सम्प्राप्ते नानादिग्भ्यः समागतान् ||
५८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
प्रासर्ष्टितोमरेष्वाजौ परिघेष्वाय़सेषु च |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
प्रासशक्त्यृष्टिसङ्घैश्च वाणौघैश्च समाकुलम् |
४० क
आदि पर्व
अध्याय
१८६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रासा भुशुण्ड्यश्च परश्वधाश्च; साङ्ग्रामिकं चैव तथैव सर्वम् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
१७
सूत उवाच
प्रासाः सुविपुलास्तीक्ष्णा न्यपतन्त सहस्रशः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
३८
सूत उवाच
प्रासादं कारय़ामास एकस्तम्भं सुरक्षितम् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रासादं शय़नं यानं वासांस्याभरणानि च ||
२१ ग
स्त्री पर्व
अध्याय
१८
गान्धार्यु उवाच
प्रासादतलचारिण्यश्चरणैर्भूषणान्वितैः |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रासादमालाद्रिवृतो रथ्यापणमहाह्रदः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रासादमालासंय़ुक्तं हेमतोरणभूषितम् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रासादवरशृङ्गस्थाः परय़ा नृपशोभय़ा |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
१०२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रासादशतसम्वाधं महेन्द्रपुरसंनिभम् ||
८ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
प्रासादशिखराग्रेषु पुरद्वारेषु चैव हि |
४० क
आदि पर्व
अध्याय
१३८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रासादशय़नां नित्यं पुण्डरीकान्तरप्रभाम् ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
४६
मन्त्रिण ऊचुः
प्रासादस्थं यत्तमपि दग्धवान्विषवह्निना |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
७१
वृहदश्व उवाच
प्रासादस्थाश्च शिखिनः शालास्थाश्चैव वारणाः |
६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रासादहर्म्यसंवृद्धामत्यन्तसुखभागिनीम् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७९
वसिष्ठ उवाच
प्रासादा यत्र सौवर्णा वसोर्धारा च यत्र सा |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
प्रासादाः पाण्डुराभ्राभाः शय़्याश्च कनकोज्ज्वलाः |
५० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रासादाग्रेष्ववोध्यन्त राङ्कवाजिनशाय़िनः ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
कुशिक उवाच
प्रासादानां वहूनां च काञ्चनानां महामुने ||
६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
प्रासादाभोगसंरुद्धो अन्वरौत्सीत्स रोदसी ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
प्रासादे मञ्चकस्थानं यः पश्यति स मुच्यते ||
३० ख
विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रासादेषु विचित्रेषु गोष्ठीष्वावसथेषु च |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
प्रासादेऽपि च मे शय़्या कदाचिदुपपद्यते ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२११
वैशम्पाय़न उवाच
प्रासादै रत्नचित्रैश्च गिरेस्तस्य समन्ततः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३९
वाय़ुरु उवाच
प्रासादैरप्सरोभिश्च दिव्यैः कामैश्च शोभितम् |
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
प्रासादैर्विविधैश्चैव द्वारैश्चाप्युपशोभितम् ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
प्रासानां पततां राजन्रूपमासीत्समन्ततः |
४५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
प्रासानां भिण्डिपालानां निस्त्रिंशानां च संय़ुगे ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
प्रासानां भिण्डिपालानां भुशुण्डीनां च सर्वशः ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
प्रासानुद्धृत्य सर्वांश्च स्वशरीरादरिन्दमः |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
प्रासान्परश्वधांश्चैव मुद्गरान्मुसलानपि |
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
प्रासाश्च विमलास्तीक्ष्णाः शक्त्यश्च कनकोज्ज्वलाः |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
प्रासासिवाणकलिले वर्तमाने सुदारुणे ||
८८ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रासासिशूलपरशुमुद्गरालातधारिणीः ||
४३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
प्रासेन चेकितानं वै विव्याध हृदय़े भृशम् ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
प्रासेन जाम्वूनदभूषणेन; जिघांसुरेकोऽभिपपात शीघ्रम् ||
५५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
प्रासेन विद्ध्वा द्रौणिं तु सुतसोमः प्रतापवान् |
५१ क