कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
पुनश्च पीतैर्निशितैः पृषत्कैः; स्तनान्तरे गाढमथाभ्यविध्यत् ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
पुनश्च रमणीय़ेषु वनेषूपवनेषु च |
३७ क
शल्य पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
पुनश्च राज्ञः पतितस्य भूमौ; स तां गदां स्कन्धगतां निरीक्ष्य |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
पुनश्च रिपुरद्यैव युक्तीनां पश्य चापलम् ||
१५४ ख
वन पर्व
अध्याय
१२८
लोमश उवाच
पुनश्च लेभे लोकान्स्वान्कर्मणा निर्जिताञ्शुभान् |
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
पुनश्च वर्धितं राज्यं स्ववलेन महात्मभिः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
पुनश्च विशिखैस्तीक्ष्णैर्विद्ध्वा पञ्चभिराशुगैः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
पुनश्च शरवर्षेण छादय़ामास भारत |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
कुशिक उवाच
पुनश्च शय़नं विप्र दिवसानेकविंशतिम् ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
पुनश्च सन्दधे दीप्तं देवानां निशितं शरम् ||
४९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
पुनश्च सन्दधे रुद्रो दीप्तं सुनिशितं शरम् ||
१९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
पुनश्च सुविचित्रेण शतचन्द्रेण चर्मणा |
८० क
द्रोण पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
पुनश्चतुःशतान्हत्वा भीमं विव्याध पत्रिणा ||
१७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
कुशिक उवाच
पुनश्चाख्यातुमिच्छामि भगवन्विस्तरेण वै |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
पुनश्चातीत्य वेगेन द्रोणानीकमुपाद्रवत् |
७७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
कुशिक उवाच
पुनश्चादर्शनं तस्य श्रोतुमिच्छामि कारणम् ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
पुनश्चान्याञ्शरान्पीतानकुण्ठाग्राञ्शिलाशितान् |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
पुनश्चान्यैः शरैस्तीक्ष्णैः सुप्तं व्याघ्रं तुदन्निव ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
पुनश्चान्यैस्त्रिभिर्वाणैर्मोहय़न्निव सात्वतम् ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
पुनश्चापि महाकाय़ः शतशीर्षः शतोदरः ||
५८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
पुनश्चापि महाकाय़ः सञ्छिन्नः शतधा रणे |
५७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
पुनश्चापि सुसङ्क्रुद्धः शरैः संनतपर्वभिः |
६१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
पुनश्चासिं समुद्यम्य द्रोणपुत्रमुपाद्रवत् ||
५१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
पुनश्चासृजदुग्राणि शरवर्षाणि पाण्डवः |
४२ क
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
पुनश्चास्य धनुश्चित्रं गजराजकरोपमम् |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
पुनश्चितिस्तदा चास्य यज्ञस्याथ भविष्यति ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
पुनश्चेदं महाराज पप्रच्छ प्रथितं गुरुम् ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
पुनश्चेदीदृशं वाक्यं मद्रराज वदिष्यसि |
१०३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
पुनश्चेदीदृशीं वाचं मत्समीपे वदिष्यसि |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
पुनश्चैनं शरैर्घोरैराजघान स्तनान्तरे |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
पुनश्चैनं शरैर्घोरैश्छादय़ामास भारत |
४९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
पुनश्चैनममेय़ात्मा शरवर्षैरवाकिरत् ||
३१ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१४२
सञ्जय़ उवाच
पुनश्चैव त्रिसप्तत्या भूय़श्चैव शतेन ह ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
पुनश्चैव द्विसाहस्रान्कलिङ्गानरिमर्दनः |
७४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
पुनश्चैव शतेनास्य संरुरोध महारथम् |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४४
सञ्जय़ उवाच
पुनश्चैव शतेनैव नाराचानां स्तनान्तरे ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
पुनश्चैवागमिष्यामि विश्रम्भं कुरु मे शुभे ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१३१
लोमश उवाच
पुनश्चोत्कृत्य मांसानि राजा प्रादादुशीनरः ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
पुनश्चोद्धूय़ वेगेन शाल्वाय़ेत्यहमव्रुवम् ||
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२१
नारद उवाच
पुनस्तवाद्य राजर्षे सुकृतेनेह कर्मणा ||
७ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८२
अर्जुन उवाच
पुनस्तस्य महाभाग मणिपूरेश्वरो युवा |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
पुनस्तानि शरीराणि एकीभूतानि भारत |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
पुनस्तान्येव कुर्वाणो दुःखैः कालेन युज्यते ||
८५ ख
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
पुनस्तिर्यक्प्रय़ात्याशु पुनरप्सु निमज्जति ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
श्रीभगवानु उवाच
पुनस्तिष्ये च सम्प्राप्ते कुरवो नाम भारताः |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
नारद उवाच
पुनस्ते तं पुत्रमहं ददामि; हिरण्यनाभं वर्षसहस्रिणं च ||
१४१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५४
उत्तङ्क उवाच
पुनस्त्वां स्वेन रूपेण द्रष्टुमिच्छामि शाश्वतम् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
पुनाति दत्ता पृथिवी दातारमिति शुश्रुम ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
पुनाति दर्शनादेव दण्डेनैकं नराधिप |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
पुनाति पापं पुरुषः पूतश्चेन्न प्रवर्तते ||
१ ख