उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
यो नैव रोषान्न भय़ान्न कामान्नार्थकारणात् |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२३
व्राह्मण उवाच
यो नो ज्येष्ठस्तमाचक्ष्व स नः श्रेष्ठो भविष्यति ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२२
जरितो उवाच
यो नो द्वेष्टारमादाय़ श्येनराज प्रधावसि |
७ क
सभा पर्व
अध्याय
५८
युधिष्ठिर उवाच
यो नो नेता यो युधां नः प्रणेता; यथा वज्री दानवशत्रुरेकः |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
यो नोद्धतं कुरुते जातु वेषं; न पौरुषेणापि विकत्थतेऽन्यान् |
९२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
यो नोपकर्तुं शक्नोति नापकर्तुं महीपतिः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
२०६
उलूप्यु उवाच
यो नोऽनुप्रविशेन्मोहात्स नो द्वादशवार्षिकम् |
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
यो भक्षय़ित्वा मांसानि पश्चादपि निवर्तते ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२३
भीष्म उवाच
यो भर्ता वासितातुष्टो भर्तुस्तुष्टा च वासिता |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
वासुदेव उवाच
यो भवेद्धृदि सङ्कल्पः शुभो वा यदि वाशुभः |
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
वासुदेव उवाच
यो भवेद्धृदि सङ्कल्पः शुभो वा यदि वाशुभः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
यो भारतं समधिगच्छति वाच्यमानं; किं तस्य पुष्करजलैरभिषेचनेन ||
२४२ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
यो भारतं समधिगच्छति वाच्यमानं; किं तस्य पुष्करजलैरभिषेचनेन ||
५४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
यो भीष्मं शमय़ेत्सङ्ख्ये दावाग्निं जलदो यथा ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
यो भूतानि धनज्यानाद्वधात्क्लेशाच्च रक्षति |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८५
भृगुरु उवाच
यो भैक्षचर्योपगतैर्हविर्भि; श्चिताग्निनां स व्यतिय़ाति लोकान् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४५
भीष्म उवाच
यो मनुष्यः स्वकं पुत्रं विक्रीय़ धनमिच्छति |
१९ क
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
यो ममाङ्गे व्रणं कुर्याच्छोणितं वापि दर्शय़ेत् |
५३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
यो ममाद्य महात्मानं दर्शय़ेच्छ्वेतवाहनम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४८
शौनक उवाच
यो मर्त्यः प्रतिपद्येत आय़ुर्जीवेत वा पुनः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
यो मां कश्चिद्वासय़ेत न स मां कोपय़ेदिह ||
१४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
यो मां नित्यमदीनात्मा प्रत्युद्गम्याभिनन्दति |
५१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सात्यकिरु उवाच
यो मां निष्पिष्य सङ्ग्रामे जीवन्हन्यात्पदा रुषा |
४४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मय़ि पश्यति |
३० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१३
वासुदेव उवाच
यो मां प्रय़तते हन्तुं ज्ञात्वा प्रहरणे वलम् |
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१३
वासुदेव उवाच
यो मां प्रय़तते हन्तुं तपसा संशितव्रतः |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१३
वासुदेव उवाच
यो मां प्रय़तते हन्तुं धृत्या सत्यपराक्रमः |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१३
वासुदेव उवाच
यो मां प्रय़तते हन्तुं मोक्षमास्थाय़ पण्डितः |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१३
वासुदेव उवाच
यो मां प्रय़तते हन्तुं यज्ञैर्विविधदक्षिणैः |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१३
वासुदेव उवाच
यो मां प्रय़तते हन्तुं वेदैर्वेदान्तसाधनैः |
१४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
यो मां युद्धाय़ सम्प्राप्तं साम्नैवाथो त्वमग्रहीः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८१
भीष्म उवाच
यो मानितोऽमानितो वा न सन्दूष्येत्कदाचन ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३२
श्रीभगवानु उवाच
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
यो मामस्मादभिप्राय़ाद्वारय़ेदिति मे मतिः ||
१०० ख
वन पर्व
अध्याय
७४
वृहदश्व उवाच
यो मामुत्सृज्य विपिने गतवान्निद्रय़ा हृताम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१८
श्रीरु उवाच
यो मामेको विषहितुं शक्तः कश्चित्पुरन्दर ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
यो मामेवङ्गतो मूढो न जानीतेऽद्य लक्ष्मण ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३७
श्रीभगवानु उवाच
यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
यो मार्गमनुय़ातीमं पदं तस्य न विद्यते ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
यो माहेन्द्रं धनुर्लेभे तुल्यं गाण्डीवतेजसा |
४ क
सभा पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
यो मुञ्चति वशे कृत्वा गुरुर्भवति तस्य सः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
यो मुह्यतां मोहय़िताद्वितीय़ो; वैकर्तनं कुशलं तात पृच्छेः ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
यो मे कालो भवेच्छेषस्तं वसेय़मिहाच्युत ||
११ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१५
इन्द्राण्यु उवाच
यो मे त्वय़ा कृतः कालस्तमाकाङ्क्षे जगत्पते |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
७८
यय़ातिरु उवाच
यो मे दद्याद्वय़ः पुत्रस्तद्भवाननुमन्यताम् ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०२
अगस्त्य उवाच
यो मे दृष्टिपथं गच्छेत्स मे वश्यो भवेदिति |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय
६४
विराट उवाच
यो मे धनमवाजैषीत्कुरुभिर्ग्रस्तमाहवे ||
३० ख
विराट पर्व
अध्याय
८
द्रौपद्यु उवाच
यो मे न दद्यादुच्छिष्टं न च पादौ प्रधावय़ेत् |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
यो मे पुत्रात्प्रिय़तरः सर्वास्त्रविदुषां वरः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
यो मे यथा कल्पितवान्भागमस्मिन्महाक्रतौ |
५५ क