सभा पर्व
अध्याय
९
नारद उवाच
प्रह्लादो विप्रचित्तिश्च कालखञ्जाश्च सर्वशः ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रह्लादय़ध्वं हृदय़ं ममेदं; पाञ्चालराजस्य सहानुगस्य ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
प्रह्वमव्यसनोपेतं पुरस्ताद्दृष्टविक्रमम् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१९७
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रह्वा पर्यचरच्चापि भर्तारमसितेक्षणा |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१९२
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रह्वास्त्वामुपतिष्ठन्ति स्तुवन्तो विविधैः स्तवैः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रांशु दुर्दर्शनं चैवाप्यतितेजस्तथैव च ||
३८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
प्रांशुं कमलपत्राक्षमत्यर्थं प्रिय़दर्शनम् |
१०६ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रांशुः कनकतालाभः सिंहसंहननो युवा ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रांशुः कनकतालाभः सिंहसंहननो युवा |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
प्रांशुरुत्पलगर्भाभो निहतो न्यपतत्क्षितौ ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
प्राकम्पत च रोषेण सप्तभिश्चार्दय़च्छरैः ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
प्राकम्पत महाव्यूहस्तस्मिन्वीरसमागमे |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
प्राकम्पत महाशैलः प्रामृद्यन्त महाद्रुमाः |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
प्राकम्पत मही राजन्निहतैस्तैस्ततस्ततः |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
प्राकम्पतेव पृथिवी तस्मिन्वीरावसादने |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
प्राकम्पन्त च सैन्यानि वाहनानि च सर्वशः ||
७८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
प्राकम्पन्त ततो राजंस्तव पुत्रे निपातिते ||
५४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
प्राकम्पन्त रणे योधा गावः शीतार्दिता इव ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
प्राकम्पन्तेव भारेण स्त्रीणां पूर्णानि भारत ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२६८
मार्कण्डेय़ उवाच
प्राकारं ददृशुस्ते तु समन्तात्कपिलीकृतम् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
२६८
मार्कण्डेय़ उवाच
प्राकारं शोधय़न्तस्ते परं विक्रममास्थिताः ||
३३ ख
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
प्राकारः सर्ववृष्णीनामापत्स्वभय़दोऽरिहा |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
उत्तङ्क उवाच
प्राकारनिचय़ैर्दिव्यैर्मणिमुक्ताभ्यलङ्कृतैः |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
प्राकारपरिखोपेतो द्वारतोरणमण्डितः |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
प्राकारवप्रे प्रतिमुच्य कुण्डले; दीर्घे च कम्वू परिहाटके शुभे ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१२४
लोमश उवाच
प्राकारसदृशाकाराः शूलाग्रसमदर्शनाः ||
२१ ग
वन पर्व
अध्याय
२६८
मार्कण्डेय़ उवाच
प्राकारस्थाश्च ये केचिन्निशाचरगणास्तदा |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
प्राकारागारविध्वंसान्न स्म ते प्रतिकुर्वते |
६० क
कर्ण पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
प्राकाराट्टपुरद्वारदारणीमतिदारुणाम् ||
२४ ख
मौसल पर्व
अध्याय
७
वसुदेव उवाच
प्राकाराट्टालकोपेतां समुद्रः प्लावय़िष्यति ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९९
वैशम्पाय़न उवाच
प्राकारेण च सम्पन्नं दिवमावृत्य तिष्ठता ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
प्राकाश्यं चैव गच्छन्ति कृत्वा निष्कल्मषं तपः ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३९
व्रह्मो उवाच
प्राकाश्यं सत्त्वमादित्ये सन्तापो राजसो गुणः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१६८
अर्जुन उवाच
प्राकुर्वन्विविधा माय़ा यौगपद्येन भारत ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
प्राकृतेन सुवृत्तेन चरन्तमकुतोभय़म् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११५
भीष्म उवाच
प्राकृतो हि प्रशंसन्वा निन्दन्वा किं करिष्यति |
७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
३
विदुर उवाच
प्राक्कर्मभिस्तु भूतानि भवन्ति न भवन्ति च |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
प्राक्कोशः प्रोच्यते धर्मो वुद्धिर्धर्माद्गरीय़सी |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
प्राक्च तेऽभिहितम् |
१३४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
प्राक्रोशत्पाण्डवानीके वसुदानश्च पार्थिवः ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
प्राक्रोशदतिसंरम्भात्सतोय़ इव तोय़दः ||
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
प्राक्रोशदन्यमन्योऽत्र तथान्यो विमुखोऽद्रवत् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
६०
वृहदश्व उवाच
प्राक्रोशदुच्चैः सन्त्रस्ता महाराजेति नैषधम् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
७५
दमय़न्त्यु उवाच
प्राक्रोशदुच्चैरालिङ्ग्य पुण्यश्लोकमनिन्दिता ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
प्राक्रोशन्क्षत्रिय़ास्तत्र दृष्ट्वा तद्वैशसं महत् |
३९ क
स्त्री पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
प्राक्रोशन्त महाराज स्वनुरक्तास्तदा भृशम् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१६९
अर्जुन उवाच
प्राक्रोशन्नगरे तस्मिन्यथा शरदि लक्ष्मणाः ||
२१ ख
विराट पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
प्राक्रोशन्नाथमिच्छन्ती कृष्णा नाथवती सती ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
प्राक्रोशन्प्रापतंश्चान्ये जग्मुर्मोहं तथापरे |
११० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
प्राक्रोशन्भीमसेनं ते धृष्टद्युम्नरथं प्रति |
५४ क