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शान्ति पर्व
अध्याय १९९
मनुरु उवाच
परं नैवाभिकाङ्क्षन्ति निर्गुणत्वाद्गुणार्थिनः ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
परं नोद्वेजय़ेत्कञ्चिन्न च कस्यचिदुद्विजेत् |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९९
मनुरु उवाच
परं नय़न्तीह विलोभ्यमानं; यथा प्लवं वाय़ुरिवार्णवस्थम् ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१२
भीष्म उवाच
परं पञ्चाशतो नार्यो वारमुख्याः समाद्रवन् ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९
युधिष्ठिर उवाच
परं परं ज्याय़ एषां सैषा नैःश्रेय़सी गतिः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
परं परं भवेत्पूर्वमस्तेय़मिति निश्चय़ः ||
३७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
परं परेभ्यः परमं परं यस्मान्न विद्यते |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय १२४
सञ्जय़ उवाच
परं पुराणं पुरुषं पुराणानां परं च यत् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
भीष्म उवाच
परं भावं हि काङ्क्षामि यत्र नावर्तते पुनः |
५० क
भीष्म पर्व
अध्याय ३१
श्रीभगवानु उवाच
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २९
श्रीभगवानु उवाच
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३६
श्रीभगवानु उवाच
परं भूय़ः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् |
१ क
सभा पर्व
अध्याय ६३
विदुर उवाच
परं भय़ं पश्यत भीमसेना; द्वुध्यध्वं राज्ञो वरुणस्येव पाशात् |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय ३९
तक्षक उवाच
परं मन्त्रवलं यत्ते तद्दर्शय़ यतस्व च |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
युधिष्ठिर उवाच
परं मोक्षस्य यच्चापि तन्मे व्रूहि पितामह ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२७
कर्ण उवाच
परं यत्नं कुर्वतां च त्वय़ा सार्धं रणाजिरे |
१५ क
वन पर्व
अध्याय ६९
वृहदश्व उवाच
परं यत्नं च सम्प्रेक्ष्य परां मुदमवाप ह ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
परं यत्नं समास्थाय़ वीभत्सुः प्रत्यपद्यत ||
५५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६८
भीष्म उवाच
परं यशो विप्रथय़ंस्तव सेनासु भारत ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
परं योगं तु यत्कृत्स्नं निश्चितं तद्द्विजातिषु ||
५७ ख
वन पर्व
अध्याय १८४
सरस्वत्यु उवाच
परं लोकं गोप्रदास्त्वाप्नुवन्ति; दत्त्वानड्वाहं सूर्यलोकं व्रजन्ति |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
परं विस्मय़मापन्ना देव्यो दिव्यवपुर्धराः ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३२
अर्जुन उवाच
परं व्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय २३२
युधिष्ठिर उवाच
परं शक्त्याभिरक्षेत किं पुनस्त्वं वृकोदर ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
कृष्ण उवाच
परं शरैः पत्रिभिरिन्द्रविक्रम; स्तथा यथेन्द्रो वलमोजसाहनत् ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
भीष्म उवाच
परं शवाद्व्राह्मणस्यैष पुत्रः; शूद्रापुत्रं पारशवं तमाहुः |
५ क
वन पर्व
अध्याय ६
विदुर उवाच
परं श्रेय़ः पाण्डवेय़ा मय़ोक्तं; न मे तच्च श्रुतवानाम्विकेय़ः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
परं सहस्राद्यो वद्ध्वा हय़ान्वेदीं विचित्य च |
४४ क
उद्योग पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
परं स्थानं मन्यमानेन भूय़; आत्मा दत्तो वर्षपूगं सुखेभ्यः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९४
मनुरु उवाच
परं हि तत्कर्मपथादपेतं; निराशिषं व्रह्मपरं ह्यवश्यम् ||
११ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
परं हि तद्व्रह्म महन्महात्म; न्व्रह्माणमीशं वरदं च विष्णुम् |
५८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
परं हि पुण्डरीकाक्षान्न भूतं न भविष्यति ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
परं हि व्रह्म कथितं योगय़ुक्तेन तन्मय़ा |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २८
भीष्म उवाच
परं हि सर्वभूतानां स्थानमेतद्युधिष्ठिर ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
परंसहस्रै राजेन्द्र तपोनिय़मसंस्थितैः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
परः कालात्परो यज्ञात्परः सदसतोश्च यः |
४७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३७
विदुर उवाच
परक्षेत्रे निर्वपति यश्च वीजं; स्त्रिय़ं च यः परिवदतेऽतिवेलम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२८
युधिष्ठिर उवाच
परचक्राभिय़ातस्य दुर्वलस्य वलीय़सा |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२९
युधिष्ठिर उवाच
परचक्राभिय़ातस्य दुर्वलस्य वलीय़सा |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७२
भीष्म उवाच
परचक्राभिय़ानेन यदि ते स्याद्धनक्षय़ः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
परचक्रोपरोधे च दृप्तानां चावमर्दने |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०५
याज्ञवल्क्य उवाच
परचक्षुषि चात्मानं ये न पश्यन्ति पार्थिव |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
परचित्तस्य विज्ञानमतीतानागतस्य च ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १
भीष्म उवाच
परतन्त्रं कथं हेतुमात्मानमनुपश्यसि |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
परतन्त्रः सदा राजा स्वल्पे सोऽपि प्रसज्जते |
१३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
परत्र येन जीव्यते तदेव पुत्र दीय़ताम् |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
मुनिरु उवाच
परत्र सुखमिच्छन्तो निर्विद्येय़ुश्च लौकिकात् ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
परत्रगामिकस्य ते कृताकृतस्य कर्मणः |
५२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
परत्वेन भवं देवं भक्तस्त्वं परमेश्वरम् |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
परदारप्रय़ोक्तारस्ते वै निरय़गामिनः ||
६१ ख