शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
प्रासेन सहदेवस्य शिरसि प्राहरद्भृशम् ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
प्रासेन सहदेवस्य शिरसि प्राहरद्भृशम् |
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
प्रासैः खड्गैश्च संस्यूतानृष्टिभिश्च नराधिप |
१०९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
प्रासैरभिहताः केचिद्गजय़ोधाः समन्ततः |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
प्रासैर्विनिहताः केचिद्विनेदुः परमातुराः ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
प्रासैश्च खड्गैश्च समाहतानि; सदश्ववृन्दानि सदश्ववृन्दैः ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
प्रासैश्च विमलैस्तीक्ष्णैर्विमलाभिस्तथर्ष्टिभिः |
७१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
प्रासैस्तथा गदाभिश्च परिघैः कम्पनैस्तथा ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९१
भीष्म उवाच
प्रास्थापय़त्पार्षताय़ हन्मीति त्वां स्थिरो भव ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
६७
वृहदश्व उवाच
प्रास्थापय़द्दिशः सर्वा यतध्वं नलदर्शने ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
प्रास्पन्दच्छय़ने कौश्ये वृष्ट्या सस्यमिवाप्लुतम् ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
वसिष्ठ उवाच
प्रास्यत्पूषा कराभ्यां वै तस्मिन्नेव हुताशने ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
प्रास्यद्द्रोणसुतो वाणान्वृष्टिं पूषानुजो यथा ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
प्राह काकस्य वचनादमुत्रेदं त्वय़ा कृतम् ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
प्राह किं करवाणीति सा च तं वाक्यमव्रवीत् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६७
भीष्म उवाच
प्राह चेदं विरूपाक्षं दिष्ट्याय़ं जीवतीत्युत ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
प्राह तथ्यमिदं वाक्यं विषण्णान्सुरसत्तमान् ||
५२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
प्राह प्रहरतां श्रेष्ठः स्मितपूर्वं समाह्वय़न् ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९६
जनमेजय़ उवाच
प्राह मानुषवद्वाचमेतत्पृष्टो वदस्व मे ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
प्राह वाक्यमसम्भ्रान्तः सूतपुत्रं विशां पते ||
६२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
प्राह वाक्यमसम्भ्रान्तो वीरं शारद्वतीसुतम् |
५५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२२
स्त्र्यु उवाच
प्राह विप्रं तदा विप्रः सुप्रीतेनान्तरात्मना ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
प्राह सर्वमशेषेण स्त्रीधर्मं सुरसुन्दरी ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
प्राहसत्सहसा हृष्टस्त्रासय़न्वै यतव्रतम् ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
प्राहसन्नभ्यसूय़ंश्च सर्ववृद्धान्गुणावराः ||
५० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
प्राहाजमीढं भगवान्वृहस्पतिसमद्युतिः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
प्राहाभिवाद्य च गुरुं श्रेय़ोर्थी विनय़ान्वितः ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
प्राहिणोच्चेदिपाञ्चालान्करूषांश्च महावलः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२७१
मार्कण्डेय़ उवाच
प्राहिणोत्कुम्भकर्णाय़ लक्ष्मणः परवीरहा ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२०
वैशम्पाय़न उवाच
प्राहिणोत्तपसो विघ्नं कुरु तस्येति कौरव ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
प्राहिणोत्तव पुत्राय़ घोरामग्निशिखामिव ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
प्राहिणोत्तस्य नागस्य प्रमुखे नृपसत्तम ||
४५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
प्राहिणोत्त्वरय़ा युक्तो दिधक्षुरिव मारिष ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
प्राहिणोत्त्वरय़ा युक्तो द्रष्टुकामो धनञ्जय़म् ||
३४ ख
विराट पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
प्राहिणोत्पाण्डुपुत्राय़ प्रदीप्तामशनीमिव ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
प्राहिणोत्सहदेवाय़ सा मोघा न्यपतद्भुवि ||
३६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
प्राहिणोत्सुतसोमस्य शरानाशीविषोपमान् ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
प्राहिणोत्सूतपुत्राय़ केशवेन प्रचोदितः ||
८१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
प्राहिणोत्सूतपुत्राय़ त्रिंशतं शत्रुतापनः |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
प्राहिणोत्सूतपुत्राय़ भीमसेनश्चतुर्दश ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
प्राहिणोत्सूतपुत्राय़ षडस्रामविचारय़न् ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय
७२
सञ्जय़ उवाच
प्राहिणोदानय़ेहेति पुत्रो दुर्योधनस्तव |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
प्राहिणोद्दर्शनीय़ाङ्गीं कुन्ती त्वेनमथाव्रवीत् ||
६४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
प्राहिणोद्भीमसेनाय़ तस्मै भीमश्च पाण्डवः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
प्राहिणोद्भीमसेनाय़ परिक्षिप्य महावलः ||
५७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
प्राहिणोद्भीमसेनाय़ वधाकाङ्क्षी जनेश्वरः ||
२६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
प्राहिणोद्भीमसेनाय़ वलाय़ेन्द्र इवाशनिम् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
प्राहिणोद्भीमसेनाय़ वेगेन महता नदन् ||
६५ ख
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
प्राहिणोद्राक्षसः क्रुद्धो भीमसेनश्चचाल ह ||
५१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
प्राहिणोन्नव संरव्धः शरान्वर्हिणवाससः |
२५ क