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अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
परदारा न गन्तव्याः सर्ववर्णेषु कर्हिचित् |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
अष्टावक्र उवाच
परदारानहं भद्रे न गच्छेय़ं कथञ्चन |
६१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३६
व्यास उवाच
परदारापहारी च परस्यापहरन्वसु |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
परदाराभिमर्शं तु कृत्वा जाय़ति वै वृकः |
६६ क
वन पर्व
अध्याय २३३
वैशम्पाय़न उवाच
परदाराभिमर्शश्च मानुषैश्च समागमः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
परदाराभिहर्तारः परदाराभिमर्शिनः |
६१ क
विराट पर्व
अध्याय १३
द्रौपद्यु उवाच
परदारास्मि भद्रं ते न युक्तं त्वय़ि साम्प्रतम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय २६५
मार्कण्डेय़ उवाच
परदारास्म्यलभ्या च सततं च पतिव्रता ||
२० ख
विराट पर्व
अध्याय १३
द्रौपद्यु उवाच
परदारे न ते वुद्धिर्जातु कार्या कथञ्चन |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
महेश्वर उवाच
परदारेषु ये नित्यं चारित्रावृतलोचनाः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
महेश्वर उवाच
परदारेषु ये मूढाश्चक्षुर्दुष्टं प्रय़ुञ्जते |
४९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
महेश्वर उवाच
परदारेषु वर्तन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
परदारेष्वसङ्कल्पो न्यासस्त्रीपरिरक्षणम् |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३०
कुन्त्यु उवाच
परपिण्डमुदीक्षामि त्वां सूत्वामित्रनन्दन ||
३१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
परपुष्टोपमा वाक्ये तथर्द्ध्या धनदोपमाः |
३७ क
सभा पर्व
अध्याय ५०
दुर्योधन उवाच
परप्रणेय़ोऽग्रणीर्हि यश्च मार्गात्प्रमुह्यति |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१०
गुरुरु उवाच
परप्रत्ययसर्गे तु निय़तं नातिवर्तते ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
परप्रहरणज्ञाने प्रतिविन्ध्यो भवत्वय़म् ||
७४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३८
भीष्म उवाच
परप्रय़ुक्तं तु कथं निशामय़े; दतो मय़ोक्तं भवतो हितार्थिना ||
६९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
परप्रय़ुक्तः पुरुषो विचेष्टते; सूत्रप्रोता दारुमय़ीव योषा |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९१
उतथ्य उवाच
परभार्यासु कन्यासु नाचरेन्मैथुनं नृपः ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७६
भीष्म उवाच
परमं कथ्यतां चेति तां रामः प्रत्यभाषत |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
व्राह्मण उवाच
परमं गृह्यतां तस्य फलं यज्जपितं मय़ा |
४८ क
वन पर्व
अध्याय २१९
स्कन्द उवाच
परमं तेन सहिता सुखं वत्स्यथ पूजिताः ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८३
युधिष्ठिर उवाच
परमं दक्षिणार्थे च तद्व्रवीहि पितामह ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय १२
युधिष्ठिर उवाच
परमं नः क्षमं लोके यथावद्वक्तुमर्हसि ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०६
गुरुरु उवाच
परमं परमात्मानं देवमक्षय़मव्ययम् |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३०
श्रीभगवानु उवाच
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तय़न् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
सञ्जय़ उवाच
परमं प्रय़तात्मानो न शान्तिमुपलेभिरे ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय २९१
पृथो उवाच
परमं भगवन्देव सङ्गमिष्ये त्वय़ा सह |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
परमं भेषजं ह्येतद्यज्ञानामेतदुत्तमम् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय १७५
युधिष्ठिर उवाच
परमं भो गमिष्यामो द्रष्टुं देवमहोत्सवम् |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
परमं यो महद्व्रह्म परमं यः पराय़णम् ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
परमं योगमास्थाय़ ऋषिर्योगमवाप्तवान् ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय ४
तमृषय़ ऊचुः
परमं लोमहर्षणे प्रक्ष्यामस्त्वां वक्ष्यसि च नः शुश्रूषतां कथाय़ोगम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
परमं विस्मय़ं चक्रे साधु साध्विति चाव्रवीत् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०
वासुदेव उवाच
परमं सौम्य इत्युक्तस्ताभ्यां राजा शशास ताम् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
कृष्ण उवाच
परमं हर्षमागम्य भगवन्तमथाव्रुवम् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९१
भीष्म उवाच
परमध्यात्मकुशलमध्यात्मगतिनिश्चय़म् |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
परमन्धकवृष्णिभ्यः पाञ्चालेभ्यश्च माधव ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३११
भीष्म उवाच
परमर्षिर्महाय़ोगी अरणीगर्भसम्भवः ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १२
वासुदेव उवाच
परमव्यक्तरूपस्य परं मुक्त्वा स्वकर्मभिः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
परमव्ययमिच्छन्स तमेवाविशते पुनः ||
१२१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
परमव्यसनार्तोऽपि नार्जुनोऽस्त्रं व्यमुञ्चत ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
परमा सा गतिः पार्थ निर्द्वन्द्वानां महात्मनाम् ||
७५ ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
परमांसानि खादन्तः क्रव्यादा मांसजीविनः ||
१३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
परमाणुभूता भूत्वा तु तं देवं प्रविशन्त्युत ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
परमात्मानमगुणं न निवर्तति भारत ||
९२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
परमात्मानमासाद्य तद्भूताय़तनामलाः |
७५ क